शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026
चुनाव सिर पर और सत्ता ‘बेखबर’
2027 की जंग से पहले प्रदेश की बदहाली भाजपा के लिए चुनौती
कांग्रेस के लिए सियासी हथियार से व्यवस्था पर उठाती रही सवाल
सत्ता और विपक्ष दोनों से जवाब मांग रही है प्रदेश की आम जनता
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट तेज हो रही है। भाजपा सत्ता में वापसी के लिए संगठन को धार देने और अपनी उपलब्धियां गिनाने की तैयारी में जुटी है, वहीं कांग्रेस सरकार को घेरकर सत्ता में लौटने की जमीन तलाश रही है। लेकिन चुनावी रणनीतियों, राजनीतिक समीकरणों और सत्ता के दावों के बीच राजधानी देहरादून की सड़कें एक अलग ही कहानी कह रही हैं। उत्तराखंड की राजनीति में राजधानी का अपना महत्व है। देहरादून केवल प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि प्रदेश की सत्ता, नौकरशाही और राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र भी है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों, विधायकों और वरिष्ठ अधिकारियों तक की मौजूदगी इसी शहर में रहती है। इसके बावजूद आम नागरिक का जाम से जूझना, फुटपाथ पर सुरक्षित रास्ता नहीं मिलना और पार्किंग की अव्यवस्था से परेशान होना राजनीतिक इच्छाशक्ति पर सवाल खड़े करता है। यह परेशानी अब केवल यातायात तक सीमित नहीं, बल्कि शासन की प्राथमिकताओं से जुड़ा राजनीतिक प्रश्न बन सकती है।
प्रदेश में भाजपा की सरकार है। लिहाजा देहरादून की यातायात व्यवस्था और अतिक्रमण पर उठने वाले सवालों की सीधी राजनीतिक जिम्मेदारी सरकार पर आएगी। भाजपा 2027 के चुनाव में विकास, सुशासन और मजबूत नेतृत्व को अपनी ताकत के रूप में पेश करना चाहेगी। लेकिन विपक्ष के पास यह पूछने का अवसर रहेगा कि जब राजधानी में ही सड़क और फुटपाथ व्यवस्थित नहीं हो पा रहे, तो विकास के दावों का लाभ आम नागरिक तक किस हद तक पहुंचा है? वीआईपी वाहनों की बेतरतीब पार्किंग का सवाल इस बहस को और राजनीतिक बनाता है। यदि आम नागरिक के वाहन पर नियमों के उल्लंघन के लिए कार्रवाई होती है, तो रसूखदारों के मामले में भी वैसी ही सख्ती क्यों नहीं दिखाई देनी चाहिए? सार्वजनिक सड़क किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। नियमों का पालन सबके लिए समान होना चाहिए। यदि प्रशासनिक कार्रवाई में किसी तरह का भेदभाव दिखाई देता है, तो यह सरकार की छवि और कानून के समान अनुपालनकृदोनों के लिए चुनौती बनता है।
भाजपा के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है। उसे एक ओर अपने विकास कार्यों का राजनीतिक बचाव करना होगा, तो दूसरी ओर उन कमियों पर भी जवाब देना होगा, जो नागरिकों को रोजाना परेशान करती हैं। चुनाव से पहले इन समस्याओं का समाधान करना सरकार के लिए केवल प्रशासनिक जरूरत नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश देने का अवसर भी है। विपक्षी कांग्रेस के लिए देहरादून की बदहाल यातायात व्यवस्था सरकार को घेरने का मुद्दा बन सकती है। रोजगार, महंगाई, पलायन और बुनियादी सुविधाओं के सवालों के साथ राजधानी में जाम और अतिक्रमण की समस्या को जोड़कर कांग्रेस सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठा सकती है। यह ऐसा मुद्दा है, जिसे जनता को समझाने के लिए लंबे राजनीतिक भाषणों की जरूरत नहीं। नागरिक खुद सड़कों पर इसकी कीमत चुका रहे हैं। लेकिन कांग्रेस के सामने भी राजनीतिक चुनौती कम नहीं है। केवल भाजपा को कठघरे में खड़ा करने से सत्ता का रास्ता नहीं खुलेगा। उसे यह बताना होगा कि उसकी सरकार बनने पर शहर की यातायात व्यवस्था कैसे बदलेगी, पार्किंग की समस्या का समाधान क्या होगा, फुटपाथों को अतिक्रमण से कैसे मुक्त रखा जाएगा और नियम तोड़ने वालों पर बिना भेदभाव कार्रवाई कैसे सुनिश्चित होगी।
विपक्ष के लिए सबसे बड़ा अवसर यही है कि वह विरोध की राजनीति से आगे बढ़कर वैकल्पिक शहरी नीति पेश करे। यदि कांग्रेस इन मुद्दों को केवल चुनावी बयानबाजी तक सीमित रखती है, तो जनता के बीच उसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे। देहरादून की अव्यवस्था का सबसे तीखा राजनीतिक पहलू वीआईपी संस्कृति और आम नागरिक के अनुभव के बीच का अंतर है। सत्ता के गलियारों में बैठकों, योजनाओं और विकास के दावों पर चर्चा होती है, जबकि सड़क पर निकलने वाला नागरिक जाम में अपना समय गंवाता है। फुटपाथ पर कब्जे के कारण पैदल चलने वालों को सड़क पर उतरना पड़ता है। सार्वजनिक स्थानों के उपयोग में यह असंतुलन एक बुनियादी सवाल खड़ा करता हैकृक्या राजधानी की व्यवस्था आम जनता की सुविधा के लिए है या प्रभावशाली लोगों की सहूलियत के हिसाब से चल रही है?
यह सवाल चुनावी राजनीति में इसलिए महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि नागरिकों का शासन से सीधा संपर्क इन्हीं रोजमर्रा की परिस्थितियों में होता है। बड़ी परियोजनाएं और घोषणाएं राजनीतिक विमर्श में जगह बना सकती हैं, लेकिन सड़क पर रोज होने वाली परेशानी शासन के प्रति नागरिक की धारणा को भी प्रभावित करती है। हालांकि, इस असंतोष का चुनावी नतीजों पर कितना असर पड़ेगा, यह स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवारों और दूसरे मुद्दों पर भी निर्भर करेगा।
आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के सामने शहरी मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की चुनौती होगी। देहरादून का विस्तार, बढ़ता यातायात, पार्किंग की कमी और फुटपाथों पर अतिक्रमण ऐसे मुद्दे हैं, जिनका समाधान केवल अस्थायी अभियान से नहीं हो सकता। इसके लिए दीर्घकालीन नियोजन, सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने, पार्किंग व्यवस्था विकसित करने और नगर निगम तथा यातायात पुलिस के बीच प्रभावी समन्वय की जरूरत है। राजनीतिक दलों को यह भी स्पष्ट करना होगा कि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित तो नहीं रहेगी और क्या सार्वजनिक स्थानों पर नियमों का उल्लंघन करने वाले प्रभावशाली लोगों पर भी समान कार्रवाई होगी। साथ ही, छोटे कारोबारियों की आजीविका और पैदल यात्रियों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्या होगी? इन सवालों के जवाब किसी भी राजनीतिक दल की शहरी नीति की गंभीरता को सामने लाएंगे।
2027 का चुनाव अभी भविष्य में है, लेकिन उसकी राजनीतिक तैयारी शुरू हो चुकी है। भाजपा के लिए चुनौती अपने शासन की उपलब्धियों के साथ उन समस्याओं का जवाब देना है, जिन्हें जनता रोज महसूस करती है। कांग्रेस के लिए अवसर इन समस्याओं को सरकार की जवाबदेही से जोड़ने और ठोस विकल्प पेश करने का है। दोनों दलों के लिए यह समझना जरूरी होगा कि राजधानी की अव्यवस्था केवल नगर निगम या यातायात पुलिस का विषय बताकर राजनीतिक जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। चुनावी सवाल साफ हैकृभाजपा विकास के दावों के बीच राजधानी की बदहाली का जवाब कैसे देगी और कांग्रेस इस बदहाली को सत्ता परिवर्तन के मुद्दे में बदलने के लिए क्या ठोस विकल्प रखेगी? देहरादून की सड़कें फिलहाल किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में फैसला नहीं सुना रहीं। लेकिन वह सत्ता और विपक्ष, दोनों से जवाब जरूर मांग रही हैं। 2027 में यह मुद्दा कितना बड़ा राजनीतिक रूप लेगा, यह आने वाले महीनों में दलों की रणनीति और प्रशासन की कार्रवाई से स्पष्ट होगा। फिलहाल इतना तय है कि राजधानी की सड़कों पर आम आदमी की परेशानी को अनदेखा करना भाजपा के लिए आसान नहीं होगा और इसे चुनावी मुद्दा बनाने वाली कांग्रेस भी समाधान की जिम्मेदारी से बच नहीं सकेगी।
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