शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

‘एक्स्ट्रा इनकम’ का लाइसेंस

उत्तराखंड में डाक्टरों को भी जल्द ही मिलेगा शाम का बाजार मजबूरी से निकलकर एक्स्ट्रा इनकम बनी देशभर में अधिकार डाक्टरों की निजी प्रैक्टिस की छूट से व्यवस्था पर उठेंगे सवाल देहरादून। सरकारी नौकरी में तनख्वाह मिलती है। तनख्वाह के बदले कर्मचारी से उम्मीद की जाती है कि वह अपने पद की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएगा। लेकिन धीरे-धीरे इस व्यवस्था में एक नया शब्द घुस आया हैकृएक्स्ट्रा इनकम। पहले यह शब्द फुसफुसाकर बोला जाता था। अब लगता है कि इसे व्यवस्था ने बाकायदा स्वीकार करना शुरू कर दिया है। पुलिस में ऊपर की कमाई की कहानियां पुरानी हैं। सरकारी दफ्तरों में फाइल आगे बढ़ाने की अपनी फीस है। कहीं काम कराने की कीमत है, कहीं काम रोकने की कीमत। कहीं ठेका है तो कहीं कमीशन। कहीं परमिट है तो कहीं सिफारिश। जनता को धीरे-धीरे समझा दिया गया कि सरकारी नौकरी की असली कमाई वेतन पर्ची में नहीं, उसके बाहर है और अब बेचारे डाक्टर भी बच गए थे। सरकार ने कहाकृउन्हें भी शाम को मरीज देखने दीजिए। खबर सुनकर शायद कोई कहेगा कि इसमें बुराई क्या है? डाक्टर हैं, मेहनत करेंगे, अतिरिक्त कमाई करेंगे। लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है। अगर सरकारी अस्पताल की नौकरी के बाद उसी सरकारी अस्पताल में निजी प्रैक्टिस होगी, तो मरीज सरकारी रहेगा या निजी? डाक्टर सरकारी रहेगा या निजी? अस्पताल सरकारी रहेगा या कमाई का साझा मंच? उत्तराखंड में सरकारी चिकित्सकों को शाम के समय सरकारी अस्पतालों में सशर्त निजी प्रैक्टिस की अनुमति देने की तैयारी है। यानी अब व्यवस्था का मॉडल कुछ ऐसा दिखाई दे रहा हैकृदिन में सरकार की नौकरी, शाम को उसी व्यवस्था में निजी कमाई। इसे सुविधा कहिए, सुधार कहिए या डाक्टरों को रोकने की कोशिश। लेकिन जनता का सवाल इससे खत्म नहीं होता। क्योंकि सरकारी अस्पताल में आने वाला गरीब मरीज यह सोचकर आता है कि यहां उसे निजी अस्पताल की तुलना में राहत मिलेगी। वह डाक्टर की फीस और अस्पताल के खर्च से बचने की उम्मीद लेकर आता है। अगर उसी सरकारी परिसर में निजी प्रैक्टिस का रास्ता खुलता है तो सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि सरकारी सेवा और निजी सेवा के बीच दीवार कहां होगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकारी व्यवस्था धीरे-धीरे ऐसी दुकान बन जाए जिसमें काउंटर दो होंकृएक सरकार के नाम पर और दूसरा निजी कमाई के नाम पर? यह सवाल डाक्टरों के खिलाफ नहीं है। बिल्कुल नहीं। डाक्टर मेहनत करते हैं, कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं, दूरदराज के इलाकों में सेवाएं देते हैं। स्वास्थ्य विभाग में डाक्टरों की कमी भी वास्तविक समस्या है और सरकारी आंकड़ों में मेडिकल आफिसर और विशेषज्ञों के पदों पर रिक्तियां दर्ज हैं। लेकिन सवाल व्यवस्था का है। अगर डाक्टरों को रोकने के लिए उन्हें अतिरिक्त कमाई का रास्ता देना जरूरी हो गया है, तो अगला सवाल यह होना चाहिए कि पुलिस को क्या दिया जाएगा? फिर पटवारी क्यों पीछे रहे? फिर तहसील का कर्मचारी क्यों पीछे रहे? फिर वह क्लर्क क्यों पीछे रहे जिसकी मेज पर आपकी फाइल पड़ी है? फिर हर सरकारी विभाग में एक बोर्ड क्यों न लगा दिया जाए।