गुरुवार, 20 अगस्त 2026

उत्तराखंड कांग्रेस में ‘हलचल’

कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में हरीश रावत शिरकत ने बढ़ाई सियासी हलचल लंबे राजनीतिक अनुभव के बल पर रावत एक बार फिर पार्टी में अपनी धमक नए नेतृत्व की चर्चाओं के बीच उनकी सक्रियता से समीकरण बदलने के आसार देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति में एक बार फिर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की सक्रियता चर्चा में है। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में उनकी शिरकत ने प्रदेश की सियासत में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत की भूमिका को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जाते रहे हैं, ऐसे में पार्टी के शीर्ष मंच पर उनकी मौजूदगी को महज औपचारिकता मानने के बजाय राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल हैं जिनकी प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान और व्यापक राजनीतिक अनुभव है। मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री तक की जिम्मेदारी संभाल चुके रावत लगातार प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। हालांकि पिछले कुछ समय में कांग्रेस के भीतर नई पीढ़ी के नेतृत्व और संगठनात्मक बदलाव को लेकर जिस तरह की कवायद हुई है, उसमें रावत की सक्रियता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। बैठक में उनकी मौजूदगी ने इन चर्चाओं को फिर हवा दे दी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस हाईकमान उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत के अनुभव का फिर से अधिक इस्तेमाल करने की तैयारी में है? 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को एकजुट रखने और सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में राजनीतिक वोट में बदलने की है। ऐसे में हरीश रावत जैसे अनुभवी नेता की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। रावत प्रदेश के राजनीतिक भूगोल, सामाजिक समीकरण और कांग्रेस संगठन की अंदरूनी राजनीति से लंबे समय से परिचित हैं। पहाड़ से लेकर मैदानी क्षेत्रों तक उनकी राजनीतिक पहुंच को पार्टी चुनावी रणनीति में इस्तेमाल करना चाहे तो यह कांग्रेस के लिए फायदेमंद हो सकता है। उत्तराखंड कांग्रेस में पिछले कुछ समय से नेतृत्व को लेकर कई स्तरों पर बदलाव देखने को मिले हैं। नई प्रदेश कार्यकारिणी, संगठन को मजबूत करने की कोशिश और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच पार्टी को पुराने अनुभवी नेताओं और नए नेतृत्व के बीच संतुलन बनाना होगा। हरीश रावत की सक्रियता इसी संतुलन की राजनीति का हिस्सा मानी जा सकती है। हालांकि इसका यह अर्थ निकालना जल्दबाजी होगा कि रावत को कोई नई औपचारिक जिम्मेदारी मिलने जा रही है। लेकिन कांग्रेस की शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था की बैठक में उनकी भागीदारी यह जरूर बताती है कि पार्टी में उनका राजनीतिक महत्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। उत्तराखंड में अगला विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिए महत्वपूर्ण होगा। भाजपा जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस सत्ता में लौटने के लिए मजबूत रणनीति बनाने में जुटी है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल केवल भाजपा विरोधी वोट को एकजुट करने का नहीं, बल्कि अपने भीतर के मतभेदों को नियंत्रित करने का भी है। प्रदेश कांग्रेस में अलग-अलग नेताओं के अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र हैं। ऐसे में हरीश रावत की भूमिका केवल चुनावी चेहरा होने तक सीमित नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर समन्वय कायम करने में भी महत्वपूर्ण हो सकती है। राजनीति में किसी वरिष्ठ नेता की एक बैठक में मौजूदगी को लेकर अंतिम निष्कर्ष निकालना ठीक नहीं होता। लेकिन चुनावी साल की ओर बढ़ते उत्तराखंड में हर राजनीतिक गतिविधि के अपने मायने होते हैं। हरीश रावत की बैठक में मौजूदगी ने कम से कम इतना संकेत जरूर दिया है कि पूर्व मुख्यमंत्री अभी राजनीतिक पारी के किनारे खड़े होकर सिर्फ घटनाक्रम देखने वाले नेता नहीं हैं। वे राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की गतिविधियों में भागीदारी कर रहे हैं और उत्तराखंड के संदर्भ में उनकी राजनीतिक उपयोगिता भी बनी हुई है। अब नजर इस बात पर होगी कि कांग्रेस हाईकमान आगामी महीनों में रावत को किस भूमिका में देखता है। क्या उन्हें प्रदेश में चुनावी रणनीति की जिम्मेदारी दी जाएगी? क्या वह वरिष्ठ नेताओं के बीच समन्वय की भूमिका निभाएंगे? या फिर कांग्रेस उन्हें एक बड़े चुनावी अभियान के चेहरे के तौर पर इस्तेमाल करेगी? फिलहाल इतना तय है कि हरीश रावत की सक्रियता ने उत्तराखंड कांग्रेस की सियासत में पुराने समीकरणों की फाइल फिर खोल दी है। 2027 की चुनावी बिसात जैसे-जैसे बिछेगी, रावत की भूमिका भी उतनी ही ज्यादा चर्चा में आने की संभावना है।

कोई टिप्पणी नहीं: