मंगलवार, 11 अगस्त 2026

करोड़ों का ‘ढोंग’ जिंदगी ‘डोली’ में

उत्तराखंड के पहाड़ के गांवों में बदहाल हैं स्वास्थ्य सेवाएं उत्तराखंड के पहाड़ में स्ट्रेचर बना है चार लोगों का कंधा सड़कें कागज पर पहुंच गईं, एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंची घायल को कंधों पर उठाकर मीलों चलने को ग्रामीण मजबूर देहरादून। उत्तराखंड में विकास की तस्वीरें बहुत सुंदर हैं। पहाड़ों पर चौड़ी सड़कें हैं, सुरंगें हैं, चारधाम के रास्ते हैं, बड़े-बड़े पुल हैं और विकास के दावों के लंबे-लंबे विज्ञापन हैं। लेकिन इसी उत्तराखंड के किसी गांव में जब कोई व्यक्ति घायल होता है तो विकास की चमक अचानक खत्म हो जाती है। एंबुलेंस सड़क तक आती है। गांव तक नहीं। फिर चार लोग आते हैं। एक डोली आती है। मरीज को उसमें लिटाया जाता है और पहाड़ के चार ग्रामीण उसे कंधों पर उठाकर कई किलोमीटर पैदल चल पड़ते हैं। यह दृश्य किसी पुराने उत्तराखंड की तस्वीर नहीं है। यह उस उत्तराखंड की तस्वीर है जो आज भी मौजूद है। जिस राज्य में चारधाम यात्रा के लिए करोड़ों रुपये के सड़क और परिवहन प्रोजेक्ट बन रहे हैं, उसी राज्य में एक ग्रामीण को अस्पताल पहुंचाने के लिए गांव के लोगों को अपना कंधा देना पड़ रहा है। सवाल यह नहीं कि डोली क्यों बनी। सवाल यह है कि डोली की जरूरत आज भी क्यों है? मैदानी शहर में एंबुलेंस की आवाज सुनाई देती है तो लगता है कि व्यवस्था मरीज तक पहुंच रही है। पहाड़ में कई जगह एंबुलेंस की आवाज गांव तक पहुंचती ही नहीं। क्योंकि सड़क नीचे खत्म हो जाती है। इसके बाद रास्ता पगडंडी का होता है। कहीं सीढ़ियां हैं, कहीं पत्थर हैं, कहीं जंगल का रास्ता है और कहीं इतना संकरा रास्ता कि चार आदमी भी मुश्किल से चल सकें। मरीज को स्ट्रेचर पर ले जाना संभव नहीं होता तो डोली ही सहारा बनती है। परिवार के लोग जानते हैं कि अस्पताल दूर है। समय कम है और रास्ता लंबा। फिर किसी की मां, किसी के पिता, किसी की पत्नी या किसी बच्चे को चार-पांच लोग अपने कंधों पर उठाते हैं। यह सिर्फ मजबूरी नहीं। यह स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने खड़ा एक आईना है। उत्तराखंड की स्वास्थ्य समस्या केवल अस्पतालों की संख्या की समस्या नहीं है। यह दूरी की समस्या भी है। अस्पताल है तो कितनी दूर? सड़क है तो मरीज के घर तक है या नहीं? सड़क है तो बारिश में चलती है या नहीं? एंबुलेंस है तो गांव तक पहुंचती है या नहीं? और अगर एंबुलेंस नहीं पहुंचती तो मरीज को सड़क तक कौन पहुंचाएगा? इन सवालों का जवाब किसी सरकारी भवन की दीवार पर नहीं लिखा है। इसका जवाब पहाड़ का ग्रामीण अपने कंधे पर लिखता है। वही कंधा जिस पर कभी घास की गठरी होती थी, अब उसी पर मरीज की जिंदगी रखी होती है। सरकारी रिपोर्ट में लिखा जाएगाकृस्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। कहीं लिखा होगाकृदूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत की गई हैं। किसी बैठक में कहा जाएगाकृग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर कनेक्टिविटी सरकार की प्राथमिकता है। लेकिन जिस दिन किसी गांव का आदमी घायल होता है, उसे इन वाक्यों की जरूरत नहीं होती। उसे डाक्टर चाहिए। उसे एंबुलेंस चाहिए। उसे सड़क चाहिए और सबसे बढ़कर उसे समय चाहिए। क्योंकि पहाड़ में अस्पताल तक पहुंचने में लगने वाला अतिरिक्त एक घंटा केवल एक घंटा नहीं होता।वह मरीज की जिंदगी और मौत के बीच का अंतर हो सकता है। यह सवाल विकास विरोधी नहीं है। बल्कि यह विकास की गुणवत्ता का सवाल है। अगर किसी गांव तक सड़क नहीं पहुंच सकती तो कम से कम ऐसी वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं है जिससे आपातकाल में मरीज को सुरक्षित और तेजी से सड़क तक पहुंचाया जा सके? अगर सड़क भूस्खलन से बंद हो जाती है तो वैकल्पिक मार्ग क्या है? क्या हर संवेदनशील गांव के लिए स्थानीय आपदा-चिकित्सा योजना है? क्या प्रशिक्षित ग्रामीण स्वयंसेवक हैं? क्या प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था है? क्या हर दूरस्थ गांव के लिए आपातकालीन संपर्क और परिवहन व्यवस्था वास्तव में काम करती है? या फिर हमारी पूरी व्यवस्था इस उम्मीद पर चल रही है कि हादसा होने से पहले कोई हादसा न हो? उत्तराखंड के गांवों में डोली उठाने वाले लोग किसी योजना का हिस्सा नहीं होते। वह पड़ोसी होते हैं। रिश्तेदार होते हैं। दोस्त होते हैं। कभी-कभी अनजान ग्रामीण भी मदद के लिए कंधा दे देते हैं। उनके पास कोई सरकारी एंबुलेंस नहीं होती। कोई सायरन नहीं होता। कोई मेडिकल टीम नहीं होती। सिर्फ एक आदमी होता है जिसे बचाना है और चार-पांच लोग होते हैं जो उसे बचाने के लिए अपना कंधा दे रहे होते हैं। यही उत्तराखंड की सबसे मार्मिक तस्वीर है। जिस पहाड़ ने देश को सैनिक दिए, श्रमिक दिए, पर्यटन दिया, नदियां दीं, पानी दियाकृवही पहाड़ आज भी अपने बीमार और घायल लोगों को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए अपने लोगों के कंधों पर निर्भर है। चुनाव आते हैं तो पहाड़ के लिए बड़े-बड़े वादे होते हैं। पलायन रोकेंगे। सड़क देंगे। स्वास्थ्य सुधारेंगे। गांवों को आधुनिक बनाएंगे। लेकिन किसी नेता से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिएकृ क्या आपके विकास माडल में वह गांव शामिल है जहां आज भी मरीज को डोली में अस्पताल ले जाना पड़ता है? क्या विकास की सफलता किलोमीटर सड़क से मापी जाएगी या इस बात से कि आपातकाल में एंबुलेंस कितने मिनट में मरीज तक पहुंचती है? क्या स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता अस्पतालों की इमारतों से तय होगी या इस बात से कि किसी पहाड़ी मां को अपने बेटे को डोली में लादकर कितनी दूर नहीं चलना पड़ा? यही असली कसौटी है। हर बार जब ऐसी तस्वीर सामने आती है तो सोशल मीडिया पर लोग दुख जताते हैं। उत्तराखंड की असली तस्वीर। यह कैसी स्वास्थ्य व्यवस्था? सरकार कब जागेगी? फिर कुछ दिन बाद दूसरी खबर आ जाती है। लेकिन डोली वहीं रहती है। पगडंडी वहीं रहती है। दूर अस्पताल वहीं रहता है और अगला मरीज भी शायद उसी रास्ते से जाएगा। इसलिए सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, पूरे समाज और व्यवस्था से है। क्यों हम उस तस्वीर को सामान्य मान बैठे हैं जिसमें चार इंसान पांचवें इंसान को कंधे पर उठाकर अस्पताल ले जा रहे हैं? डोली पहाड़ की परंपरा हो सकती है। लेकिन आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था का विकल्प नहीं। जिस दिन पहाड़ के किसी गांव में घायल को डोली की जरूरत नहीं पड़ेगी, उस दिन शायद हम कह सकेंगे कि विकास सचमुच गांव तक पहुंचा है। उस दिन सड़क सिर्फ कागज पर नहीं होगी। अस्पताल सिर्फ भवन नहीं होगा और एंबुलेंस सिर्फ सरकारी वाहन नहीं होगी। वह सचमुच मरीज तक पहुंचेगी। तब पहाड़ का कंधा फिर घास की गठरी उठाएगा, लकड़ी उठाएगा, बच्चे को स्कूल पहुंचाएगा। लेकिन किसी मरीज की जिंदगी को अस्पताल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी उसे अपने कंधे पर नहीं उठानी पड़ेगी। यही वह दिन होना चाहिए जिसे उत्तराखंड विकास का असली प्रमाण माने।

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