गुरुवार, 20 अगस्त 2026

गलती से भी वोट नहीं देंगे

शहर-शहर मोदी के खिलाफ गुस्सा, सड़क पर जनता सत्ता के खिलाफ नाराजगी ने बदली राजनीतिक भाषा प्रदर्शन और सोशल मीडिया के नारों में दिखाअसंतोष अब सवाल सिर्फ विरोध का नहीं, वोट के फैसले का देहरादून। देश की राजनीति में नाराजगी अक्सर भाषणों में दिखाई देती है, लेकिन जब यही नाराजगी सड़क पर उतरने लगे तो सत्ता के लिए सवाल थोड़ा कठिन हो जाता है। इन दिनों अलग-अलग मुद्दों को लेकर शहरों में हो रहे प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर उभरते विरोध के बीच एक वाक्य तेजी से राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बन रहा हैकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। यह सिर्फ एक नारा है या बदलते जनमत का संकेत, इसका फैसला चुनाव में होगा। लेकिन इतना जरूर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को लेकर विपक्षी राजनीति का स्वर अब पहले से ज्यादा आक्रामक है। महंगाई, रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं की गड़बड़ियां, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दे इस नाराजगी को लगातार खाद-पानी दे रहे हैं। आज का राजनीतिक विरोध सिर्फ किसी पार्टी के कार्यालय या बड़ी रैली तक सीमित नहीं है। शहरों में छोटे-छोटे प्रदर्शन हो रहे हैं, युवा अपनी समस्याओं के साथ सामने आ रहे हैं और सोशल मीडिया पर सरकार से सीधे सवाल पूछे जा रहे हैं। एक समय था जब किसी आंदोलन की आवाज को स्थानीय बताकर नजरअंदाज किया जा सकता था। अब मोबाइल कैमरा उस आंदोलन को कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंचा देता है। यही वजह है कि बेरोजगारी या परीक्षा व्यवस्था से जुड़ी किसी घटना का असर केवल संबंधित राज्य तक सीमित नहीं रहता। दूसरे राज्यों के युवा भी उसमें अपना भविष्य देखने लगते हैं। युवाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल रोजगार का है। इसके साथ प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसी घटनाओं ने भरोसे को चोट पहुंचाई है। एक अभ्यर्थी के लिए परीक्षा केवल परीक्षा नहीं होती। उसके पीछे वर्षों की तैयारी, परिवार का खर्च और भविष्य की उम्मीद जुड़ी होती है। जब परीक्षा प्रक्रिया सवालों में घिरती है तो गुस्सा सिर्फ व्यवस्था से नहीं, पूरी राजनीतिक व्यवस्था से होने लगता है। यही गुस्सा अब चुनावी सवाल में बदलने की कोशिश हो रही है। नौकरी चाहिए, भाषण नहीं। पेपर लीक बंद करो। भर्ती कैलेंडर दो। ऐसे सवालों का जवाब राजनीतिक नारों से देना मुश्किल है। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता भारतीय राजनीति की बड़ी वास्तविकता है। भाजपा के चुनावी अभियानों का केंद्र भी लंबे समय से मोदी का चेहरा रहा है। ऐसे में उनके खिलाफ उठने वाली आवाज को हल्के में लेना भी संभव नहीं, लेकिन उसे पूरे देश की राय मान लेना भी जल्दबाजी होगी। सड़क पर विरोध करने वाला हर व्यक्ति विपक्ष का मतदाता हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन राजनीति में संकेतों की अपनी अहमियत होती है। यदि सरकार के समर्थक वर्ग के भीतर भी रोजगार, परीक्षा और महंगाई जैसे मुद्दों पर सवाल बढ़ते हैं, तो यह सत्ता के लिए चेतावनी जरूर बन सकता है। यहां विपक्ष के सामने भी बड़ी चुनौती है। सिर्फ यह कहना कि जनता मोदी से नाराज है, पर्याप्त नहीं होगा। जनता पूछेगीकृतो विकल्प क्या है? युवा पूछेगा कि रोजगार पर आपकी नीति क्या है? परीक्षाओं को पारदर्शी बनाने के लिए क्या करेंगे? पेपर लीक रोकने की जिम्मेदारी किसकी होगी? सरकारी भर्तियां समय पर कैसे होंगी? यानी सत्ता से नाराजगी को वोट में बदलने के लिए विपक्ष को सिर्फ विरोध नहीं, भरोसे का विकल्प भी देना होगा। चुनाव अभी दूर हो सकते हैं, लेकिन राजनीति में माहौल पहले बनता है और मतदान बाद में होता है। आज का प्रदर्शन कल का वोट बनेगा, यह तय नहीं। लेकिन आज का सवाल कल के चुनावी मुद्दे में बदल सकता है। गलती से भी वोट नहीं देंगे कहने वाली भीड़ अगर मतदान के दिन भी उसी गुस्से के साथ खड़ी रही, तो सत्ता के लिए यह सामान्य विरोध नहीं रहेगा। क्योंकि लोकतंत्र में जनता पहले सवाल पूछती है, फिर बहस करती है और अंत में वोट के जरिए फैसला सुनाती है। फिलहाल शहरों की सड़कों पर जो आवाज सुनाई दे रही है, वह सत्ता को हटाने का फैसला नहीं है। मगर यह इतना जरूर कह रही है कि जनता को सिर्फ उपलब्धियों की सूची नहीं, अपने सवालों के जवाब भी चाहिए और चुनावी राजनीति में यही सवाल सबसे भारी पड़ते हैं कि नौकरी कहां है? परीक्षा सुरक्षित क्यों नहीं? महंगाई का बोझ कब घटेगा? और अगर जनता नाराज है, तो क्या सत्ता उसकी आवाज सुन रही है?

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