शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

सूबे के गांव-गांव यूकेडी की ‘हुंकार’

भाजपा-कांग्रेस की नींद उड़ाने का है दावा 2027 की जंग में क्षेत्रीय अस्मिता का दांव सत्ता की सियासत में खोई जमीन की जंग देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में 2027 की चुनावी जंग जैसे-जैसे करीब आ रही है, वैसे-वैसे क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई भी तेज होने लगी है। उत्तराखंड क्रांति दल गांव-गांव दस्तक देकर उस राजनीतिक जमीन को फिर हासिल करने की कोशिश में जुटा है, जिस पर कभी अलग राज्य आंदोलन के दौरान उसका मजबूत दावा था। जिस दल ने उत्तराखंड की अलग पहचान के लिए संघर्ष किया, वही आज सत्ता की राजनीति में हाशिये पर खड़ा दिखाई देता है। अब सवाल यह है कि क्या यूकेडी अपनी आंदोलनकारी विरासत को चुनावी हथियार बना पाएगा या फिर भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता की लड़ाई में क्षेत्रीय राजनीति एक बार फिर नारों तक सिमट जाएगी? यूकेडी की गांव-गांव पहुंचने की कोशिश को महज जनसंपर्क अभियान मानना राजनीतिक तस्वीर को अधूरा पढ़ना होगा। इसके पीछे उस असंतोष को राजनीतिक आवाज देने की संभावना है, जो पहाड़ में पलायन, बेरोजगारी, जमीनों पर बढ़ते दबाव, स्थानीय युवाओं के भविष्य और विकास के असमान स्वरूप को लेकर मौजूद है। यही वे सवाल हैं, जिनके आधार पर क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय दलों से अलग अपनी पहचान बना सकता है। लेकिन इस संभावना को वास्तविक राजनीतिक ताकत में बदलना आसान नहीं है। यूकेडी की राजनीति का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि अलग उत्तराखंड की मांग को जनांदोलन बनाने में उसकी ऐतिहासिक भूमिका रही, लेकिन राज्य गठन के बाद वह सत्ता की निर्णायक ताकत नहीं बन सका। राज्य आंदोलन की विरासत उसके पास रही, मगर उसका राजनीतिक लाभ भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल उठाते रहे। नतीजा यह कि जिस क्षेत्रीय चेतना ने उत्तराखंड के निर्माण की जमीन तैयार की, वह विधानसभा की राजनीति में स्थायी जनादेश में तब्दील नहीं हो पाई। यह यूकेडी की सबसे बड़ी राजनीतिक विफलता भी है और 2027 से पहले उसके सामने सबसे बड़ा सवाल भी। आखिर जनता क्षेत्रीय अस्मिता की बात करने वाले दल को सत्ता के विकल्प के रूप में क्यों नहीं स्वीकार कर सकी? क्या नेतृत्व की खींचतान, संगठन की कमजोरी और चुनावी रणनीति की असफलता ने दल को पीछे धकेला? या फिर भाजपा-कांग्रेस का मजबूत चुनावी ढांचा क्षेत्रीय राजनीति पर भारी पड़ा? इन सवालों से आंख चुराकर यूकेडी अपनी खोई जमीन वापस नहीं पा सकता। उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस की राजनीति लंबे समय से सत्ता के इर्द-गिर्द घूमती रही है। चुनाव आते ही रोजगार, पलायन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जमीन और स्थानीय अधिकारों जैसे मुद्दे चर्चा में आते हैं, लेकिन जनता के सामने सवाल बना रहता है कि इन समस्याओं का स्थायी समाधान कब निकलेगा। यूकेडी इसी राजनीतिक असंतोष को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर सकता है। लेकिन यहां एक बड़ा पेच है। भाजपा और कांग्रेस से नाराज मतदाता अपने आप यूकेडी के समर्थक नहीं बन जाते। असंतोष को वोट में बदलने के लिए भरोसेमंद नेतृत्व, मजबूत प्रत्याशी, बूथ स्तर का संगठन और स्पष्ट राजनीतिक कार्यक्रम चाहिए। यदि यूकेडी केवल राष्ट्रीय दलों को कोसने और क्षेत्रीय अस्मिता की दुहाई देने तक सीमित रहा, तो उसका अभियान चुनावी शोर से आगे नहीं बढ़ पाएगा। पलायन से खाली होते गांव, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार की कमी, जमीनों को लेकर चिंता और संसाधनों पर स्थानीय अधिकारकृये उत्तराखंड की राजनीति के बुनियादी प्रश्न हैं। यूकेडी के पास इन मुद्दों को राजनीतिक संघर्ष के केंद्र में लाने का अवसर है। मगर उसे यह भी बताना होगा कि सत्ता मिलने पर वह क्या बदलेगा, कैसे बदलेगा और उसके प्रस्तावों को लागू करने का रास्ता क्या होगा। जनता अब केवल भावनात्मक नारों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। उसे यह जानना है कि गांवों में रोजगार कैसे पैदा होगा, पलायन कैसे रुकेगा, पहाड़ी क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं कैसे सुधरेंगी तथा स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा के लिए कौन-सी ठोस नीतियां बनाई जाएंगी। यूकेडी इन सवालों के स्पष्ट जवाब दे सका, तभी उसकी क्षेत्रीय राजनीति भाजपा-कांग्रेस के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। यूकेडी की राह में सबसे बड़ी बाधा केवल भाजपा-कांग्रेस का वर्चस्व नहीं, बल्कि अपनी संगठनात्मक क्षमता को प्रभावी बनाने की चुनौती भी है। गांवों में पहुंचना जरूरी है, लेकिन उस संपर्क को स्थायी संगठन में बदलना उससे भी ज्यादा जरूरी है। कार्यकर्ताओं की सक्रियता, स्थानीय नेतृत्व का विस्तार, उम्मीदवारों का चयन और चुनाव के बाद भी जनता के बीच मौजूदगीकृयही तय करेंगे कि दल कितना आगे बढ़ सकता है। यदि यूकेडी चुनाव से पहले सक्रिय और चुनाव के बाद निष्क्रिय रहने वाली राजनीति से बाहर निकलता है, तो उसे क्षेत्रीय मुद्दों पर अपना आधार बढ़ाने का अवसर मिल सकता है। लेकिन यदि संगठन बिखरा रहा और नेतृत्व एकजुट रणनीति पेश नहीं कर पाया, तो भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ पैदा होने वाला असंतोष भी उसके लिए राजनीतिक लाभ नहीं बन पाएगा। आगामी विधानसभा चुनाव यूकेडी के लिए केवल कुछ सीटें जीतने का मुकाबला नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता साबित करने की परीक्षा भी है। गांव-गांव दस्तक इस दिशा में पहला कदम हो सकती है, लेकिन असली लड़ाई मतदाताओं के विश्वास की है। दल को साबित करना होगा कि वह उत्तराखंड की क्षेत्रीय अस्मिता का नाम लेने भर वाला संगठन नहीं, बल्कि प्रदेश की समस्याओं का व्यावहारिक समाधान देने में सक्षम राजनीतिक विकल्प है। भाजपा और कांग्रेस के लिए भी क्षेत्रीय मुद्दों की अनदेखी करना आसान नहीं होगा, लेकिन यूकेडी की सक्रियता से दोनों दलों की चुनावी जमीन हिल जाएगी, यह मान लेना अभी जल्दबाजी होगी। उसका वास्तविक प्रभाव संगठन के विस्तार, प्रत्याशियों की ताकत और मतदाताओं के समर्थन से ही सामने आएगा। उत्तराखंड की सियासत का सबसे बड़ा सवाल यही हैकृजिस दल ने अलग राज्य का सपना जनांदोलन बनाया, क्या वह अब उसी राज्य की सत्ता में निर्णायक भूमिका निभा पाएगा? यूकेडी के सामने इतिहास को दोहराने का नहीं, अपनी राजनीतिक गलतियों से आगे निकलने का मौका है। गांवों की चौपाल से उठने वाली आवाज यदि विधानसभा तक पहुंचानी है, तो उसे नारों से आगे बढ़कर संगठन, नेतृत्व और नीतियों की ठोस जमीन तैयार करनी होगी। वरना राज्य आंदोलन की विरासत का हवाला देने वाला दल, राज्य की सत्ता की लड़ाई में हाशिये पर खड़ा एक और चुनाव देखता रह जाएगा।

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