शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026
...और भाजपा को याद आई ‘वोट चोरी’
कांग्रेस पर हमलावर हुई भाजपा, मतदाता सूची के विवाद ने पकड़ा सियासी तूल
भाजपा ने शुरू कर दिया है कांग्रेस पर वोट चोरी के आरोप लगाकर पलटवार
यह दलों की जुबानी जंग अब राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल बनती दिख रही
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट तेज होते ही भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी घमासान भी तेज होने लगा है। अब तक कांग्रेस जहां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर सवाल उठाती रही है, वहीं भाजपा नेताओं ने भी कांग्रेस पर वोट चोरी के आरोप लगाकर पलटवार शुरू कर दिया है। चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर छिड़ी यह जुबानी जंग अब राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल बनती दिख रही है। सवाल यह है कि मतदाताओं के अधिकारों की चिंता करने वाले राजनीतिक दलों की प्राथमिकता वास्तव में पारदर्शी चुनाव व्यवस्था है या फिर मतदाता सूची के बहाने एक-दूसरे को कठघरे में खड़ा करने की सियासी कवायद?
उत्तराखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद बड़ी संख्या में नाम हटने और नए नाम जुड़ने के आंकड़ों ने राजनीतिक दलों को आमने-सामने ला दिया है। कांग्रेस लगातार मतदाता सूची में नाम काटे जाने को लेकर सवाल उठाती रही है। पार्टी की आशंका है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया का असर चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। दूसरी ओर भाजपा कांग्रेस के आरोपों को राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश के रूप में पेश कर रही है और अब खुद भी वोट चोरी का आरोप लगाकर विपक्ष को घेर रही है।
मतदाता सूची में संशोधन निर्वाचन प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन जब बड़े पैमाने पर नाम हटने की बात सामने आए तो यह सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि किसी भी पात्र मतदाता का नाम गलती से न कटे। इसी तरह राजनीतिक दलों को भी आरोप लगाने से पहले ठोस तथ्य सामने रखने चाहिए। केवल राजनीतिक बयानबाजी से न तो किसी का आरोप साबित होता है और न ही मतदाताओं की शंकाओं का समाधान। भाजपा नेताओं की ओर से कांग्रेस पर वोट चोरी के आरोप ऐसे समय लगाए जा रहे हैं, जब दोनों दलों ने 2027 की चुनावी लड़ाई के लिए अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। भाजपा संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने और सरकार की उपलब्धियां जनता तक पहुंचाने में जुटी है। कांग्रेस बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और जनहित के मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। ऐसे में मतदाता सूची का विवाद दोनों दलों के लिए एक-दूसरे पर राजनीतिक बढ़त बनाने का माध्यम बनता दिखाई दे रहा है।
भाजपा की रणनीति कांग्रेस को रक्षात्मक स्थिति में लाने की हो सकती है, जबकि कांग्रेस मतदाता सूची में गड़बड़ी की आशंकाओं को लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर उठा रही है। मगर इस राजनीतिक टकराव के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल पीछे छूटना नहीं चाहिए कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटे हैं, उनमें कितने अपात्र थे और कितने पात्र मतदाताओं के नाम किसी त्रुटि के कारण कटे हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जुड़े आंकड़े चुनावी बहस का केंद्र बन चुके हैं। ऐसे में राजनीतिक दलों को आंकड़ों की अपनी-अपनी व्याख्या करने के बजाय उन मामलों को सामने लाना चाहिए, जिनमें कथित गड़बड़ी हुई है। यदि किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है तो उसकी बहाली सुनिश्चित होनी चाहिए। वहीं, यदि किसी राजनीतिक दल के पास वोट चोरी के प्रमाण हैं तो उन्हें संबंधित निर्वाचन अधिकारियों के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
लोकतंत्र में मतदाता सूची की विश्वसनीयता चुनाव की निष्पक्षता की बुनियाद है। इस पर संदेह पैदा करने वाले आरोप गंभीर हैं और उनका निपटारा भी तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। केवल एक-दूसरे पर आरोप लगाकर राजनीतिक दल अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। उत्तराखंड में भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला जैसे-जैसे नजदीक आएगा, वैसे-वैसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के और तीखे होने की संभावना है। भाजपा सत्ता में वापसी की तैयारी कर रही है तो कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल बनाने में जुटी है। मतदाता सूची का विवाद अब इसी चुनावी रणनीति का हिस्सा बनता जा रहा है।
लेकिन जनता के लिए असली मुद्दा यह नहीं है कि कौन-सी पार्टी किस पर वोट चोरी का आरोप लगा रही है। असली सवाल यह है कि क्या प्रत्येक पात्र मतदाता को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने का अवसर मिलेगा? लोकतंत्र में वोट किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं, जनता का अधिकार है। इस अधिकार पर सवाल उठे तो उसका जवाब नारों से नहीं, निष्पक्ष जांच, पारदर्शी प्रक्रिया और ठोस प्रमाणों से दिया जाना चाहिए।
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