शनिवार, 12 सितंबर 2026

2016 के ‘जख्म’ का 2027 में ‘हिसाब’

ईडी की कार्रवाई के बाद हरीश रावत ने कांग्रेस के पदों से इस्तीफे की पेशकश की 2016 की भर्ती परीक्षा की जांच ने फिर खोला कांग्रेस सरकार के दौर का नया अध्याय 2027 चुनाव से पहले कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे के कदम ने बढ़ाई पार्टी की मुश्किलें पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कार्रवाई को राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश बताया देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में शनिवार सुबह उस वक्त बड़ा सियासी भूचाल आ गया, जब पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत ने पार्टी में अपने सभी पदों से इस्तीफे की पेशकश कर दी। पूर्व मुख्यमंत्री के इस फैसले को उनके पूर्व ओएसडी और वर्तमान निजी सहायक चंदन सिंह जीना के ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद उठाया गया कदम माना जा रहा है। हालांकि रावत ने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने की बात नहीं कही है। ईडी ने 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े धनशोधन मामले में देहरादून में कई ठिकानों पर कार्रवाई की। एजेंसी के मुताबिक चंदन सिंह जीना के परिसर से 32 लाख रुपये नकद और 12 महंगी घड़ियां बरामद की गईं। जीना रावत के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान ओएसडी रह चुके हैं और वर्तमान में उनके निजी सहायक के रूप में कार्यरत बताए गए हैं। हरीश रावत का इस्तीफा ऐसे समय आया है, जब उत्तराखंड कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा को चुनौती देने की तैयारी में जुटी है। ऐसे में रावत का पद छोड़ना केवल व्यक्तिगत नैतिकता का सवाल नहीं, बल्कि कांग्रेस की चुनावी रणनीति के लिए भी बड़ा राजनीतिक संदेश है। रावत लंबे समय से उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली और अनुभवी चेहरों में रहे हैं। पार्टी की चुनावी राजनीति में उनका प्रभाव, पहाड़ और मैदान के बीच राजनीतिक संतुलन साधने की उनकी क्षमता और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ कांग्रेस की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। कांग्रेस की उत्तराखंड प्रदेश चुनाव समिति में भी रावत का नाम शामिल रहा है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या रावत का पदों से हटना कांग्रेस के लिए नैतिक दबाव कम करेगा या चुनावी मैदान में उसके सामने नया संकट खड़ा करेगा? रावत ने अपने सहयोगी पर लगे आरोपों को लेकर अविश्वास जताया है। उनका कहना है कि वह आरोपों पर विश्वास नहीं करते, लेकिन यदि जांच में उनकी ओर से कोई गलती साबित होती है तो उसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। उन्होंने मौजूदा घटनाक्रम को उनके और उनके सहयोगियों के खिलाफ राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश के रूप में भी देखा है। यही वह बिंदु है जहां रावत का इस्तीफा महज संगठनात्मक निर्णय न रहकर राजनीतिक संदेश बन जाता है। एक तरफ वह अपने सहयोगी के बचाव में खड़े दिखाई दे रहे हैं, दूसरी तरफ पद छोड़कर जांच से अपने राजनीतिक कद को अलग रखने की कोशिश कर रहे हैं। 2027 का चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आएगा, 2016 की कांग्रेस सरकार का कार्यकाल भाजपा के निशाने पर रहना तय माना जा रहा है। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं का मुद्दा पहले ही उत्तराखंड की राजनीति में युवाओं के बीच संवेदनशील विषय बन चुका है। ऐसे में ईडी की कार्रवाई और उसके बाद रावत का इस्तीफा भाजपा को कांग्रेस पर हमला करने के लिए नया राजनीतिक हथियार दे सकता है। भाजपा इसे कांग्रेस शासनकाल की व्यवस्था पर सवाल के रूप में पेश कर सकती है, जबकि कांग्रेस के सामने चुनौती होगी कि वह जांच को राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों से जोड़ते हुए अपनी राजनीतिक जमीन बचाए। सबसे बड़ा सवाल अब कांग्रेस के भीतर उठेगा। पार्टी पहले ही 2027 के लिए सरकार के खिलाफ बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, कानून-व्यवस्था, एसआईआर और जनसरोकार के मुद्दे उठाने की तैयारी में है। ऐसे समय में उसके सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक का नाम एक जांच के राजनीतिक प्रभाव में आना पार्टी की धार को कमजोर कर सकता है। दूसरा सवाल नेतृत्व को लेकर है। क्या कांग्रेस हरीश रावत के प्रभाव से बाहर निकलकर नई पीढ़ी के नेतृत्व को आगे करेगी या रावत अब भी पार्टी की चुनावी रणनीति के केंद्र में बने रहेंगे? रावत का यह कदम उत्तराखंड कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण है। पिछले कई वर्षों से कांग्रेस की राजनीति में रावत का प्रभाव और पार्टी के दूसरे धड़ों के साथ उनका समीकरण चर्चा में रहा है। अब जब विधानसभा चुनाव सिर पर हैं, उनका पद छोड़ना पार्टी के भीतर नेतृत्व, उम्मीदवार चयन और चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसे कांग्रेस छोड़ने के संकेत के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक रावत ने पार्टी के पदों से इस्तीफे की पेशकश की है, कांग्रेस की सदस्यता से नहीं। लेकिन राजनीतिक रूप से संदेश साफ हैकृ2016 की परछाइयां एक बार फिर 2027 के चुनावी मैदान तक पहुंच गई हैं। ईडी की कार्रवाई ने पुराने भर्ती प्रकरण को फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया है और रावत के इस्तीफे ने इसे और बड़ा बना दिया है। अब जांच एजेंसियां अपना काम करेंगी, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में असली लड़ाई उस नैरेटिव की होगी जिसमें एक तरफ कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताएगी और दूसरी तरफ भाजपा इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई के रूप में पेश करेगी। 2027 की जंग से पहले रावत का पद छोड़ना कांग्रेस के लिए सिर्फ एक इस्तीफा नहीं, बल्कि अपने सबसे अनुभवी चेहरे के राजनीतिक कवच पर आया बड़ा दबाव है।

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