बुधवार, 30 सितंबर 2026
एसआईआर पर भाजपा और कांग्रेस में जंग
एसआईआर पर घिरी कांग्रेस को भाजपा ने 60 साल का आईना दिखाया
महेंद्र बोलेकृहार दिखी तो चुनाव व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश
भाजपा ने सीधे कांग्रेस के छह दशक के शासनकाल को निशाने पर लिया
देहरादून। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग और विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी जंग और तेज हो गई है। कांग्रेस की ओर से एसआईआर और निर्वाचन प्रक्रिया पर लगातार सवाल उठाए जाने के बाद भाजपा ने अब सीधे कांग्रेस के छह दशक के शासनकाल को निशाने पर ले लिया है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस पर पलटवार करते हुए कहा कि आज जो पार्टी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठा रही है, उसे पहले अपने शासनकाल के दौरान चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और व्यवस्था का इतिहास देखना चाहिए।
भट्ट ने तीखा हमला बोलते हुए कहा कि असली चुनावी मैच फिक्सिंग वह थी, जब जानबूझकर चुनाव आयुक्त के चयन की कोई नीति नहीं बनाई गई। जब सरकारें अपने यस-मैन को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाती रहीं और आयुक्तों को बाद में मंत्री बनाया गया तथा चुनाव लड़ाया गया। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और विपक्ष को यह अहसास हो चुका है कि वह सामान्य राजनीतिक मुकाबले में जीत हासिल नहीं कर सकते, इसलिए अब पूरी चुनावी व्यवस्था पर ही संदेह खड़ा करने की रणनीति अपनाई जा रही है। हालांकि यह भाजपा का राजनीतिक आरोप है, कांग्रेस की ओर से इस पर अलग पक्ष रखा जा सकता है।
भाजपा के हमले का सबसे तीखा हिस्सा कांग्रेस की चुनावी रणनीति को लेकर है। भट्ट का कहना है कि एसआईआर को लेकर जिस तरह विपक्ष सवाल उठा रहा है, उससे लगता है कि चुनाव परिणाम आने से पहले ही हार का कारण तलाशने की कोशिश शुरू हो गई है। भाजपा का तर्क है कि यदि मतदाता सूची में किसी पात्र नागरिक का नाम छूटता है या कोई वास्तविक त्रुटि सामने आती है तो राजनीतिक दलों को प्रमाण के साथ निर्वाचन आयोग के समक्ष आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। लेकिन पूरी प्रक्रिया को ही संदिग्ध बताने से मतदाताओं के बीच चुनावी संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है।
कांग्रेस और विपक्ष की ओर से चुनाव प्रक्रिया पर उठाए जा रहे सवालों को भाजपा ने अब राजनीतिक हथियार बना लिया है। भट्ट ने कांग्रेस के आरोपों को उसी की भाषा में जवाब देते हुए मैच फिक्सिंग का पलटवार किया है। उनका निशाना केवल एसआईआर नहीं, बल्कि कांग्रेस के शासनकाल में चुनाव आयोग की नियुक्ति व्यवस्था भी है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को वर्तमान व्यवस्था पर सवाल उठाने से पहले यह बताना चाहिए कि उसके शासनकाल में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कितनी पारदर्शी थी।
वर्तमान में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए 2023 के कानून में चयन समिति का प्रावधान है। राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं और निर्धारित चयन प्रक्रिया में प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ ही चुनाव आयोग, मतदाता सूची और एसआईआर राजनीतिक विमर्श के बड़े मुद्दे बनते जा रहे हैं। कांग्रेस जहां चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मतदाता अधिकारों को लेकर सवाल उठा रही है, वहीं भाजपा इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति बता रही है। भाजपा के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह कांग्रेस के आरोपों का जवाब देने के साथ-साथ अपने पक्ष में एक बड़ा नैरेटिव खड़ा करना चाहती हैकृकि चुनाव आयोग पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अविश्वास पैदा करने की कोशिश है। दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि एसआईआर को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित न रखकर ठोस आंकड़ों और प्रमाणों के साथ सामने रखे।
भाजपा का कहना है कि लोकतंत्र में चुनावी जीत-हार का फैसला जनता करती है। इसलिए राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर व्यापक संदेह पैदा करने के बजाय जनता के बीच अपने मुद्दों के साथ जाना चाहिए। यही वजह है कि महेंद्र भट्ट का ताजा बयान उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में केवल कांग्रेस पर हमला नहीं, बल्कि 2027 के चुनाव से पहले चुनावी नैरेटिव पर पकड़ बनाने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। भाजपा कांग्रेस को उसके छह दशक के शासन की याद दिलाकर पूछ रही है कि चुनाव आयोग पर सवाल उठाने से पहले अपने अतीत का हिसाब कौन देगा? वहीं कांग्रेस एसआईआर और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाकर जवाबदेही मांग रही है। अब यह टकराव जितना बढ़ेगा, उतना ही चुनावी मैदान में मुद्दा किसे वोट से आगे बढ़कर किस चुनावी व्यवस्था पर भरोसा तक पहुंचता जाएगा।
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