शनिवार, 5 सितंबर 2026
दिल्ली के ‘दिग्गजों’ से गरमाएगा पहाड़
2027 की जंग का काउंटडाउन हुआ शुरू, भाजपा की हैट्रिक पर नजर
कांग्रेस की सत्ता वापसी की बेचौनी, राष्ट्रीय नेताओं के दौरों की सियासत
उत्तराखंड में चुनावी राजनीति का राष्ट्रीय चरण अभी से हो गया है शुरू
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव भले अभी दूर हों, लेकिन सियासी रणभूमि सजने लगी है। प्रदेश की सियासत अब धीरे-धीरे स्थानीय नेताओं के दायरे से निकलकर राष्ट्रीय नेतृत्व के हाथों में जाती दिखाई दे रही है। भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपने बड़े चेहरों को उत्तराखंड के मैदान में उतारने की तैयारी में हैं। राष्ट्रीय नेताओं के प्रस्तावित दौरों ने साफ संकेत दे दिया है कि 2027 का चुनाव अब केवल देहरादून की राजनीतिक बैठकों तक सीमित नहीं रहेगा।
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का प्रस्तावित उत्तराखंड दौरा इसी चुनावी सक्रियता की अहम कड़ी माना जा रहा है। संगठनात्मक बैठकों से लेकर अलग-अलग सामाजिक समूहों के कार्यक्रमों तक उनकी सक्रियता को भाजपा की चुनावी तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। दूसरी तरफ कांग्रेस भी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत राष्ट्रीय नेतृत्व के कार्यक्रमों के जरिए प्रदेश में माहौल बनाने की रणनीति पर काम कर रही है। यानी सितंबर के साथ उत्तराखंड में चुनावी राजनीति का राष्ट्रीय चरण शुरू होता दिखाई दे रहा है।
राष्ट्रीय नेताओं का कोई भी दौरा अब महज संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं माना जाएगा। किस जिले को चुना गया, किस नेता को मंच पर जगह मिली, किन मुद्दों को उठाया गया और कितनी भीड़ जुटीकृहर तस्वीर और हर बयान के राजनीतिक मायने निकाले जाएंगे। भाजपा जहां अपने संगठन और सरकार की उपलब्धियों को लेकर मैदान में उतरने की तैयारी में है, वहीं कांग्रेस सरकार के खिलाफ मुद्दों को धार देने की कोशिश करेगी। इसका सीधा असर प्रदेश की राजनीति पर पड़ेगा। एक दल का कार्यक्रम दूसरे दल पर दबाव बढ़ाएगा और फिर उसके जवाब में दूसरा दल मैदान में उतरेगा। इस तरह आने वाले महीनों में कार्यक्रम, बयान, आरोप और पलटवारकृउत्तराखंड की राजनीति का रोजमर्रा का हिस्सा बनने वाले हैं।
भाजपा के लिए 2027 का चुनाव ऐतिहासिक महत्व रखता है। पार्टी लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल करने की कोशिश करेगी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में सरकार अपने कामकाज को चुनावी मुद्दा बनाएगी, जबकि संगठन बूथ स्तर तक अपनी मशीनरी को मजबूत करने में जुटा है। लेकिन चुनौती भी कम नहीं है। स्थानीय स्तर पर विधायकों को लेकर नाराजगी, टिकट के दावेदारों की बढ़ती संख्या, क्षेत्रीय असंतोष और सरकार के खिलाफ उठने वाले मुद्दे भाजपा के लिए परीक्षा बन सकते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता को संगठन की ग्राउंड रिपोर्ट से भी जोड़कर देखा जा रहा है।
कांग्रेस के लिए यह चुनाव सत्ता में वापसी का बड़ा अवसर है। पाटरग् यदि भाजपा विरोधी मतों को एकजुट कर पाती है और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी तरीके से चुनावी नैरेटिव में बदलती है तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य सुविधाएं, आपदा, सड़कें, शिक्षा और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को कांग्रेस लगातार उठाती रही है। लेकिन कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक एकजुटता और नेतृत्व का सवाल है। राष्ट्रीय नेताओं की सक्रियता तभी प्रभावी होगी, जब उसका फायदा बूथ स्तर के संगठन तक पहुंचे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बड़े नेताओं के आने के बाद चुनाव का एजेंडा किस दिशा में जाएगा? क्या 2027 का चुनाव उत्तराखंड के स्थानीय सवालों पर लड़ा जाएगा या फिर भाजपा-कांग्रेस के बीच राष्ट्रीय राजनीति की बड़ी लड़ाई का विस्तार बन जाएगा? पहाड़ का मतदाता सड़क, रोजगार, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा और खेती चाहता है। मैदान का मतदाता रोजगार, महंगाई, कानून-व्यवस्था और शहरी सुविधाओं को लेकर सवाल पूछ रहा है। यदि राष्ट्रीय नेतृत्व इन स्थानीय सवालों को अपने चुनावी भाषणों में जगह देता है तो चुनाव का रंग अलग होगा। लेकिन यदि मुकाबला केवल केंद्र की राजनीति और राष्ट्रीय मुद्दों तक सिमट गया तो उत्तराखंड के असली सवाल फिर पीछे छूट सकते हैं।
भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ती सीधी टक्कर के बीच क्षेत्रीय दलों के लिए भी चुनौती बढ़ेगी। उत्तराखंड क्रांति दल समेत छोटे राजनीतिक दल पहाड़, राज्य की अस्मिता, रोजगार और पलायन जैसे सवालों के सहारे अपनी जमीन बचाने की कोशिश करेंगे। इन दलों की भूमिका कई सीटों पर निर्णायक हो सकती है। यही वजह है कि बड़े दल भी क्षेत्रीय समीकरणों को नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं होंगे।
राष्ट्रीय नेताओं के दौरों के साथ प्रदेश की सियासत में शक्ति प्रदर्शन का दौर भी तेज होगा। एक बड़ी रैली के जवाब में दूसरी रैली, एक बड़े बयान के जवाब में पलटवार और एक राजनीतिक मुद्दे के जवाब में दूसरा मुद्दाकृयह सिलसिला अगले कई महीनों तक चलने की पूरी संभावना है। 2027 की चुनावी लड़ाई अभी शुरू नहीं हुई है, लेकिन उसके संकेत साफ दिखाई देने लगे हैं। दिल्ली से उतरते बड़े चेहरे अब उत्तराखंड की सियासी जमीन पर अपने-अपने दांव चलेंगे। असली सवाल यह है कि इन दांवों में पहाड़ के मुद्दे भारी पड़ेंगे या राष्ट्रीय राजनीति का शोर?
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें