बुधवार, 14 अक्टूबर 2026
एसआईआर से बदला ‘चुनावी गणित’
उत्तराखंड में मुस्लिम बहुल सीटों पर नए सिरे से बिछेगी अब सियासी बिसात
2022 की मतदाता सूची और एसआईआर के बाद के आंकड़ों में बड़ा अंतर
हरिद्वार से ऊधमसिंह नगर तक भाजपा और कांग्रेस की रणनीति की होगी परीक्षा
चुनाव से पहले मतदाता सूची में बदलाव ने बढ़ाई राजनीतिक दलों की चिंता
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण ने प्रदेश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। खासकर मुस्लिम बहुल और मुस्लिम मतदाताओं के प्रभाव वाली मानी जाने वाली विधानसभा सीटों पर 2022 के चुनाव के समय की मतदाता सूची और एसआईआर के बाद सामने आए आंकड़ों के बीच बड़ा अंतर राजनीतिक दलों का ध्यान खींच रहा है। हरिद्वार, देहरादून, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे जिलों में मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय कमी दर्ज होने के बाद भाजपा और कांग्रेस सहित तमाम दलों को अपने पुराने चुनावी आकलन की नए सिरे से समीक्षा करनी पड़ रही है।
इस बदलाव का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है, क्योंकि उत्तराखंड में कई सीटों पर जीत-हार का अंतर अपेक्षाकृत कम रहा है। ऐसे में मतदाता सूची में बदलाव का असर चुनावी रणनीति पर पड़ना स्वाभाविक है। हालांकि, मतदाताओं की कुल संख्या में कमी अपने आप में यह साबित नहीं करती कि किसी खास समुदाय के मतदाताओं के नाम ही अधिक हटे हैं या किसी राजनीतिक दल को इसका सीधा लाभ मिलेगा। इसके लिए विधानसभा क्षेत्र और बूथ स्तर के विस्तृत आंकड़ों की जरूरत होगी।
2022 के विधानसभा चुनाव के समय इस्तेमाल की गई मतदाता सूचियों की तुलना एसआईआर के बाद की सूचियों से करने पर देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जिलों में बड़ा अंतर सामने आया है। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इन चार जिलों में 2022 में कुल 49,87,332 मतदाता थे, जबकि पुनरीक्षण के बाद यह संख्या 42,86,021 रह गई। दोनों आंकड़ों के बीच 7,01,311 मतदाताओं का अंतर है। देहरादून जिले में 2022 के 14,87,775 मतदाताओं के मुकाबले संशोधित सूची में 11,90,805 मतदाता दर्ज किए गए। हरिद्वार में यह संख्या 14,20,182 से घटकर 12,46,219, ऊधमसिंह नगर में 13,03,476 से घटकर 11,55,672 और नैनीताल में 7,75,899 से घटकर 6,93,325 रह गई।
इन आंकड़ों ने राजनीतिक दलों के सामने मतदाता सूची के बदलावों को समझने की चुनौती खड़ी कर दी है। हालांकि, 2022 की सूची और 2026 की सूची के बीच का पूरा अंतर केवल एसआईआर में नाम हटाए जाने का आंकड़ा नहीं माना जा सकता। दोनों सूचियों के बीच समयांतराल में नए नाम जुड़ने, मृत्यु, स्थायी रूप से स्थानांतरित होने, दोहरी प्रविष्टियों और अन्य संशोधनों की भूमिका भी हो सकती है। हरिद्वार जिले की पिरान कलियर, मंगलौर, भगवानपुर और खानपुर जैसी सीटों के साथ देहरादून तथा ऊधमसिंह नगर के कुछ विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका को लेकर राजनीतिक दल विशेष रूप से आकलन करते रहे हैं। एसआईआर के बाद मतदाता संख्या में आए बदलाव ने इन सीटों पर चुनावी समीकरणों की समीक्षा को महत्वपूर्ण बना दिया है।
हरिद्वार जिले में पिरान कलियर में 2022 के 1,27,118 मतदाताओं के मुकाबले संशोधित सूची में 1,16,187 मतदाता दर्ज किए गए। मंगलौर में यह संख्या 1,15,978 से घटकर 1,07,424 और भगवानपुर में 1,23,476 से घटकर 1,17,044 रह गई। इन आंकड़ों के आधार पर किसी समुदाय के मतदाताओं की संख्या में वास्तविक कमी या उसके चुनावी प्रभाव का निष्कर्ष निकालना अभी जल्दबाजी होगा। इसके लिए यह जानना जरूरी है कि हटाए गए नाम किन कारणों से हटे, कितने पात्र मतदाताओं ने दोबारा नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन किया और कितने नाम अंतिम सूची में बहाल हुए।
एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर कांग्रेस ने मतदाता सूची से नाम हटाए जाने पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का आरोप है कि पुनरीक्षण का प्रभाव मुस्लिम मतदाताओं वाले क्षेत्रों में अधिक दिखाई दे रहा है। दूसरी ओर, भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी करार देते हुए चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भरोसा जताया है। इस विवाद के बीच असल सवाल यह है कि निर्वाचन विभाग विधानसभा क्षेत्रवार और बूथवार आंकड़ों के आधार पर स्थिति को कितना स्पष्ट करता है। लोकतंत्र में मतदाता सूची का शुद्ध होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी यह सुनिश्चित करना भी है कि कोई पात्र नागरिक केवल सत्यापन या दस्तावेजी प्रक्रिया की कठिनाइयों के कारण मतदान के अधिकार से वंचित न रह जाए।
2022 के विधानसभा चुनाव में कुछ सीटों पर जीत का अंतर काफी कम था। ऐसे क्षेत्रों में मतदाता सूची के बदलावों की पड़ताल राजनीतिक दलों के लिए विशेष महत्व रखती है। उदाहरण के तौर पर, हरिद्वार ग्रामीण में कांग्रेस की अनुपमा रावत ने भाजपा के स्वामी यतीश्वरानंद को 4,472 मतों से हराया था, जबकि मंगलौर में भी मुकाबला करीबी रहा था। ऐसे चुनावी इतिहास वाले क्षेत्रों में दल पुराने बूथवार मतदान, नए मतदाताओं और संशोधित सूची के आंकड़ों का मिलान कर अपनी रणनीति तय करना चाहेंगे। लेकिन मतदाता सूची में कमी को सीधे किसी पार्टी की जीत या हार से जोड़ना उचित नहीं होगा। हटाए गए सभी मतदाता मतदान करने वाले थे या नहीं, वह किस राजनीतिक दल का समर्थन करते थे और उनमें से कितने पात्र मतदाता अब सूची से बाहर हैंकृइन सवालों के उत्तर के बिना किसी निश्चित चुनावी निष्कर्ष पर पहुंचना संभव नहीं है।
उत्तराखंड में 2027 का विधानसभा चुनाव भाजपा और कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई होगा। ऐसे में एसआईआर के बाद मतदाता सूची में हुए बदलाव राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने रह सकते हैं। भाजपा जहां सूची के शुद्धिकरण और चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर जोर दे सकती है, वहीं कांग्रेस पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने और कथित अनियमितताओं की जांच को मुद्दा बना सकती है। निर्वाचन आयोग के सामने इस समय दोहरी जिम्मेदारी हैकृमतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाना और यह सुनिश्चित करना कि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से बाहर न रहे। पारदर्शी आंकड़े, शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण और नाम जोड़ने की सरल प्रक्रिया इस बहस को तथ्यात्मक आधार दे सकते हैं। निष्कर्ष यही है कि एसआईआर ने चुनावी गणित की समीक्षा की जरूरत जरूर बढ़ाई है, लेकिन 2027 की जीत-हार का फैसला अभी इन आंकड़ों से नहीं लिखा जा सकता। असली तस्वीर तब साफ होगी, जब विधानसभा क्षेत्रवार और बूथवार बदलावों के कारण सामने आएंगे और पात्र मतदाताओं के नामों की स्थिति स्पष्ट होगी। फिलहाल भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चुनौती पुराने चुनावी आंकड़ों पर भरोसा करने के बजाय बदली हुई मतदाता सूची की तथ्यात्मक पड़ताल करना है।
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