गुरुवार, 27 अगस्त 2026
उत्तराखंड में रक्षाबंधन पर चुनावी ‘प्रेम’
नेताओं की कलाई पर लगा राखियों का अंबार
त्योहार के आड़ में शुरू हुआ कार्यक्रमों का दौर
भाईचारे से ज्यादा वोटों की गणित साधी जा रही
कलाई पर चढ़ती राखियों की परतें, मंच के बैनर
बहन की कलाई से चुनावी ताकत नाप रहे हैं नेता
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं, लेकिन चुनावी मौसम की आहट इतनी साफ सुनाई देने लगी है कि अब राखी के धागे में भी राजनीति दिखाई देने लगी है। शहर से लेकर कस्बों तक रक्षाबंधन कार्यक्रमों की धूम है। कहीं महिला सम्मेलन के नाम पर बहनों को बुलाया जा रहा है, कहीं राखी बांधने का कार्यक्रम हो रहा है और कहीं मंच पर नेताओं की कलाई पर राखियों की इतनी परतें चढ़ रही हैं कि लगता है जैसे भाईचारे का प्रमाणपत्र बांटा जा रहा हो। सवाल यह नहीं कि राखी क्यों बांधी जा रही है। सवाल यह है कि राखी बांधने के बाद नेता क्या कर रहे हैं?
रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते का त्योहार है। लेकिन चुनाव के करीब आते-आते यह रिश्ता राजनीतिक फोटो फ्रेम में बदलता नजर आ रहा है। नेता बहनों के बीच पहुंच रहे हैं, राखियां बंधवा रहे हैं, आशीर्वाद ले रहे हैं और फिर तस्वीरें सोशल मीडिया पर पहुंच रही हैं। तस्वीर में नेता की कलाई है, सामने महिलाओं की भीड़ है और पीछे बड़े-बड़े बैनर हैं। राजनीति में अब शायद यही नया गणित हैकृजितनी राखियां, उतनी ताकत। लेकिन लोकतंत्र में ताकत राखियों की संख्या से नहीं, जनता के भरोसे से तय होती है।
उत्तराखंड की राजनीति में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। पहाड़ के गांवों में घर, खेत, पानी, जंगल और पलायन की मार सबसे ज्यादा महिलाओं ने झेली है। पहाड़ की महिला सिर्फ वोटर नहीं है, वह परिवार के राजनीतिक फैसले को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण आवाज भी है। शायद इसी वजह से चुनाव से पहले हर राजनीतिक दल और हर संभावित प्रत्याशी महिला मतदाताओं के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहता है। राखी इस राजनीति का सबसे आसान और भावनात्मक माध्यम बन गई है।
नेता बहनों से राखी बंधवा रहे हैं। बहनें भी राखी बांध रही हैं। मंच पर मुस्कान है। कैमरे हैं। भाषण हैं। तालियां हैं। लेकिन मंच से उतरने के बाद वही पुराना सवाल खड़ा हैकृमहिलाओं के लिए किया क्या? जिस बहन ने राखी बांधी, उसके गांव में पानी की समस्या है तो उसका समाधान कब होगा? जिस महिला ने मंच पर आकर नेता को भाई माना, उसके परिवार का बेटा रोजगार के लिए प्रदेश से बाहर क्यों जा रहा है? जिस महिला ने तालियां बजाईं, उसके गांव की सड़क बरसात में क्यों बंद हो जाती है? पहाड़ की बेटी की शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य की चिंता चुनावी कैलेंडर के किस पन्ने पर लिखी है? इन सवालों का जवाब राखी की फोटो में नहीं मिलता और यही उत्तराखंड की चुनावी राजनीति की असली कहानी है।
दरअसल, चुनाव से पहले नेताओं की गतिविधियां बदल जाती हैं। जनता अचानक परिवार बन जाती है। कोई बहनों का भाई बन जाता है, कोई युवाओं का साथी, कोई किसानों का हितैषी और कोई पहाड़ का बेटा। चुनाव बीतते ही रिश्तों की यह शब्दावली धीरे-धीरे सरकारी फाइलों की भाषा में बदल जाती है। इस बार राखी का राजनीतिक मौसम भी कुछ ऐसा ही संदेश दे रहा है। किसी नेता के कार्यक्रम में कितनी महिलाएं पहुंचीं, कितनी राखियां बंधीं, कितने समर्थक आए और कितनी तस्वीरें वायरल हुईंकृइन सबका हिसाब रखा जा रहा है। मानो विधानसभा चुनाव का सर्वे किसी चुनावी एजेंसी ने नहीं, राखी की थाली ने कर दिया हो।लेकिन चुनावी राजनीति इतनी सरल नहीं है।
महिलाएं अब सिर्फ मंच पर बैठकर भाषण सुनने वाली भीड़ नहीं हैं। वह सवाल पूछती हैं। वे सरकारी योजनाओं का लाभ देखती हैं। वह अपने बच्चों के रोजगार को देखती हैं। महंगाई महसूस करती हैं। सड़क, अस्पताल और स्कूल की हालत जानती हैं। उन्हें पता है कि चुनाव के समय कौन उनके घर आया था और पांच साल में कौन कितनी बार आया। इसलिए राखी बांधने की प्रतियोगिता में जुटे नेताओं को यह भी याद रखना चाहिए कि राखी की डोर भावनात्मक जरूर है, लेकिन मतदाता की स्मृति उससे भी मजबूत होती है।
उत्तराखंड में 2027 का चुनाव सिर्फ कुर्सी का चुनाव नहीं होगा। यह पांच साल के कामकाज का हिसाब मांगने वाला चुनाव भी होगा। यहां बेरोजगारी है, पलायन है, आपदा है, सड़कें हैं, शिक्षा और स्वास्थ्य के सवाल हैं। युवाओं की बेचौनी है। गांवों के खाली होते घर हैं। पहाड़ और मैदान के बीच विकास के सवाल हैं। इन सवालों के बीच अगर राजनीति सिर्फ राखी बांधने और फोटो खिंचवाने तक सीमित रह गई तो लोकतंत्र का त्योहार जरूर मनेगा, लेकिन जनता के सवाल फिर पीछे छूट जाएंगे।
राखी बांधिए, जरूर बांधिए। बहनों का सम्मान कीजिए। उनके बीच जाइए। लेकिन राखी के साथ जिम्मेदारी भी बांधिए। कलाई पर बंधी राखी अगर नेता को यह याद दिलाए कि बहन के गांव में पानी पहुंचाना है, उसके बच्चों को रोजगार देना है, उसकी सड़क ठीक करनी है और उसके परिवार को सुरक्षित भविष्य देना है, तभी इस रिश्ते का अर्थ है। वरना यह सिर्फ एक और चुनावी फोटो होगी और उत्तराखंड की जनता अब फोटो नहीं, हिसाब देखना चाहती है।
इसलिए चुनाव से पहले सबसे ज्यादा राखी बंधवाने वाले नेता को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि वही सबसे मजबूत है। असली ताकत उस दिन पता चलेगी, जब मतदाता की उंगली ईवीएम के बटन तक पहुंचेगी। कलाई पर राखी होगी। सामने उम्मीदवार होगा और बीच में पांच साल का हिसाब।
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