कृसरकारी सेवा समय-सुबह से शाम तक और एक्स्ट्रा इनकम का समय-शाम के बाद। व्यंग्य लग रहा है? लेकिन खतरा यहीं है। जब व्यवस्था किसी अनौपचारिक एक्स्ट्रा इनकम को रोकने में असफल होती है, तो उसके सामने दो रास्ते होते हैं। पहलाकृभ्रष्टाचार और अनौपचारिक कमाई पर कठोर कार्रवाई। दूसराकृउसे किसी न किसी रूप में वैध या स्वीकार्य बनाने का रास्ता। दूसरा रास्ता आसान है। जनता भी धीरे-धीरे अभ्यस्त हो जाती है। पहले लोग कहते थेकृबिना पैसे काम नहीं होता। फिर कहने लगेकृसाहब की भी मजबूरी है। अब कहीं ऐसा न हो कि अगली पीढ़ी पूछेकृकि सरकारी नौकरी में एक्स्ट्रा इनकम कितनी है?यही असली खतरा है। सरकार को डाक्टरों के लिए अतिरिक्त कमाई का रास्ता खोलना है तो नियम इतने साफ होने चाहिए कि सरकारी सेवा की कीमत पर निजी कमाई का खेल न हो। मरीज को पहले यह अधिकार होना चाहिए कि उसे सरकारी अस्पताल में सरकारी सेवा किस कीमत पर और किस व्यवस्था में मिलेगी। क्योंकि सरकारी अस्पताल गरीब की मजबूरी नहीं, उसका अधिकार है। सरकारी डाक्टर सिर्फ एक कर्मचारी नहीं होता। वह राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था का चेहरा होता है। जिस डाक्टर को जनता अपने टैक्स से वेतन देती है, उससे जनता को यह उम्मीद भी होती है कि उसका इलाज प्राथमिकता होगा, न कि उसकी जेब और यही सवाल पुलिस और दूसरे विभागों पर भी लागू होता है। सरकारी नौकरी अगर सेवा है तो सेवा की कीमत वेतन है। अगर वेतन कम है तो वेतन बढ़ाइए। काम का दबाव ज्यादा है तो व्यवस्था सुधारिए। डाक्टरों की कमी है तो भर्ती कीजिए। अस्पतालों में सुविधाएं नहीं हैं तो सुविधाएं बढ़ाइए। लेकिन हर समस्या का समाधान एक्स्ट्रा इनकम क्यों बनता जा रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार व्यवस्था सुधारने के बजाय व्यवस्था की कमियों को कमाई का अवसर बनाकर छोड़ रही है? जनता को सरकारी अस्पताल में इलाज चाहिए, सरकारी दफ्तर में काम चाहिए, पुलिस से सुरक्षा चाहिए और विभागों से जवाबदेही। उसे यह नहीं चाहिए कि हर सेवा के साथ कोई एक्स्ट्रा जुड़ा हुआ हो। क्योंकि जिस दिन सरकारी सेवा और निजी कमाई के बीच की रेखा मिट गई, उस दिन सबसे बड़ा नुकसान गरीब का होगा। फिर सरकारी अस्पताल अस्पताल नहीं रहेगा, सरकारी दफ्तर दफ्तर नहीं रहेगा और सरकारी नौकरी नौकरी नहीं रहेगीकृसब कुछ एक बाजार में बदल जाएगा और बाजार में सबसे कमजोर हमेशा वही होता है जिसके पास पैसे कम होते हैं। इसलिए सवाल डाक्टरों को अतिरिक्त कमाई की अनुमति देने से ज्यादा बड़ा है। क्या सरकार सरकारी व्यवस्था को मजबूत कर रही है या धीरे-धीरे जनता को यह समझा रही है कि हर सरकारी सेवा के पीछे एक एक्स्ट्रा देना सामान्य बात है? क्योंकि ‘एक्स्ट्रा इनकम’ की यह छोटी-सी दरार कल पूरी व्यवस्था की दीवार में बड़ा छेद बन सकती है।

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