गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026
संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल,भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
भाजपा बोलीकृनकारात्मक नैरेटिव से कांग्रेस की हताशा उजागर
लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा मजबूत करने की आज जरूरत
कांग्रेस के आरोपों को बताया है राजनीतिक रणनीति का हिस्सा
देहरादून। उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सियासी घमासान तेज होता दिखाई दे रहा है। भाजपा ने कांग्रेस पर संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास का माहौल बनाने और नकारात्मक नैरेटिव को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया है। पार्टी का कहना है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार सवाल खड़े करना राजनीतिक असहमति से आगे की बात है और इससे जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा होती है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि कांग्रेस को चुनावी मुद्दों पर जनता के बीच जाना चाहिए, लेकिन इसके बजाय वह चुनाव आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को लेकर सवाल खड़े कर रही है। पार्टी के मुताबिक, संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने का अधिकार सभी राजनीतिक दलों को है, लेकिन आरोपों के साथ ठोस तथ्य और प्रमाण भी सामने रखे जाने चाहिए।
भाजपा का यह हमला ऐसे समय में आया है, जब मतदाता सूची, विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर और चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर कांग्रेस लगातार सवाल उठा रही है। कांग्रेस इन मुद्दों को चुनावी पारदर्शिता और मताधिकार से जोड़ रही है, जबकि भाजपा कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बता रही है। भाजपा का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की भूमिका चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की है। ऐसे में बिना ठोस आधार के लगातार अविश्वास का वातावरण बनाने से लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता के भरोसे पर असर पड़ सकता है। पार्टी ने कांग्रेस से आरोपों के बजाय तथ्य सामने रखने को कहा है।
हालांकि, कांग्रेस का पक्ष इससे अलग है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया, मतदाता सूची और निर्वाचन व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाना लोकतंत्र में विपक्ष की जिम्मेदारी है। पार्टी का तर्क है कि यदि किसी प्रक्रिया में उसे कोई आपत्ति दिखाई देती है तो उसे सार्वजनिक करना संवैधानिक अधिकार है। कांग्रेस इसे संस्थाओं के खिलाफ अभियान नहीं, बल्कि चुनावी पारदर्शिता से जुड़ा सवाल बताती रही है। यही विरोधाभास अब उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। भाजपा इसे कांग्रेस की हताशा और नकारात्मक राजनीति के रूप में पेश कर रही है, जबकि कांग्रेस इसे लोकतांत्रिक निगरानी और चुनावी पारदर्शिता का प्रश्न बता रही है।
विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज होने के साथ आने वाले दिनों में यह टकराव और बढ़ सकता है। खासतौर पर मतदाता सूची और एसआईआर जैसे मुद्दे यदि चुनावी बहस के केंद्र में आते हैं तो दोनों दलों के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तेज होने की संभावना है। ऐसे में असली कसौटी यही होगी कि आरोपों और राजनीतिक दावों के बीच तथ्य कितने स्पष्ट रूप से जनता के सामने रखे जाते हैं।
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