रविवार, 27 सितंबर 2026

ईडी से चुनावी रण तक

हरीश रावत की पेशी के बाद भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने आरोप-प्रत्यारोप ने 2027 के चुनावी माहौल को दी नई धार सूबे में कार्रवाई चुनावी राजनीति का अहम मुद्दा बनने जा रही देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव का एक नया मोर्चा खुल गया है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत की प्रवर्तन निदेशालय के समक्ष पेशी के बाद जिस तरह दोनों दल आमने-सामने आए हैं, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई भी प्रदेश की चुनावी राजनीति का अहम मुद्दा बनने जा रही है। 2016 की ग्राम पंचायत विकास अधिकारी भर्ती परीक्षा में कथित अनियमितताओं से जुड़े धनशोधन मामले में ईडी ने हरीश रावत को पूछताछ के लिए बुलाया। 26 सितंबर को रावत ईडी कार्यालय पहुंचे। इस दौरान वह अपनी दिवंगत मां की तस्वीर साथ लेकर पहुंचे और कहा कि वह अपनी मां, मां जगदंबा और धरती मां का स्मरण करते हुए कार्यालय आए हैं। पेशी के बाद रावत ने केंद्र और भाजपा पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि चुनाव नजदीक आते ही जांच एजेंसियां सक्रिय हो जाती हैं। इससे पहले भी वह ईडी की कार्रवाई को उत्तराखंड की चुनावी राजनीति से जोड़ चुके हैं। कांग्रेस ने भी कार्रवाई को राजनीतिक दबाव के रूप में पेश किया है। हालांकि जांच एजेंसी की कार्रवाई के पीछे राजनीतिक मंशा होने का अंतिम निष्कर्ष अभी स्थापित नहीं हुआ है। रावत के आरोपों के बाद भाजपा ने भी मोर्चा खोल दिया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने रावत के ईडी कार्यालय जाते समय मां की तस्वीर साथ रखने पर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक सहानुभूति हासिल करने की कोशिश बताया। भाजपा का कहना है कि जांच एक कानूनी प्रक्रिया है और इसे राजनीतिक भावनाओं के साथ जोड़ना उचित नहीं। यहीं से विवाद केवल ईडी की पूछताछ तक सीमित नहीं रहा। मां की तस्वीर, जांच एजेंसी की कार्रवाई और राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपकृइन तीनों ने मिलकर भाजपा और कांग्रेस के बीच बयानबाजी को और तीखा कर दिया है। ईडी की कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब कांग्रेस 2027 के लिए सरकार के खिलाफ मुद्दों को धार देने की तैयारी में है। पार्टी बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, पलायन, भू-कानून और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। लेकिन रावत से जुड़े प्रकरण ने कांग्रेस के चुनावी विमर्श में एक नया आयाम जोड़ दिया है। इससे पहले रावत ने अपने पूर्व ओएसडी चंदन सिंह जीना से जुड़े ईडी प्रकरण के बाद कांग्रेस के संगठनात्मक पदों से इस्तीफे की पेशकश भी की थी। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर भी चर्चा को जन्म दिया था। अब रावत की ईडी पेशी के बाद कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह जांच से जुड़े सवालों और भाजपा के राजनीतिक हमलों का जवाब देते हुए अपने चुनावी मुद्दों को किस तरह आगे बढ़ाती है। दूसरी ओर भाजपा इस प्रकरण को कांग्रेस और रावत के खिलाफ राजनीतिक सवालों के रूप में उठा रही है। भाजपा की ओर से यह संदेश देने की कोशिश हो रही है कि जांच एजेंसियों की कार्रवाई को राजनीति से जोड़ने के बजाय संबंधित मामले में सामने आने वाले तथ्यों पर बात होनी चाहिए। हालांकि, चुनावी राजनीति में जांच एजेंसियों की कार्रवाई का राजनीतिक असर होने से इनकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस इसे विपक्ष पर दबाव की कार्रवाई के रूप में देख रही है, जबकि भाजपा इसे जांच की सामान्य प्रक्रिया बता रही है। दोनों पक्षों के इन दावों के बीच अंतिम तस्वीर जांच के निष्कर्ष और उपलब्ध दस्तावेजों से ही स्पष्ट होगी। उत्तराखंड की राजनीति में हरीश रावत अब भी कांग्रेस के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल हैं। ऐसे में उनके खिलाफ या उनसे जुड़े किसी भी जांच प्रकरण का राजनीतिक असर स्वाभाविक रूप से व्यापक होता है। भाजपा के लिए रावत पर हमला कांग्रेस के पुराने शासन और उससे जुड़े सवालों को उठाने का अवसर है, जबकि कांग्रेस के लिए रावत की पेशी केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठाने का आधार बन रही है। इस तरह ईडी कार्यालय से शुरू हुआ विवाद अब सीधे चुनावी मैदान की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बहस जांच के तथ्यों तक सीमित रहती है या भाजपा-कांग्रेस की चुनावी रणनीति का स्थायी हिस्सा बनती है। फिलहाल इतना जरूर है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी मुकाबले में एक नया अध्याय जुड़ गया हैकृईडी की कार्रवाई बनाम राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप।

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