शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

आजादी के ‘महामंत्र’ पर राजनीति

वंदे मातरम के गायन पर आमने-सामने भाजपा और कांग्रेस पूरे गायन पर उठे सवाल और सियासत का बन गया नया केंद्र भाजपा ने बनाया हथियार, कांग्रेस की मंशा पर उठाए सवाल देहरादून। जिस देश की आजादी की लड़ाई में वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रतिरोध की आवाज बन गया था, उसी देश में इसके गायन को लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा होना निश्चित तौर पर गंभीर सवाल पैदा करता है। कांग्रेस की ओर से कार्यक्रमों में वंदे मातरम के पूरे गायन को लेकर उठे सवालों ने भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने का मौका दे दिया है। भाजपा इसे राष्ट्रभावना से जोड़कर कांग्रेस के खिलाफ राजनीतिक हथियार बना रही है, जबकि कांग्रेस की ओर से इसे राजनीतिक मुद्दा बनाए जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आजादी के आंदोलन के दौर में वंदे मातरम ने लोगों के भीतर राष्ट्रीय चेतना जगाने का काम किया। स्वतंत्रता सेनानियों के नारों में यह गूंजता था और ब्रिटिश शासन के विरोध का प्रतीक बन चुका था। ऐसे में इस गीत को लेकर किसी भी तरह का विवाद भावनात्मक रूप से देश के बड़े वर्ग को प्रभावित करता है। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस का रवैया राष्ट्रवादी प्रतीकों को लेकर हमेशा से दोहरा रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जिस वंदे मातरम को स्वतंत्रता सेनानियों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में अपनी आवाज बनाया, उसके गायन से कांग्रेस का पीछे हटना दुर्भाग्यपूर्ण है। भाजपा इस मुद्दे को कांग्रेस की कथित तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़कर भी देख रही है। हालांकि इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू भी है। वंदे मातरम के इतिहास, इसके विभिन्न पदों और स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका को समझे बिना इसे सिर्फ राजनीतिक नारे में बदल देना भी उचित नहीं होगा। राष्ट्रगीत का सम्मान और उसके राजनीतिक इस्तेमाल के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। असल सवाल यह है कि क्या देशभक्ति का प्रमाण अब इस बात से तय होगा कि कौन कितना जोर से वंदे मातरम गाता है? अगर कोई दल या नेता इसके गायन को लेकर सवाल उठाता है तो उससे सवाल जरूर होना चाहिए। लेकिन इसी के साथ यह भी पूछा जाना चाहिए कि आजादी के आंदोलन के प्रतीकों का इस्तेमाल सिर्फ चुनावी राजनीति के लिए क्यों किया जा रहा है? वंदे मातरम् की ताकत उसकी धुन में नहीं, उस इतिहास में है जिसमें यह करोड़ों भारतीयों की आवाज बना था। इसलिए इसे राजनीतिक अखाड़े में खींचने के बजाय उसके ऐतिहासिक महत्व और राष्ट्रीय भावना का सम्मान किया जाना चाहिए। कांग्रेस के लिए भी यह राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मामला है। अगर उसके किसी कार्यक्रम में राष्ट्रगीत के गायन को लेकर असमंजस या अनिच्छा दिखाई देती है तो पार्टी को देश के सामने अपना पक्ष साफ करना चाहिए। उसे यह स्पष्ट करना होगा कि क्या वह वंदे मातरम के सम्मान और उसके गायन के खिलाफ है या केवल उसके राजनीतिक इस्तेमाल का विरोध कर रही है। क्योंकि जनता के लिए संदेश महत्वपूर्ण है। जिस गीत को स्वतंत्रता आंदोलन में देश की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे लोगों ने अपनी आवाज बनाया, उसके प्रति किसी भी राजनीतिक दल की असंवेदनशीलता सवालों के घेरे में आएगी। लेकिन भाजपा को भी यह समझना होगा कि राष्ट्रभक्ति किसी एक राजनीतिक दल की निजी संपत्ति नहीं है। वंदे मातरम किसी पार्टी का गीत नहीं, देश के स्वतंत्रता संघर्ष की ऐतिहासिक विरासत है। इसलिए इसे लेकर राजनीति जितनी कम होगी, सम्मान उतना ही ज्यादा रहेगा। देश को आज भी वंदे मातरम की जरूरत हैकृलेकिन राजनीतिक हथियार के रूप में नहीं, उस साझा राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में जिसने कभी अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने का साहस दिया था।

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