बुधवार, 30 सितंबर 2026
छात्रसंघ नतीजों से भाजपा उत्साहित
भाजपा का दावा-एबीवीपी की 85 प्रतिशत जीत को सरकार के प्रति युवाओं के भरोसे से जोड़ा
2027 से पहले सियासी संदेश पढ़ने में जुटी भाजपा,डीएवी की जीत ने बढ़ाया उत्साह
छात्रसंघ चुनावों के जरिए महाविद्यालय परिसरों में सक्रिय कार्यकर्ताओं का दिखा नेटवर्क
देहरादून। उत्तराखंड के महाविद्यालयों में हुए छात्रसंघ चुनाव के नतीजों ने प्रदेश की राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है। राज्य के सबसे बड़े महाविद्यालय डीएवी पीजी कॉलेज समेत कई संस्थानों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रदर्शन से भाजपा उत्साहित है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने एबीवीपी की जीत पर बधाई देते हुए दावा किया कि प्रदेश में करीब 85 प्रतिशत छात्रसंघ सीटों पर मिली जीत इस बात का संकेत है कि युवाओं ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में लिए जा रहे निर्णयों पर भरोसा जताया है।
प्रदेश के सबसे बड़े डीएवी पीजी कालेज में अध्यक्ष पद पर एबीवीपी के नवदीप राणा ने जीत दर्ज की। यह लगातार दूसरी बार है जब एबीवीपी ने डीएवी में अध्यक्ष पद अपने नाम किया है। देहरादून के एमकेपी और एसजीआरआर समेत कई महाविद्यालयों में भी एबीवीपी का प्रदर्शन मजबूत रहा। हालांकि कई स्थानों पर निर्दलीय और एनएसयूआई प्रत्याशियों ने भी जीत दर्ज की, जिससे पूरे छात्रसंघ चुनाव को केवल एकतरफा परिणाम के रूप में देखना उचित नहीं होगा। भाजपा ने इन परिणामों को आगामी विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं के बीच अपने राजनीतिक प्रभाव के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया है। महेंद्र भट्ट ने कहा कि एबीवीपी की जीत युवा वर्ग के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, विकास और सरकार की युवा-केंद्रित नीतियों के प्रति समर्थन को दर्शाती है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का तर्क है कि छात्रसंघ चुनावों में एबीवीपी के पक्ष में आया परिणाम केवल छात्र राजनीति तक सीमित नहीं है। पार्टी इसे धामी सरकार की नीतियों से जोड़ रही है। भट्ट ने कहा कि युवाओं ने रोजगार, पारदर्शी व्यवस्था और युवा कल्याण से जुड़े सरकार के प्रयासों पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगाई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी विजयी एबीवीपी प्रत्याशियों को बधाई देते हुए परिणामों को युवाओं की राष्ट्रवादी विचारधारा और छात्रहित से जोड़कर देखा। उन्होंने कहा कि युवाओं ने अपने मत के जरिए विपक्ष की कथित नकारात्मक राजनीति को जवाब दिया है। यह मुख्यमंत्री और भाजपा की ओर से किया गया राजनीतिक आकलन है।
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव अगले वर्ष होने हैं। ऐसे में छात्रसंघ चुनावों के परिणामों को राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से पढ़ रहे हैं। भाजपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छात्र राजनीति में मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क रखने वाली एबीवीपी ने कई महाविद्यालयों में अपना प्रभाव बनाए रखा। भाजपा की रणनीति में युवा मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। छात्रसंघ चुनावों के जरिए महाविद्यालय परिसरों में सक्रिय कार्यकर्ताओं का नेटवर्क भी सामने आता है। विधानसभा चुनाव के दौरान यही नेटवर्क बूथ और स्थानीय स्तर की राजनीतिक गतिविधियों में भूमिका निभा सकता है। हालांकि छात्रसंघ चुनाव के परिणामों को सीधे विधानसभा चुनाव के मतदाताओं की पसंद का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा।
इन चुनावों में एनएसयूआई ने कुछ स्थानों पर बेहतर प्रदर्शन किया है। रुड़की के केएलडीएवी कॉलेज में एनएसयूआई ने छह में से चार पद जीते, जबकि मोरी में उसके सभी प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की। नैनीताल के डीएसबी परिसर में अध्यक्ष पद पर निर्दलीय प्रत्याशी विजयी रहे। यानी छात्र राजनीति में मुकाबला पूरी तरह एबीवीपी तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस ने डीएवी चुनाव को लेकर प्रशासन और पुलिस की भूमिका पर सवाल भी उठाए और कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की है। इन आरोपों पर प्रशासन और पुलिस का पक्ष अलग से सामने आना बाकी है।
छात्रसंघ चुनावों के नतीजे ऐसे समय आए हैं जब राजनीतिक दल 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटे हैं। भाजपा इन परिणामों के जरिए यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रही है कि युवाओं के बीच सरकार की स्वीकार्यता बनी हुई है। दूसरी ओर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इन परिणामों को छात्र राजनीति तक सीमित रखते हुए सरकार की नीतियों पर अपने सवालों को आगे बढ़ा सकते हैं। यही कारण है कि छात्रसंघ चुनाव अब महज परिसर की राजनीति नहीं रह गए हैं। इनके परिणामों ने विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं के मुद्दों, रोजगार, शिक्षा और राजनीतिक भागीदारी को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।
एबीवीपी की जीत को भाजपा धामी सरकार के प्रति युवा समर्थन के संकेत के तौर पर पेश कर रही है, जबकि चुनावों में एनएसयूआई और निर्दलीय प्रत्याशियों की सफलताएं यह बताती हैं कि छात्र राजनीति का पूरा परिदृश्य बहुआयामी है। अब असली राजनीतिक परीक्षा यह होगी कि छात्र परिसरों में दिखा यह रुझान अगले वर्ष विधानसभा चुनाव के दौरान किस रूप में दिखाई देता है।
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