शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

चुनावी रण से पहले ‘मीडिया मैनेजमेंट’ एक्टिव

भाजपा फुल एक्टिव, कांग्रेस सुस्त, बाकी दलों की आवाज कहां मीडिया मैनेजमेंट के मोर्चे पर भाजपा सबसे आगे, कांग्रेस है पीछे चुनाव से पहले कांग्रेस के पास मौके, लेकिन प्रचार मशीनरी बंद भाजपा चला रही विज्ञप्ति-बाण, कांग्रेस का संचार तंत्र अभी सुस्त देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की औपचारिक घोषणा भले अभी बाकी हो, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियों का रिहर्सल शुरू कर दिया है। कहीं बूथ मजबूत किए जा रहे हैं, कहीं संगठन की बैठकें हो रही हैं और कहीं टिकट के दावेदार शक्ति प्रदर्शन में जुटे हैं। लेकिन इस पूरी चुनावी तैयारी में एक ऐसा मोर्चा भी है, जहां भाजपा फिलहाल बाकी दलों से काफी आगे दिखाई दे रही हैकृमीडिया मैनेजमेंट। अखबारों के न्यूजरूम तक पहुंचने वाली प्रेस विज्ञप्तियों पर नजर डालें तो तस्वीर काफी दिलचस्प है। भाजपा की ओर से एक दिन में पांच से दस तक विज्ञप्तियां पहुंच रही हैं। बयान, कार्यक्रम, संगठनात्मक बैठकें, सरकार की उपलब्धियां, विपक्ष पर हमले और स्थानीय गतिविधियांकृहर मुद्दे को मीडिया तक पहुंचाने की कोशिश दिखाई दे रही है। इसके उलट कांग्रेस की तरफ से कई दिनों में महज एक-दो विज्ञप्तियां ही पहुंचती हैं। पार्टी के पास मुद्दे हैं, नेता हैं, बयान हैं और सरकार को घेरने के मौके भी हैं, लेकिन उन्हें लगातार और व्यवस्थित तरीके से मीडिया तक पहुंचाने की मशीनरी उतनी सक्रिय नजर नहीं आती। चुनाव में यह अंतर सिर्फ प्रेस विज्ञप्तियों का नहीं, राजनीतिक संचार की तैयारी का संकेत है। भाजपा ने लंबे समय से यह समझ लिया है कि चुनाव सिर्फ मैदान में नहीं लड़ा जाता। चुनाव की लड़ाई अखबारों, टीवी चैनलों, डिजिटल प्लेटफार्म और सोशल मीडिया पर भी लड़ी जाती है। इसलिए पार्टी के पास संगठन के साथ-साथ संदेश पहुंचाने का तंत्र भी लगातार सक्रिय रहता है। एक कार्यक्रम हुआ नहीं कि तस्वीरें तैयार। नेता ने बयान दिया नहीं कि प्रेस नोट तैयार। सरकार ने कोई उपलब्धि गिनाई नहीं कि उसका प्रचार शुरू। विपक्ष ने कोई आरोप लगाया नहीं कि उसका जवाब भी तैयार। यानी भाजपा का संदेश हैकृखबर खत्म होने से पहले हमारी प्रतिक्रिया खबर में होनी चाहिए। इसके सामने कांग्रेस का मीडिया तंत्र कई बार ऐसा दिखाई देता है जैसे पार्टी को खबर बनने के बाद खबर याद आती हो। कांग्रेस के पास बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, महंगाई, पलायन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मुद्दों की कमी नहीं है। सरकार को घेरने के लिए उसके पास सामग्री की पूरी फाइल है। लेकिन सवाल यह है कि उस फाइल को रोज जनता तक पहुंचाने वाला कौन है? राजनीति में मुद्दा होना पर्याप्त नहीं है। मुद्दे को जनता की भाषा में लगातार सामने रखना भी पड़ता है। कांग्रेस अगर सप्ताह में एक-दो बार प्रेस नोट जारी करके यह मान ले कि उसने विपक्ष की भूमिका निभा दी, तो भाजपा की लगातार चलने वाली मीडिया मशीनरी के सामने उसका संदेश स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ेगा और बाकी दल? उनकी स्थिति तो और भी कठिन