मंगलवार, 11 अगस्त 2026

पहाड़ की सियासत में मुद्दों की ‘बौछार’

पहाड़ों पर आफत की बारिश के बीच बढ़ा सियासी तापमान भाजपा का राहत पर दांव और कांग्रेस का अव्यवस्था पर वार कांग्रेस के तीखे सवालों पर भाजपा का राहत-बचाव पर ढाल 2027 की दस्तक में बारिश के बीच जमीन पर उतरीं पार्टियां देहरादून। उत्तराखंड में मानसून की बारिश भले ही पहाड़ों को भिगो रही हो, लेकिन प्रदेश का राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है। कहीं सड़क और पुल बहने का मुद्दा है तो कहीं आपदा राहत और पुनर्वास को लेकर सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। दूसरी ओर विधानसभा चुनाव 2027 की दस्तक के साथ भाजपा और कांग्रेस दोनों ने संगठन को जमीन पर उतारना शुरू कर दिया है। ऐसे में इस बार की बरसात सिर्फ नदियों और नालों का जलस्तर नहीं बढ़ा रही, बल्कि सियासत की हलचल भी तेज कर रही है। मानसून के दौरान उत्तराखंड में हर साल सड़कें टूटती हैं, पुल क्षतिग्रस्त होते हैं और गांवों का संपर्क जिला मुख्यालयों से कटता है। इस बार भी कई इलाकों में बारिश और भूस्खलन ने सरकार की तैयारियों की परीक्षा शुरू कर दी है। यही घटनाएं अब विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का राजनीतिक हथियार बन रही हैं। कांग्रेस सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पलायन और आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दों को लेकर सरकार पर हमलावर है तो भाजपा विकास कार्यों और आपदा के दौरान किए जा रहे राहत एवं बचाव अभियानों को अपनी उपलब्धि के रूप में सामने रख रही है। उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में मानसून हमेशा सरकार के लिए बड़ी चुनौती लेकर आता है। सड़क बंद होने से लेकर गांवों तक राशन और जरूरी दवाइयां पहुंचाने तक प्रशासन की क्षमता की परीक्षा होती है। चारधाम यात्रा के बीच बारिश ने चुनौती को और बढ़ा दिया है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आपदा के दौरान राहत और बचाव कार्य तेजी से हों तथा प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य स्थिति जल्द बहाल की जाए। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार लगातार अधिकारियों से तैयारियों और राहत कार्यों की जानकारी ले रही है। सरकार का दावा है कि संवेदनशील क्षेत्रों में मशीनरी और बचाव दलों को अलर्ट रखा गया है। लेकिन विपक्ष का सवाल है कि हर साल मानसून आने से पहले तैयारियों के दावे किए जाते हैं, फिर बारिश शुरू होते ही वही सड़कें और वही पुल क्यों टूटते हैं? यही सवाल आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का बड़ा हिस्सा बन सकता है। 2027 विधानसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में लाना शुरू कर दिया है। पार्टी का फोकस बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने का है, जहां पिछली बार पार्टी को अपेक्षित सफलता नहीं मिली थी। भाजपा नेतृत्व के सामने सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी की चुनौती है। ऐसे में संगठनात्मक गतिविधियों को तेज करने के साथ ही विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर मौजूद नाराजगी को कम करना भी पार्टी की प्राथमिकताओं में शामिल है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने की तैयारी में है। समान नागरिक संहिता, महिला सशक्तीकरण, रोजगार, निवेश और विकास परियोजनाओं के साथ सरकार चारधाम और सीमांत क्षेत्रों में किए जा रहे कामों को भी चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाना चाहती है। दूसरी तरफ कांग्रेस मानसून को सरकार के खिलाफ मुद्दे खड़े करने के अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी सड़क, स्वास्थ्य सेवाओं, बेरोजगारी, महंगाई और पलायन जैसे पुराने मुद्दों के साथ आपदा प्रबंधन को भी प्रमुखता से उठा रही है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल सरकार पर हमला करना नहीं, बल्कि इन मुद्दों को जनता के बीच एक मजबूत राजनीतिक विकल्प में बदलना है। संगठन में नई ऊर्जा भरने के प्रयास इसी दिशा में देखे जा रहे हैं। पार्टी नेताओं का लगातार जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में सक्रिय होना इस बात का संकेत है कि चुनावी तैयारी अब केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहने वाली। उत्तराखंड की राजनीति में पहाड़ का दर्द कभी पुराना नहीं होता। सड़क टूटी तो सवाल विकास का, अस्पताल दूर हुआ तो सवाल स्वास्थ्य व्यवस्था का, युवा बाहर गया तो सवाल रोजगार का और गांव खाली हुआ तो सवाल पलायन का। मानसून इन सभी सवालों को अचानक सामने ला देता है। बरसात में बंद सड़क किसी सरकारी आंकड़े का हिस्सा नहीं होती। वह उस गांव के लिए जीवन की लाइन होती है। पुल टूटना किसी फाइल में दर्ज नुकसान भर नहीं होता, बल्कि कई परिवारों के लिए बाजार, स्कूल और अस्पताल से संपर्क टूट जाना होता है। यही वजह है कि मानसून के दौरान सामने आने वाली छोटी-छोटी घटनाएं भी चुनावी साल में बड़ा राजनीतिक संदेश बन सकती हैं। विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए चुनावी घड़ी चल चुकी है। आने वाले महीनों में विकास बनाम व्यवस्था, सरकार की उपलब्धियां बनाम स्थानीय नाराजगी और राष्ट्रीय मुद्दे बनाम उत्तराखंड के स्थानीय सवालों के बीच मुकाबला तेज होगा। भाजपा अपने मजबूत संगठन और सरकार की उपलब्धियों के सहारे मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश करेगी। क्षेत्रीय दल और अन्य राजनीतिक ताकतें भी अपनी जगह तलाशेंगी। ऐसे में इस मानसून की बारिश केवल पहाड़ की सड़कों और नदियों की परीक्षा नहीं ले रही। यह सरकार की तैयारी, प्रशासन की कार्यक्षमता और विपक्ष की राजनीतिक सक्रियताकृतीनों की परीक्षा है। आने वाले दिनों में बारिश थमेगी, सड़कें खुलेंगी और मौसम साफ होगा। लेकिन 2027 की राजनीति में इस बरसात के दौरान उठे सवाल शायद इतनी जल्दी नहीं थमेंगे।

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