शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

लोकतंत्र की पहली शर्त पर ‘पालिटिकल वार’

उत्तराखंड में मतदाता सूची पर बढ़ी रार, मतदाता सूची की शुद्धि पर गरमाई राजनीति वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का खतरा, कांग्रेस ने सत्यापन की उठाई मांग सूची की सफाई पर विरोध क्यों, भाजपा बोली फर्जी नामों को हटाना बेहद जरूरी देहरादून। लोकतंत्र की सबसे पहली शर्त है कि मतदाता सूची साफ हो, सही हो और उसमें वही नाम हों जो वास्तव में मतदान के पात्र हैं। लेकिन उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सियासत लगातार गरमाती जा रही है। कांग्रेस इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा इसे मतदाता सूची को शुद्ध करने की जरूरी कवायद बता रही है। सवाल अब यह उठ रहा है कि अगर एसआईआर का मकसद मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना है तो कांग्रेस को इससे परेशानी क्यों हो रही है? कांग्रेस का तर्क है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में वास्तविक मतदाताओं के नाम कटने का खतरा है और किसी भी पात्र नागरिक को मतदान के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। पार्टी लगातार मांग कर रही है कि प्रक्रिया पारदर्शी हो और प्रत्येक नाम हटाने से पहले उचित सत्यापन किया जाए। लेकिन भाजपा कांग्रेस के इस विरोध को राजनीतिक चश्मे से देख रही है। भाजपा नेताओं का सवाल है कि अगर मतदाता सूची में फर्जी, डुप्लीकेट या अपात्र नाम हैं तो उन्हें हटाने का विरोध क्यों? लोकतंत्र में मतदाता सूची जितनी साफ होगी, चुनाव उतने ही निष्पक्ष होंगे। यहीं से एसआईआर सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक बहस का मुद्दा बन जाता है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर वह चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता की बात करती है तो उसे मतदाता सूची के शुद्धिकरण का सिद्धांततः विरोध क्यों करना चाहिए? उसे यह स्पष्ट करना होगा कि वह एसआईआर के खिलाफ है या उस तरीके के खिलाफ जिसमें एसआईआर को लागू किया जा रहा है। दूसरी तरफ सरकार और निर्वाचन तंत्र की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। सिर्फ यह कह देना पर्याप्त नहीं कि सूची शुद्ध की जा रही है। यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वास्तविक मतदाता का नाम गलती से न कटे। खासकर पहाड़ी और दूरदराज के इलाकों में जहां पलायन, अस्थायी निवास और दस्तावेजों से जुड़े सवाल पहले से जटिल हैं, वहां विशेष सावधानी की जरूरत है। मतदाता सूची की शुचिता लोकतंत्र की बुनियाद है। इसमें फर्जी नाम नहीं होने चाहिए, लेकिन किसी वास्तविक नागरिक का नाम भी सिर्फ तकनीकी गलती से नहीं हटना चाहिए। कांग्रेस को बताना होगा कि उसे शुद्ध मतदाता सूची से परेशानी है या प्रक्रिया से और सरकार को बताना होगा कि वह शुद्धिकरण के नाम पर किसी वास्तविक मतदाता के अधिकार की रक्षा कैसे करेगी। आखिर चुनाव सिर्फ जीतने-हारने का खेल नहीं है। मतदाता सूची में दर्ज हर नाम लोकतंत्र में एक नागरिक की आवाज है। इसलिए एसआईआर पर राजनीति हो सकती है, लेकिन मतदाता के अधिकार से खिलवाड़ नहीं। 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच मतदाता सूची पर उठते सवालों को हल्के में लेना किसी भी दल के लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकता है। कांग्रेस हो या भाजपाकृदोनों को याद रखना होगा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ा वोट बैंक कोई पार्टी नहीं, खुद मतदाता है।

कोई टिप्पणी नहीं: