सोमवार, 7 सितंबर 2026
गाँव-गाँव में शहीद, शहर में अटका धाम
सैन्य धाम की नींव से चुनावी चर्चा तक पहुंचा सफर
तय समय बीता, तारीखें बदलीं और बढ़ती गई लागत
चुनाव से पहले सैन्य धाम फिर सियासत के केंद्र में
देहरादून। उत्तराखंड की पहचान अगर किसी एक शब्द से सबसे गहराई से जुड़ती है तो वह हैकृसैन्य परंपरा, जिस प्रदेश के हर गांव से सैनिक निकलते हैं और जिसके हजारों परिवारों का रिश्ता सेना से जुड़ा है, उसी प्रदेश में शहीदों की स्मृति में बनने वाला सैन्य धाम पांच साल से निर्माण, घोषणाओं और लोकार्पण की तारीखों के बीच उलझा हुआ है। अब विधानसभा चुनाव की आहट के बीच सैन्य धाम एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सवाल है, जिस परियोजना को शहीदों के सम्मान का प्रतीक बताया गया, उसे समय पर पूरा करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति पांच साल तक क्यों नहीं दिखाई दी?
सैन्य धाम का शिलान्यास वर्ष 2021 में हुआ। उस समय परियोजना को लेकर बड़े दावे किए गए। इसे उत्तराखंड के सैनिकों और शहीद परिवारों के सम्मान से जोड़ा गया और जल्द पूरा करने का लक्ष्य सामने रखा गया। बाद में निर्माण स्थल पर दूसरा शिलान्यास भी हुआ। 2023 तक परियोजना पूरी करने की समयसीमा बताई गई। लेकिन समयसीमा गुजर गई और धाम तैयार नहीं हुआ।
इसके बाद हर साल नई उम्मीद और नई तारीख सामने आती रही। कभी निर्माण में तेजी लाने के निर्देश दिए गए, कभी अधिकारियों को समयबद्ध तरीके से काम पूरा करने को कहा गया। निरीक्षण हुए, समीक्षा बैठकें हुईं और जल्द लोकार्पण के दावे किए गए। मगर सैन्य धाम का इंतजार खत्म नहीं हुआ। सवाल यह है कि पांच साल में ऐसा क्या नहीं हो सका, जो एक महत्वपूर्ण और राजनीतिक रूप से प्राथमिकता वाली परियोजना में होना चाहिए था?
सैन्य धाम की कहानी सिर्फ देरी तक सीमित नहीं है। परियोजना की लागत में वृद्धि ने भी सवाल खड़े किए। शुरुआती अनुमान के मुकाबले लागत बढ़ने की खबरें सामने आईं। यानी परियोजना जितनी लंबी खिंचती गई, उसके साथ सरकारी खजाने पर बोझ भी बढ़ता गया। यहां विपक्ष को सरकार पर हमला करने का मौका मिला। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सैन्य धाम को शहीदों के सम्मान के बजाय राजनीतिक परियोजना बना दिया गया। भाजपा स्वाभाविक रूप से इसे सैनिक सम्मान और राष्ट्रवाद से जोड़कर देखती रही। यही वह बिंदु है जहां शहीदों की स्मृति और चुनावी राजनीति एक-दूसरे के सामने खड़ी दिखाई देती हैं।
2027 विधानसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं हैं। उत्तराखंड में सैनिक परिवार और पूर्व सैनिक बड़ा सामाजिक वर्ग हैं। सैन्य धाम इस वर्ग की भावनाओं से सीधे जुड़ा हुआ है। इसलिए इसका राजनीतिक महत्व केवल एक निर्माण परियोजना तक सीमित नहीं है। भाजपा के लिए सैन्य धाम राष्ट्रवाद, सैनिक सम्मान और शहीदों की विरासत का प्रतीक है। वहीं कांग्रेस के लिए यही परियोजना सरकार की कार्यशैली और घोषणाओं की हकीकत पर सवाल उठाने का हथियार बन सकती है। यानी चुनावी मौसम में सैन्य धाम का मुद्दा जितना भावनात्मक है, उतना ही राजनीतिक भी।
सैन्य धाम के लिए प्रदेश के शहीद सैनिकों के घरों से मिट्टी जुटाने का अभियान चलाया गया था। उद्देश्य था कि शहीदों की स्मृति को इस धाम से जोड़ा जाए। यह भावनात्मक पहल थी और इसका संदेश भी स्पष्ट था। प्रदेश अपने बलिदानियों को नहीं भूलेगा। लेकिन अब पांच साल बाद यही सवाल उठ रहा है कि जब शहीदों के घरों से मिट्टी जुटाने में इतनी तत्परता दिखाई गई, तो उस मिट्टी से बनने वाले धाम को आकार देने में इतनी सुस्ती क्यों रही? शहीदों की स्मृति इंतजार नहीं मांगती। राजनीति मांगती हैकृसमय, मंच और चुनाव।
सैन्य धाम का निर्माण यदि निर्धारित समय में पूरा हो जाता तो आज राजनीतिक सवाल शायद इतने तीखे नहीं होते। लेकिन लगातार टलती समयसीमा और चुनाव के नजदीक फिर बढ़ती सक्रियता ने टाइमिंग पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्ष के लिए यह कहना आसान है कि सरकार ने पांच साल तक परियोजना को लटकाए रखा और अब चुनाव से पहले इसे फिर चर्चा में लाया जा रहा है। सत्ता पक्ष के पास इसका जवाब विकास कार्य की प्रगति और सैनिक सम्मान की अपनी प्राथमिकता के रूप में है। लेकिन जनता के सामने तीसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है। क्या शहीदों के नाम पर बनी परियोजनाओं की सफलता का पैमाना चुनावी लोकार्पण होना चाहिए या समय पर पूरा होना?
सैन्य धाम को लेकर अब सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि निर्माण कितने प्रतिशत पूरा हुआ। जनता जानना चाहेगी कि मूल समयसीमा क्या थी, उसमें देरी क्यों हुई, लागत कितनी बढ़ी, जिम्मेदारी किसकी थी और अब वास्तविक लोकार्पण कब होगा। क्योंकि यह कोई सामान्य सरकारी भवन नहीं है। यह उन सैनिकों के नाम पर बन रहा है जिन्होंने देश के लिए अपना जीवन दिया। इसलिए सवाल सरकार से नहीं, पूरे राजनीतिक तंत्र से हैकृशहीदों के नाम पर घोषणाएं इतनी जल्दी क्यों होती हैं और काम पूरा करने में पांच साल क्यों लगते हैं? 2027 का चुनाव जैसे-जैसे करीब आएगा, सैन्य धाम की राजनीति भी तेज होगी। मंचों पर शहीदों का सम्मान होगा, राष्ट्रवाद के नारे होंगे और लोकार्पण की चर्चा होगी। लेकिन चुनावी शोर के बीच एक सवाल दबना नहीं चाहिए।
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