गुरुवार, 20 अगस्त 2026

एसआईआर की सुनवाई में कांग्रेस की ‘निगरानी’

कांग्रेस पार्टी की हर दावे-आपत्ति पर नजर रखने की है तैयारी मतदाता सूची को लेकर चुनावी साल में बढ़ेगी सियासी तपिश एसआईआर में आपत्तियों के दौरान मौजूद रहेंगे कांग्रेस प्रतिनिधि देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासी हलचल अब और तेज होने के आसार हैं। कांग्रेस ने संकेत दिया है कि एसआईआर के तहत होने वाली सुनवाई के दौरान वह अपने प्रतिनिधियों को मौजूद रखेगी। पार्टी का तर्क है कि मतदाता सूची से जुड़े दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे और किसी भी पात्र मतदाता का नाम प्रभावित न हो। कांग्रेस का यह फैसला ऐसे समय आया है जब प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे रफ्तार पकड़ रही हैं। चुनावी राजनीति में मतदाता सूची महज प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि पूरी चुनावी प्रक्रिया की बुनियाद होती है। ऐसे में एसआईआर की हर गतिविधि अब राजनीतिक दलों की निगाह में रहने वाली है। कांग्रेस की रणनीति साफ दिखाई दे रही है। पार्टी सुनवाई के दौरान अपने प्रतिनिधियों के जरिए यह देखने की कोशिश करेगी कि दावे और आपत्तियों पर निर्धारित नियमों के अनुसार कार्रवाई हो रही है या नहीं। कांग्रेस को आशंका है कि प्रक्रिया के दौरान यदि किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटता है या किसी आपत्ति का निस्तारण पारदर्शी तरीके से नहीं होता, तो उसका सीधा असर आने वाले विधानसभा चुनाव पर पड़ सकता है। यही कारण है कि पार्टी अब केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रहने के बजाय प्रक्रिया के स्तर पर निगरानी बढ़ाने की तैयारी में है। उत्तराखंड में एसआईआर अब सिर्फ प्रशासनिक कवायद नहीं रह गया है। इसके साथ राजनीतिक दलों की चिंता भी जुड़ गई है। चुनाव से पहले मतदाता सूची में होने वाला कोई भी बदलाव सीधे चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है। कांग्रेस पहले भी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाती रही है। पार्टी की कोशिश है कि सुनवाई के दौरान उसके प्रतिनिधि मौजूद रहें और जरूरत पड़ने पर आपत्ति या शिकायत को संबंधित स्तर तक पहुंचाया जा सके। भाजपा की ओर से इस पर क्या रुख अपनाया जाता है, यह भी महत्वपूर्ण होगा। यदि सत्तारूढ़ दल और विपक्ष एसआईआर को लेकर आमने-सामने आते हैं तो मतदाता सूची आने वाले महीनों में उत्तराखंड की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकती है। कांग्रेस के लिए यह फैसला केवल प्रशासनिक निगरानी का विषय नहीं है। यह उसके संगठन की जमीनी क्षमता की भी परीक्षा है। प्रतिनिधि नियुक्त करना आसान है, लेकिन उन्हें हर स्तर पर सक्रिय रखना बड़ी चुनौती होगी। उन्हें मतदाता सूची समझनी होगी, दावे-आपत्तियों की प्रक्रिया की जानकारी रखनी होगी और स्थानीय स्तर पर मतदाताओं के साथ संपर्क बनाए रखना होगा। यानी एसआईआर कांग्रेस के लिए संगठन को बूथ तक सक्रिय करने का अवसर भी बन सकता है। भाजपा लंबे समय से अपने बूथ संगठन को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताती रही है। ऐसे में कांग्रेस यदि एसआईआर की सुनवाई में अपने प्रतिनिधियों को सक्रिय करती है तो भाजपा को भी अपने संगठन की सक्रियता बनाए रखनी होगी। 2027 के चुनाव में मुकाबला केवल चुनावी सभाओं और नारों का नहीं होगा। मतदाता सूची से लेकर बूथ प्रबंधन तक हर स्तर पर राजनीतिक दलों की तैयारियां निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान यदि बड़ी संख्या में नाम हटने, जोड़ने या दावों-आपत्तियों को लेकर विवाद सामने आते हैं तो मामला राजनीतिक रंग ले सकता है। कांग्रेस इसे चुनावी पारदर्शिता का सवाल बनाएगी, जबकि भाजपा संभवतः प्रक्रिया को नियमों के तहत होने वाली सामान्य चुनावी कवायद बताएगी। लेकिन असली सवाल यह होगा कि अंतिम मतदाता सूची कितनी विश्वसनीय और स्वीकार्य बनती है। 2027 की चुनावी जंग अभी दूर है, लेकिन मतदाता सूची पर निगरानी की लड़ाई शुरू हो चुकी है। कांग्रेस ने सुनवाई में प्रतिनिधि उतारने का फैसला लेकर साफ कर दिया है कि वह एसआईआर को केवल सरकारी प्रक्रिया मानकर चुप बैठने वाली नहीं है। अब देखना होगा कि यह निगरानी लोकतांत्रिक पारदर्शिता तक सीमित रहती है या आने वाले दिनों में उत्तराखंड की सियासत का नया चुनावी रणक्षेत्र बन जाती है।

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