शनिवार, 12 सितंबर 2026
रावत के सियासी ‘कुनबे’ पर ईडी की चोट
यूकेएसएसएससी केस ने फिर खोला 2016 का पन्ना,हरीश रावत के दौर की फाइल फिर खुली
पूर्व ओएसडी के ठिकाने पर छापे में 32 लाख नकद, सोना और लग्जरी घड़ियों की बरामदगी का दावा
भर्ती परीक्षा की कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले ने 2027 से पहले बढ़ाई कांग्रेस की मुश्किलें
रावत बोले-आरोपों पर विश्वास नहीं, गलती साबित हुई तो जिम्मेदारी मेरी भी
भाजपा के हाथ लगा कांग्रेस के पुराने शासनकाल पर वार का नया हथियार
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत के दौर की फाइल एक बार फिर खुल गई है। 2016 की ग्राम विकास अधिकारी परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई ने पूर्व मुख्यमंत्री के राजनीतिक कुनबे को सीधे कठघरे में ला खड़ा किया है। रावत के पूर्व ओएसडी और निजी सहायक रहे चंदन सिंह जीना के ठिकाने पर ईडी की छापेमारी में 32 लाख रुपये नकद, सोना और महंगी घड़ियां समेत अन्य कीमती सामान मिलने की रिपोर्ट सामने आई है। सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यह नहीं है कि ईडी की कार्रवाई में क्या मिला। असली सवाल यह है कि जिस दौर की भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं, उस दौर में सत्ता के सबसे नजदीकी लोगों की भूमिका आखिर कितनी दूर तक जाती है?
रावत ने आरोपों को खारिज करते हुए अपने सहयोगी का बचाव किया है। उनका कहना है कि उन्हें जीना के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर विश्वास नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि यदि उनकी ओर से कोई गलती साबित होती है तो उन्हें उसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए। हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस के सबसे बड़े और अनुभवी चेहरों में हैं। इसलिए उनके पूर्व ओएसडी से जुड़ी ईडी कार्रवाई का राजनीतिक असर महज किसी सहयोगी की जांच तक सीमित नहीं रहेगा। 2016 की परीक्षा, तत्कालीन कांग्रेस सरकार और रावत के सत्ता काल का संदर्भ एक साथ सामने आने से भाजपा को कांग्रेस के पुराने शासन पर सीधा हमला करने का अवसर मिल गया है।
2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच यह घटनाक्रम कांग्रेस के लिए असहज करने वाला है। जिस पार्टी को भर्ती घोटालों और युवाओं के मुद्दे पर भाजपा को घेरना था, उसी के सबसे वरिष्ठ नेता से जुड़े राजनीतिक घेरे में अब जांच एजेंसी की कार्रवाई चर्चा का विषय बन गई है। ईडी की कार्रवाई में कथित रूप से नकदी, सोना और महंगी घड़ियां मिलने की खबर ने मामले को और राजनीतिक रंग दे दिया है। रिपोर्टों में 32 लाख रुपये नकद और करीब 200 ग्राम सोने की बरामदगी का भी उल्लेख है।
हालांकि इन संपत्तियों का स्रोत क्या है और इनका यूकेएसएसएससी प्रकरण से कोई प्रत्यक्ष संबंध है या नहीं, यह जांच का विषय है। बरामदगी को दोष सिद्धि मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन इतनी बड़ी कार्रवाई ने राजनीतिक सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं और यही सवाल रावत के सामने सबसे कठिन चुनौती बनकर खड़ा हैकृकि क्या उनके बेहद करीबी रहे व्यक्ति की भूमिका सिर्फ संयोग है या जांच किसी बड़े नेटवर्क तक पहुंचेगी?
घटनाक्रम के बीच रावत द्वारा कांग्रेस के पदों से इस्तीफे की पेशकश ने मामले को और राजनीतिक वजन दे दिया। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने कांग्रेस के दो संगठनात्मक पदों से इस्तीफा दिया है। यानी एक तरफ रावत अपने सहयोगी पर लगे आरोपों पर विश्वास नहीं करने की बात कह रहे हैं, दूसरी तरफ राजनीतिक जिम्मेदारी से पीछे हटने का संदेश भी दे रहे हैं। यहीं से कांग्रेस के भीतर भी सवाल उठना स्वाभाविक हैकृअगर आरोप बेबुनियाद हैं तो इस्तीफे की जरूरत क्यों पड़ी और अगर राजनीतिक जिम्मेदारी स्वीकार की जा रही है तो जांच के निष्कर्ष का इंतजार क्यों नहीं?
उत्तराखंड की राजनीति में भर्ती घोटाले सबसे संवेदनशील मुद्दों में रहे हैं। युवाओं के बीच सरकारी नौकरियों की परीक्षा में पारदर्शिता बड़ा राजनीतिक प्रश्न है। ऐसे में 2016 की परीक्षा से जुड़ी ईडी कार्रवाई को भाजपा निश्चित रूप से चुनावी मुद्दा बनाएगी। भाजपा का हमला सीधा होगाकृकि जिस कांग्रेस शासनकाल में परीक्षा हुई, उसी दौर के मुख्यमंत्री के करीबी पर अब जांच एजेंसी की कार्रवाई क्यों हो रही है? कांग्रेस के पास इसका राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर जवाब देना होगा।
इस पूरे प्रकरण को केवल हरीश रावत बनाम भाजपा की लड़ाई बना देना भी जांच के मूल सवाल को छोटा कर देगा। असली सवाल यह है कि सरकारी भर्ती व्यवस्था में कथित गड़बड़ियों का नेटवर्क कितना गहरा था और उसमें किस-किस स्तर के लोगों की भूमिका थी। यदि जांच में रावत या उनके किसी सहयोगी की कोई भूमिका सामने आती है तो कानून को अपना काम करना चाहिए। यदि आरोप राजनीतिक या तथ्यहीन साबित होते हैं तो जांच के बाद स्थिति भी साफ होनी चाहिए। लेकिन फिलहाल इतना जरूर है कि 2016 का वह अध्याय, जिसे उत्तराखंड की राजनीति पीछे छोड़ देना चाहती थी, 2027 के चुनाव से ठीक पहले फिर सामने खड़ा है और इस बार सवाल केवल भर्ती परीक्षा का नहीं है।
सवाल यह है कि सत्ता के गलियारों में किसकी पहुंच कितनी थी, किसने उस पहुंच का इस्तेमाल किया और उस दौर की राजनीतिक जवाबदेही आखिर तय होगी या फिर फाइलों के साथ सवाल भी दफन हो जाएंगे? रावत के सामने अब राजनीतिक चुनौती दोहरी हैकृकि सहयोगी का बचाव भी करना है और उस दौर की सत्ता पर उठ रहे सवालों का जवाब भी देना है।
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