गुरुवार, 13 अगस्त 2026
कागजों के फेर में फंसा वोटर, सवालों में अफसर
अपात्रों पर नकेल कसने के नाम पर आम जनता को कागजों के फेर में उलझाया
निर्वाचन नियमावली के पुनरीक्षण में लगे अफसरों के पास प्रक्रिया का जवाब नहीं
उत्तराखंड में पारदर्शिता, जवाबदेही और भरोसे पर उठ रहे हैं कई गंभीर सवाल
देहरादून। चुनाव लोकतंत्र का वह दरवाजा है, जहां से जनता सत्ता तक पहुंचती है। इस दरवाजे की कुंडी अगर पारदर्शी न हो तो सवाल केवल मतदाता सूची का नहीं रहता, सवाल लोकतंत्र के भरोसे का बन जाता है। उत्तराखंड में निर्वाचन नियमावली के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवाल इसी भरोसे से जुड़े हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य होना चाहिएकृहर पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल हो और किसी अपात्र व्यक्ति का नाम न रहे। लेकिन जब इसी प्रक्रिया के दौरान आम नागरिकों को नोटिस मिलने लगें, पुराने दस्तावेज मांगे जाने लगें और लोगों को यह समझ न आए कि आखिर उनसे किस आधार पर जानकारी मांगी जा रही है, तब सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या पुनरीक्षण की प्रक्रिया वास्तव में उतनी ही पारदर्शी है, जितनी होनी चाहिए?
एक बुजुर्ग दशकों से मतदान कर रहा है। उसका नाम मतदाता सूची में है। वह चुनाव-दर-चुनाव वोट डालता आया है। अचानक उससे ऐसे दस्तावेज मांगे जाते हैं, जिन्हें जुटाना उसके लिए आसान नहीं। उसका सवाल सीधा हैकृकि जब इतने साल से मेरा वोट स्वीकार किया गया, तो अब मेरी नागरिकता या पहचान साबित करने की जिम्मेदारी अचानक मेरे कंधे पर क्यों आ गई? यही सवाल उन तमाम लोगों का है, जो पुनरीक्षण प्रक्रिया को लेकर असमंजस में हैं। निर्वाचन सूची का पुनरीक्षण जरूरी है। फर्जी नाम हटने चाहिए। मृत लोगों के नाम हटने चाहिए। स्थान बदल चुके मतदाताओं की जानकारी दुरुस्त होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि वास्तविक मतदाता को अनावश्यक परेशानी न हो। क्योंकि मतदाता सूची सिर्फ सरकारी कागज नहीं है। यही वह सूची है, जिसके आधार पर नागरिक लोकतंत्र में अपनी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
किसी प्रक्रिया को पारदर्शी कहने के लिए यह पर्याप्त नहीं कि उसके तहत नोटिस जारी कर दिए गए। पारदर्शिता का अर्थ हैकृकि किस आधार पर नोटिस दिया गया? किस दस्तावेज की जरूरत क्यों है? दस्तावेज न होने पर क्या विकल्प है? आपत्ति दर्ज करने की प्रक्रिया क्या है? किस अधिकारी के सामने अपील की जा सकती है? कितने समय में शिकायत का निपटारा होगा? इन सवालों के जवाब आम मतदाता तक स्पष्ट भाषा में पहुंचने चाहिए। अगर मतदाता को यह पता ही नहीं कि उससे दस्तावेज क्यों मांगा जा रहा है, तो प्रक्रिया पारदर्शी होने के बावजूद पारदर्शी दिखाई नहीं देगी और लोकतंत्र में भरोसा केवल नियमों से नहीं बनता। भरोसा प्रक्रिया की निष्पक्षता से बनता है।
मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य लोगों में डर पैदा करना नहीं होना चाहिए। अगर कोई बुजुर्ग यह सोचकर परेशान हो जाए कि उसके वोट पर सवाल उठ रहा है, कोई परिवार दस्तावेज जुटाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटने लगे या किसी नागरिक को यह डर सताने लगे कि कहीं उसका नाम सूची से न हट जाए, तो प्रशासन को यह देखना होगा कि प्रक्रिया जमीन पर कैसी दिखाई दे रही है। कागज पर प्रक्रिया सही हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा जमीन पर होती है। ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। विपक्ष को सवाल उठाने चाहिए। यदि कहीं नियमों का दुरुपयोग हो रहा है तो उसे सामने लाना चाहिए। प्रभावित नागरिकों की आवाज उठानी चाहिए। लेकिन केवल राजनीतिक आरोप पर्याप्त नहीं होंगे। हर शिकायत की तथ्यात्मक जांच होनी चाहिए। वहीं सरकार और निर्वाचन तंत्र की जिम्मेदारी इससे भी बड़ी है। उसे स्पष्ट करना होगा कि पुनरीक्षण में कौन से नियम लागू हैं, नागरिकों से कौन-कौन से दस्तावेज मांगे जा सकते हैं और किन परिस्थितियों में किसी मतदाता के नाम पर आपत्ति दर्ज की जा सकती है। जितनी स्पष्ट जानकारी होगी, उतना कम भ्रम होगा।
सड़क टूट जाए तो बनाई जा सकती है। सरकारी योजना में गलती हो तो सुधारी जा सकती है। लेकिन चुनावी प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा कमजोर हो जाए तो उसकी कीमत बहुत बड़ी होती है। क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ वोट डालने का नाम नहीं है। लोकतंत्र यह भरोसा भी है किकृमेरा वोट सुरक्षित है। मेरा नाम बिना उचित प्रक्रिया के नहीं हटेगा। मेरी आपत्ति सुनी जाएगी। दूसरे नागरिक के साथ भी वही नियम लागू होंगे जो मेरे साथ लागू हुए। यही समानता लोकतंत्र की बुनियाद है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण होना चाहिए। जितनी बार जरूरत हो, उतनी बार होना चाहिए। फर्जी नाम हटने चाहिए। गलतियां सुधरनी चाहिए। नए पात्र मतदाताओं के नाम जुड़ने चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में वास्तविक मतदाता सबसे कम परेशान हो और फर्जीवाड़े की गुंजाइश सबसे कम होकृक्या इसकी पर्याप्त गारंटी है? यही वह सवाल है, जिसका जवाब निर्वाचन तंत्र को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए। क्योंकि अगर एक पात्र नागरिक दस्तावेजों के बोझ में दब जाए और दूसरी तरफ कोई अपात्र नाम व्यवस्था की कमजोरी का फायदा उठा ले, तो पुनरीक्षण अपने उद्देश्य से भटक जाएगा।
चुनाव आयोग और प्रशासन के सामने चुनौती सिर्फ सूची को साफ करने की नहीं है। चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि सफाई के नाम पर किसी वास्तविक नागरिक का लोकतांत्रिक अधिकार प्रभावित न हो। उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में दस्तावेज जुटाना, कार्यालय तक पहुंचना और बार-बार सत्यापन कराना हर व्यक्ति के लिए आसान नहीं है, वहां प्रक्रिया को और अधिक संवेदनशील बनाने की जरूरत है। नियम एक जैसे हों, लेकिन व्यवस्था मानवीय हो। नोटिस हो तो उसका कारण साफ लिखा हो। दस्तावेज मांगा जाए तो विकल्प भी बताया जाए। आपत्ति हो तो सुनवाई का अवसर मिले और सबसे जरूरी है कि हर कदम का रिकार्ड सार्वजनिक और जांच योग्य हो। क्योंकि चुनाव केवल राजनीतिक दलों की परीक्षा नहीं है। यह चुनावी व्यवस्था की भी परीक्षा है। आज सवाल यह नहीं कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण क्यों हो रहा है। सवाल यह है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है, कितनी जवाबदेह है और आम नागरिक को उस पर कितना भरोसा है। इस भरोसे को बनाए रखना सरकार, निर्वाचन तंत्र और राजनीतिक दलकृतीनों की साझा जिम्मेदारी है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा दस्तावेज कोई पहचान पत्र नहीं होता। सबसे बड़ा दस्तावेज जनता का भरोसा होता है और इस भरोसे पर कोई भी ऐसा सवाल नहीं उठना चाहिए, जिसका जवाब देने में व्यवस्था खुद असहज हो जाए।
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