मंगलवार, 29 सितंबर 2026
उत्तराखंड में सीमांत विकास पर ‘रार’
कांग्रेस के हमलों पर भाजपा का पलटवार, कहा- विकास से बौखलाई विपक्ष
सीमांत क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार और आजीविका के अवसरों को तेजी से बढ़ा रही
पलायन रोकने और पर्यटन व रोजगार को बढ़ावा देने के लिए योजनाओं को धरातल पर उतारा जा रहा
देहरादून। उत्तराखंड के सीमांत जिलों में विकास को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। सीमांत क्षेत्रों में कैबिनेट बैठक और विकास योजनाओं को लेकर कांग्रेस की आपत्तियों पर भाजपा ने पलटवार करते हुए आरोप लगाया है कि कांग्रेस को सीमांत गांवों में सरकार की बढ़ती सक्रियता रास नहीं आ रही है। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता हनी पाठक ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार सीमांत क्षेत्रों को सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार और आजीविका से जोड़ने पर काम कर रही हैं। भाजपा ने अपने पक्ष में वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम का हवाला देते हुए कहा है कि उत्तराखंड के सीमांत गांवों में बुनियादी ढांचे और आजीविका से जुड़ी योजनाओं को गति दी जा रही है। केंद्र की योजना में सीमावर्ती गांवों के लिए सड़क, संचार, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन और रोजगार जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है।
सीमांत क्षेत्र में सरकार की मौजूदगी को लेकर दोनों दलों के बीच राजनीतिक बहस तेज होना 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा इसे सीमांत क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा में लाने और राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ रही है, जबकि कांग्रेस सरकार की योजनाओं और उनके जमीन पर प्रभाव को लेकर सवाल उठाती रही है। राज्य सरकार के स्तर पर भी सीमांत क्षेत्र विकास कार्यक्रम के तहत बुनियादी ढांचे, स्वरोजगार, पर्यटन, कौशल विकास और पलायन रोकने जैसी गतिविधियों को शामिल किया गया है। राज्य के नौ सीमावर्ती विकासखंड इसके दायरे में हैं।
भाजपा का कहना है कि सीमांत क्षेत्र केवल नक्शे का आखिरी छोर नहीं बल्कि राज्य की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार हैं। पार्टी कांग्रेस से उसके शासनकाल के दौरान सीमांत क्षेत्रों में हुए कार्यों का हिसाब मांग रही है। वहीं इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू यह है कि सीमांत क्षेत्रों में सड़क, रोजगार, स्वास्थ्य और पलायन जैसी समस्याएं अब भी राजनीतिक मुद्दे हैं। हाल में उत्तरकाशी की जिला योजना को लेकर सत्ता पक्ष के विधायक की नाराजगी भी सामने आई थी, जिसमें उन्होंने क्षेत्रीय जरूरतों और जनप्रतिनिधियों के प्रस्तावों की अनदेखी के आरोप लगाए थे।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ भाजपा सरकार अपनी विकास योजनाओं को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में जनता के सामने रखने में जुटी है। कांग्रेस इन दावों की प्रभावशीलता और जमीन पर वास्तविक स्थिति को मुद्दा बना सकती है। ऐसे में सीमांत जिलों का विकास अब महज सरकारी योजनाओं का विषय नहीं रह गया है, बल्कि दोनों दलों के बीच विकास के दावे और राजनीतिक श्रेय की लड़ाई का नया मैदान बनता दिख रहा है। सीमांत क्षेत्रों में रहने वाली जनता के लिए हालांकि राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा अहम सवाल सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार और रोजगार का है।
सरकार इन क्षेत्रों में योजनाओं की संख्या गिनाकर अपनी उपलब्धियां बता रही है, जबकि विपक्ष को यह साबित करना होगा कि उसके सवाल केवल राजनीतिक विरोध तक सीमित नहीं हैं। यानी सीमांत की चौकियों से लेकर देहरादून के सियासी गलियारों तक लड़ाई अब एक ही मुद्दे पर हैकृसीमांत का विकास किसका माडल और किसके खाते में जाएगा?
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