मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

सात साल का ‘सड़कनामा’

नया प्रयोग देहरादून की 40 सड़कों का जिम्मा निजी कंपनी के हवाले 102 किलोमीटर सड़क नेटवर्क की देखरेख प्राइवेट हाथ में गुणवत्ता बिगड़ी तो जवाबदेही तय करने का किया गया है दावा देहरादून। राजधानी की सड़कों पर गड्ढे, उखड़ता डामर और बार-बार मरम्मत की समस्या से निजात दिलाने के लिए लोक निर्माण विभाग ने एक नया प्रयोग शुरू किया है। शहर की 40 प्रमुख सड़कों के रख-रखाव, सुधारीकरण और डामरीकरण की जिम्मेदारी अब सात साल के लिए एक निजी संस्था सरकायास को सौंपी गई है। 102 किलोमीटर लंबे सड़क नेटवर्क के लिए 89 करोड़ रुपये का अनुबंध किया गया है। यह महज सड़क मरम्मत का ठेका नहीं, बल्कि राजधानी की सड़कों के रखरखाव की पूरी व्यवस्था बदलने की कोशिश है। अब तक सड़क निर्माण और मरम्मत के लिए अलग-अलग कार्यों पर टेंडर आमंत्रित किए जाते थे। इससे विभाग को बार-बार निविदा प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था और मरम्मत के काम में समय लगने की शिकायतें सामने आती थीं। नए माडल में एक ही संस्था को लंबे समय तक सड़कों के रख-रखाव की जिम्मेदारी देकर जवाबदेही तय करने की कोशिश की गई है। हालांकि, इस व्यवस्था की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि सात साल तक सड़कों की गुणवत्ता कितनी बनी रहती है और जनता को गड्ढों से कितनी राहत मिलती है। इस अनुबंध की सबसे महत्वपूर्ण बात इसकी अवधि है। सामान्य तौर पर सड़क निर्माण के बाद कुछ समय बीतते ही मरम्मत की जरूरत सामने आने लगती है। इसके बाद विभागीय प्रक्रिया, बजट और टेंडर के बीच काम अटकने की शिकायतें भी होती हैं। ऐसे में लंबे समय के रख-रखाव का अनुबंध संबंधित संस्था को सड़क की स्थिति बनाए रखने के लिए जवाबदेह बनाने का माध्यम बन सकता है। परफार्मेंस बेस्ड मेंटेनेंस कान्ट्रैक्ट यानी प्रदर्शन आधारित रख-रखाव अनुबंध का मूल विचार यही है कि सड़क की देखरेख केवल निर्माण तक सीमित न रहे, बल्कि उसकी गुणवत्ता और उपयोगिता पर भी ध्यान दिया जाए। हालांकि, इस माडल में भुगतान की शर्तें, गुणवत्ता के मानक, खराब सड़क पर दंड और अनुबंध उल्लंघन की कार्रवाई कितनी प्रभावी है, यह जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है। 102 किलोमीटर लंबी सड़कों के लिए 89 करोड़ रुपये का अनुबंध अपने आप में बड़ा वित्तीय दायित्व है। सात साल की अवधि के हिसाब से यह औसतन लगभग 12.71 करोड़ रुपये सालाना बैठता है। हालांकि, वास्तविक खर्च का आकलन अनुबंध की शर्तों, कार्यों के दायरे और भुगतान की निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर ही किया जा सकता है। सवाल यह है कि इस राशि के बदले सड़कों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए विभाग ने कौन-से मापदंड तय किए हैं? क्या सड़क की सतह, गड्ढों, जल निकासी और डामर की गुणवत्ता की नियमित जांच होगी? क्या नागरिकों की शिकायतों के निस्तारण की समयसीमा तय की गई है? इन बिंदुओं पर स्पष्ट व्यवस्था इस परियोजना को प्रभावी बनाने के लिए जरूरी होगी। लोनिवि के मुख्य अभियंता दयानंद के अनुसार, सड़कों की गुणवत्ता और निगरानी के लिए नेटवर्क सर्वे व्हीकल का इस्तेमाल किया जाएगा। इस तकनीक के माध्यम से सड़क नेटवर्क की स्थिति का आकलन कर रखरखाव की जरूरतों को पहचानने में मदद मिल सकती है। लेकिन तकनीक की उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं है। सर्वे के निष्कर्षों का नियमित सार्वजनिक खुलासा, खराब सड़कों की पहचान और सुधार की समयसीमा भी तय होनी चाहिए। यदि निरीक्षण रिपोर्ट केवल विभागीय फाइलों तक सीमित रह गई, तो आम जनता के लिए यह जानना मुश्किल होगा कि 89 करोड़ रुपये के अनुबंध से वास्तव में कितना सुधार हुआ। देहरादून में इस माडल को लागू करने के पीछे सड़क रख-रखाव की व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाने की मंशा है। यदि यहां इसके परिणाम संतोषजनक रहते हैं, तो इसे राज्य के दूसरे क्षेत्रों में भी लागू करने पर विचार किया जा सकता है। ऐसे में यह परियोजना केवल राजधानी की 40 सड़कों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि प्रदेश में सड़क रखरखाव के भविष्य के माडल के रूप में भी देखी जा सकती है। हालांकि, देहरादून में सफल प्रयोग का दावा करने से पहले इसके परिणामों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन जरूरी होगा। सड़क की मौजूदा स्थिति, मरम्मत के बाद उसकी गुणवत्ता, शिकायतों की संख्या और निर्धारित समय में किए गए सुधार जैसे संकेतकों के आधार पर ही इसकी सफलता तय की जानी चाहिए। राजधानी की सड़कों को लेकर आम नागरिकों की अपेक्षा साफ हैकृसड़कें टिकाऊ हों, गड्ढे समय पर भरे जाएं और मरम्मत के नाम पर बार-बार सरकारी धन खर्च न करना पड़े। निजी संस्था को सात साल का जिम्मा सौंपने से विभाग की जवाबदेही समाप्त नहीं होती। सार्वजनिक धन के उपयोग, अनुबंध की निगरानी और काम की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी लोनिवि की बनी रहेगी। अब असली परीक्षा अनुबंध की नहीं, नतीजों की है। 89 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद यदि सड़कें बार-बार उखड़ती हैं, तो नया माडल भी पुरानी व्यवस्था से अलग साबित नहीं होगा। लेकिन यदि सात साल तक गुणवत्ता बनी रहती है, शिकायतों का समय पर समाधान होता है और खर्च का पूरा हिसाब सार्वजनिक रहता है, तो देहरादून की यह पहल प्रदेश में सड़क रखरखाव की तस्वीर बदल सकती है।

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