सोमवार, 7 सितंबर 2026
‘शौर्य’ गाथा पर सियासी ‘ड्रामा’
पांच साल तक क्यों अटका सैन्य धाम, 2021 में शिलान्यास, 2023 में पूरा होने का था लक्ष्य
तारीखें बढ़ती गईं, लागत भी बढ़ी, अब चुनावी मौसम में फिर सुर्खियों में आ गई परियोजना
सैन्य परंपरा को समर्पित सैन्य धाम पांच साल से सत्ता के दावों और तारीखों के बीच झूल रहा
देहरादून। शहीदों की स्मृति और उत्तराखंड की सैन्य परंपरा को समर्पित देहरादून का सैन्य धाम पांच साल से सत्ता के दावों और तारीखों के बीच झूल रहा है। वर्ष 2021 में जिस परियोजना को दो साल के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, वह 2026 में भी राजनीतिक बहस के केंद्र में है। अब विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सैन्य धाम फिर चर्चा में है तो सवाल भी उतना ही सीधा है। कृअगर यह शहीदों को श्रद्धांजलि का प्रकल्प था तो इसे समय पर पूरा क्यों नहीं किया गया?
सैन्य धाम का शिलान्यास 2021 में किया गया था। बाद में गुनियालगांव में परियोजना को आगे बढ़ाया गया और दिसंबर 2021 में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने वहां दूसरा शिलान्यास किया। उस समय इसे करीब दो वर्ष में पूरा करने की बात कही गई थी। अगस्त 2022 में राज्यपाल के निरीक्षण के दौरान भी 2023 में सैन्य धाम पूरा करने का लक्ष्य बताया गया था।
लेकिन लक्ष्य की तारीख आती गई और निर्माण पूरा नहीं हुआ। सितंबर 2023 में सैनिक कल्याण मंत्री गणेश जोशी ने खुद निर्माण की धीमी गति पर नाराजगी जताई और अधिकारियों को उसी वर्ष दिसंबर तक काम पूरा करने के निर्देश दिए। जनवरी 2024 में भी निर्माण करीब 65 प्रतिशत पूरा होने की जानकारी सामने आई और काम दिन-रात चलाने के निर्देश दिए गए। इसके बाद 2024 में परियोजना की लागत को लेकर भी सवाल उठे। आरटीआई आधारित रिपोर्ट के अनुसार परियोजना की लागत 2022 में करीब 48 करोड़ रुपये से बढ़कर 99 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई। यानी देरी के साथ परियोजना की लागत में भी बड़ा उछाल आया।
सरकार की ओर से लगातार यह दावा किया जाता रहा कि सैन्य धाम जल्द प्रदेश को समर्पित किया जाएगा। अगस्त और अक्टूबर 2024 में निर्माण को तय समय में पूरा करने के निर्देश दिए गए। दिसंबर 2024 में भी अंतिम चरण के काम और फिनिशिंग का हवाला देते हुए इसे जल्द जनता को समर्पित करने की बात कही गई। यहीं से सैन्य धाम की कहानी सिर्फ निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि राजनीतिक सवाल भी बन जाती है।
2025 में भी इसके लोकार्पण को लेकर उम्मीदें जताई गईं। अक्टूबर 2025 में निरीक्षण के दौरान नौ नवंबर को राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री के संभावित दौरे के दौरान लोकार्पण का प्रस्ताव सामने आया था। लेकिन अब 2026 में चुनावी माहौल के बीच कांग्रेस ने फिर सरकार को घेरा है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने पांच वर्ष की देरी, लागत बढ़ने और चुनावी लाभ के लिए परियोजना को इस्तेमाल किए जाने पर सवाल उठाए हैं।
सैन्य धाम उत्तराखंड के लिए महज एक भवन नहीं है। प्रदेश के हजारों परिवारों की सैन्य परंपरा, शहीदों की स्मृति और युवाओं के लिए प्रेरणा से जुड़ा यह प्रकल्प है। शहीद सम्मान यात्रा के माध्यम से शहीद परिवारों के आंगन की मिट्टी भी यहां लाई गई है। ऐसे में पांच साल की देरी स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करती है कि आखिर परियोजना की योजना, निर्माण और निगरानी में ऐसी कौन-सी अड़चनें थीं जिनके कारण निर्धारित समयसीमा बार-बार आगे बढ़ती रही।
2027 विधानसभा चुनाव अब दूर नहीं हैं। ऐसे में सैन्य धाम का राजनीतिक महत्व भी बढ़ना स्वाभाविक है। भाजपा इसे सैनिक सम्मान और उत्तराखंड की सैन्य पहचान से जोड़ती रही है, जबकि कांग्रेस अब इसी परियोजना की देरी को सरकार के खिलाफ राजनीतिक हथियार बना रही है। यानी आने वाले महीनों में सैन्य धाम सिर्फ शहीदों की स्मृति का केंद्र नहीं रहेगा। यह सत्ता बनाम विपक्ष के चुनावी नैरेटिव का भी बड़ा मैदान बन सकता है। असल सवाल यह नहीं कि सैन्य धाम किसके खाते में जाएगा। असली सवाल यह है कि जिस धाम की नींव शहीदों की स्मृति में रखी गई थी, उसे समय पर पूरा करने की राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति पांच साल तक कहां थी? और अब जब चुनाव सामने हैं, तो सवाल और तीखा हो गया है। क्या सैन्य धाम की रफ्तार सचमुच शहीदों के सम्मान से बढ़ी है या चुनाव की घड़ी ने इसकी गति बढ़ाई है?
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