है। उत्तराखंड क्रांति दल राज्य की अस्मिता, मूल निवास और क्षेत्रीय मुद्दों की राजनीति को फिर से धार देने की कोशिश कर रहा है। आम आदमी पार्टी सरकार और विपक्ष दोनों पर सवाल उठा सकती है। बसपा का अपना सामाजिक आधार है। वाम दलों के पास मुद्दों की कमी नहीं। छोटे क्षेत्रीय और नए राजनीतिक समूह भी चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन मीडिया में मौजूदगी के मामले में इनमें से अधिकांश दल या तो कभी-कभार दिखाई देते हैं या चुनाव के करीब आते ही सक्रिय होने की उम्मीद में बैठे हैं। यहीं सबसे बड़ा खतरा है। क्योंकि मीडिया कोई चुनावी लाउडस्पीकर नहीं है, जिसे मतदान से दो महीने पहले आन कर दिया जाए। जनता को लगातार बताना पड़ता है कि पार्टी क्या सोचती है, क्या चाहती है और सत्ता में आने पर क्या करेगी। भाजपा इस मोर्चे पर फिलहाल बाकी दलों से आगे है। लेकिन कांग्रेस के लिए यह स्थिति चेतावनी भी है और अवसर भी। अगर कांग्रेस सचमुच 2027 को गंभीरता से ले रही है तो उसे सिर्फ बड़े नेताओं के दौरों और प्रेस कान्फ्रेंस तक सीमित रहने के बजाय डेली मीडिया नैरेटिव बनाना होगा। हर दिन का एक मुद्दा, सरकार पर एक सवाल, जनता की एक समस्या और उसका राजनीतिक समाधानकृयह लगातार जनता तक जाना चाहिए। क्योंकि चुनाव में जनता को वही दिखाई देता है जो लगातार दिखाई देता है। यहां एक और दिलचस्प सवाल हैकृक्या मीडिया मैनेजमेंट चुनाव जिताता है? सिर्फ मीडिया मैनेजमेंट से चुनाव नहीं जीता जा सकता। लेकिन खराब मीडिया मैनेजमेंट चुनावी संदेश को जरूर कमजोर कर सकता है। भाजपा अगर रोज दस बातें जनता तक पहुंचा रही है और कांग्रेस रोज एक बात भी मुश्किल से पहुंचा रही है तो जनता के सामने किसकी मौजूदगी ज्यादा होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है और छोटे दलों के लिए तो चुनौती और बड़ी है। उनके पास संसाधन कम हो सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उनके पास खबरें नहीं हैं। आज डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया, स्थानीय पत्रकारों और क्षेत्रीय मुद्दों के माध्यम से कम खर्च में भी मजबूत राजनीतिक संवाद बनाया जा सकता है। लेकिन उसके लिए चाहिएकृनियमितता, रणनीति और राजनीतिक संदेश की स्पष्टता। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 की जमीन तैयार हो रही है। भाजपा संगठन और मीडिया दोनों स्तर पर पहले से सक्रिय दिखाई दे रही है। कांग्रेस सरकार विरोधी माहौल को राजनीतिक विकल्प में बदलने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसके संदेश की निरंतरता सवालों में है। यूकेडी और दूसरे छोटे दल जनता के मुद्दे उठा रहे हैं, मगर उनकी आवाज का विस्तार सीमित है। आखिर चुनाव सिर्फ यह नहीं है कि कौन जनता के बीच गया। यह भी है कि कौन जनता के दिमाग में लगातार मौजूद रहा और मीडिया की इस लड़ाई में अभी तस्वीर साफ है।कृभाजपा रोज दस्तक दे रही है, कांग्रेस कभी-कभार दरवाजा खटखटा रही है और बाकी दल शायद यह इंतजार कर रहे हैं कि चुनाव की तारीख घोषित हो और दरवाजा अपने आप खुल जाए। लेकिन राजनीति में दरवाजे अपने आप नहीं खुलते, उन्हें रोज खटखटाना पड़ता है।

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