शुक्रवार, 28 अगस्त 2026
कुनबा बढ़ाने की ‘होड़’ में वोट बैंक का ‘गणित’
चुनाव नजदीक आते ही सामाजिक वर्गों को साधने की रणनीति तेज
प्रदेश में असरदार गोरखा समाज का मिला उत्तराखंड भाजपा का साथ
पकड़ मजबूत करने की कवायद, कांग्रेस पार्टी की बढ़ गई है चुनौती
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की चुनावी बिसात बिछने के साथ ही राजनीतिक दलों का कुनबा बढ़ाने और सामाजिक समीकरण साधने का सिलसिला तेज हो गया है। इसी क्रम में गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का भारतीय जनता पार्टी में विलय भाजपा के लिए एक अहम राजनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है। भाजपा इसे संगठन के विस्तार के साथ-साथ गोरखा समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता मजबूत होने के संकेत के तौर पर देख रही है। भाजपा का संदेश साफ हैकृ2027 में लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की तैयारी केवल नारों से नहीं, बल्कि समाज के अलग-अलग वर्गों को साथ जोड़कर की जा रही है। गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का पार्टी में विलय इसी रणनीति की एक कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।
दरअसल उत्तराखंड की राजनीति में गोरखा समाज की भूमिका लंबे समय से महत्वपूर्ण रही है। देहरादून और आसपास के क्षेत्रों में गोरखा समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति है। ऐसे में किसी राजनीतिक संगठन का भाजपा के साथ आना चुनावी दृष्टि से महज एक संगठन का विलय नहीं, बल्कि सामाजिक पहुंच बढ़ाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। भाजपा इसे अपने लिए इसलिए भी शुभ संकेत मान रही है क्योंकि विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही समय बचा है और पार्टी पहले से ही बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने की कवायद में जुटी है। ऐसे समय में अलग-अलग सामाजिक समूहों और क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों का भाजपा के साथ जुड़ना पार्टी के चुनावी अभियान को मनोवैज्ञानिक बढ़त देने वाला कदम माना जा रहा है।
हालांकि भाजपा के लिए असली परीक्षा अब शुरू होगी। किसी संगठन का विलय कागज पर जितना आसान दिखाई देता है, उसे चुनावी वोट में बदलना उतना ही चुनौतीपूर्ण होता है। गोरखा समाज के बीच भाजपा को यह साबित करना होगा कि विलय केवल चुनावी गणित का हिस्सा नहीं है, बल्कि समाज से जुड़े मुद्दों और अपेक्षाओं को भी पार्टी के राजनीतिक एजेंडे में पर्याप्त स्थान मिलेगा। यही विपक्ष के लिए भी बड़ा सवाल है। कांग्रेस और दूसरे राजनीतिक दल अब यह आकलन करने में जुटेंगे कि भाजपा के इस कदम का सामाजिक और चुनावी प्रभाव कितना हो सकता है। यदि विपक्ष ने इसे केवल एक राजनीतिक दल के विलय तक सीमित समझा तो भाजपा को इसका फायदा मिल सकता है। लेकिन यदि विपक्ष गोरखा समाज के स्थानीय मुद्दों, युवाओं की अपेक्षाओं, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक सम्मान को लेकर ठोस रणनीति तैयार करता है तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
भाजपा की रणनीति पिछले कुछ समय से स्पष्ट दिखाई दे रही है। पार्टी एक ओर संगठनात्मक ढांचे को मजबूत कर रही है, दूसरी ओर छोटे राजनीतिक समूहों और प्रभावशाली सामाजिक चेहरों को अपने साथ जोड़ रही है। लक्ष्य केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि चुनाव से पहले ऐसा राजनीतिक माहौल तैयार करना है जिसमें पार्टी का संगठनात्मक आत्मविश्वास दिखाई दे। गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का विलय इसी आत्मविश्वास को और बढ़ाने वाला घटनाक्रम माना जा रहा है। भाजपा इसे 2027 की हैट्रिक के लिए शुभ संकेत बता रही है। लेकिन चुनावी राजनीति में शुभ संकेत तभी परिणाम में बदलते हैं, जब संगठन की सक्रियता और जनता का समर्थन एक साथ दिखाई दे। 2022 में भाजपा ने लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी कर इतिहास बनाया था। अब उसके सामने उस प्रदर्शन को दोहराने के साथ-साथ सत्ता विरोधी माहौल की किसी भी संभावना को रोकने की चुनौती है।
ऐसे में हर राजनीतिक संगठन का साथ आना भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि पार्टी अपने पुराने समर्थकों के साथ नए सामाजिक समूहों को कितना प्रभावी ढंग से जोड़ पाती है। गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट के विलय ने फिलहाल भाजपा के चुनावी खेमे में उत्साह जरूर बढ़ाया है। इसे पार्टी 2027 की राह में एक और सकारात्मक संकेत के तौर पर देख रही है। मगर विपक्ष के लिए भी यह चेतावनी है कि चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन भाजपा ने अपनी चुनावी तैयारी को पहले ही गति दे दी है। अब सवाल यह नहीं कि भाजपा 2027 में हैट्रिक का सपना देख रही है या नहीं। सवाल यह है कि क्या विपक्ष उस सपने को चुनौती देने के लिए समय रहते अपना सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तैयार कर पाएगा? गोरखा डेमोक्रेटिक फ्रंट का भाजपा में विलय इसी बड़े चुनावी मुकाबले की एक नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।
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