बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

कांग्रेस में ‘हरदा’ की चाल से ‘बवंडर’

बिना इजाजत यात्रा, पार्टी का झंडा, अलग राह चुन रहे हरीश रावत ईडी के झटके से संगठनात्मक इस्तीफा देने के बाद खेला अपना गेम प्रदेश संगठन से केंद्रीय आलाकमान तक असहज, उठ रहे तीखे सवाल देहरादून। उत्तराखंड कांग्रेस में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की धन्यवाद एवं जनसंवाद यात्रा ने पार्टी के भीतर संगठन और व्यक्तिगत राजनीतिक अभियान के फर्क को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ यात्रा को लेकर नहीं है, बल्कि यह भी है कि यदि यह हरीश रावत का व्यक्तिगत जनसंपर्क अभियान है तो इसमें कांग्रेस का झंडा, पोस्टर और पार्टी से जुड़ी पहचान क्यों दिखाई दे रही है? और यदि यह कांग्रेस का कार्यक्रम है तो प्रदेश संगठन और केंद्रीय नेतृत्व से इसकी अनुमति और समन्वय क्यों नहीं हुआ? हरीश रावत ने सितंबर में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई से जुड़े घटनाक्रम के बाद कांग्रेस के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य और कांग्रेस कार्यसमिति के स्थायी आमंत्रित सदस्य जैसे संगठनात्मक पदों से हटने की इच्छा जताई थी। हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने कांग्रेस नहीं छोड़ी है और केवल इन पदों से हटने की बात कही थी। अब अक्टूबर में उनकी यात्रा ने उसी सवाल को फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। प्रदेश कांग्रेस प्रभारी कुमारी शैलजा ने एक अक्टूबर को रावत को पत्र भेजकर यात्रा जैसे व्यक्तिगत कार्यक्रमों को आगे नहीं बढ़ाने का आग्रह किया था। पार्टी नेतृत्व की आपत्ति थी कि संगठन के समानांतर व्यक्तिगत कार्यक्रम चलने से एकजुटता का संदेश प्रभावित हो सकता है। इसके बावजूद रावत ने पांच अक्टूबर को जसपुर से हल्द्वानी तक यात्रा शुरू कर दी। यहीं से कांग्रेस के भीतर असली सवाल खड़ा होता हैकृयात्रा व्यक्तिगत है या पार्टी की? अगर रावत इसे व्यक्तिगत जनसंवाद यात्रा बताते हैं तो फिर कांग्रेस का झंडा और पोस्टर इस अभियान को पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रम जैसी पहचान देते नजर आते हैं। दूसरी ओर, यदि इसे कांग्रेस का कार्यक्रम माना जाए तो प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी को विश्वास में लिए बिना यात्रा निकालने का सवाल सामने आता है। यही वह बिंदु है जहां संगठनात्मक अनुशासन और वरिष्ठ नेता की राजनीतिक सक्रियता आमने-सामने दिखाई दे रही है। कांग्रेस नेतृत्व की चिंता केवल एक यात्रा तक सीमित नहीं बताई जा रही है। मौजूदा घटनाक्रम में केंद्रीय नेतृत्व ने संगठन के सामूहिक कार्यक्रमों और समन्वित अभियान पर जोर दिया है। रावत की यात्रा को लेकर उन्हें दिल्ली भी बुलाया गया है। दूसरी तरफ रावत लगातार जनता के बीच जाने और अपने अभियान को आगे बढ़ाने की बात कर रहे हैं। उनके समर्थक इसे जनता से सीधा संवाद और कांग्रेस की राजनीतिक जमीन मजबूत करने की पहल के तौर पर देखते हैं। मीडिया रिपोर्टों में यह भी सामने आया है कि रावत के समर्थकों का तर्क है कि उनकी यात्रा कांग्रेस के व्यापक हित में है, जबकि पार्टी के दूसरे हिस्सों में संगठन के समानांतर गतिविधि को लेकर असहमति है। इस पूरे घटनाक्रम ने उत्तराखंड कांग्रेस के सामने एक व्यावहारिक सवाल खड़ा कर दिया हैकृकि क्या पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के व्यक्तिगत जनसंपर्क कार्यक्रमों को संगठन के आधिकारिक अभियान से अलग रखा जा सकता है? राजनीति में प्रतीक भी संदेश देते हैं। कांग्रेस के झंडे और पोस्टर किसी भी कार्यक्रम को पार्टी की पहचान देते हैं। ऐसे में रावत की यात्रा में इनका इस्तेमाल होने से यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठ रहा है कि इसे व्यक्तिगत यात्रा माना जाए या कांग्रेस के राजनीतिक अभियान का हिस्सा। यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस केंद्रीय नेतृत्व सामूहिक अभियान और एकजुटता का संदेश देना चाहता है। पार्टी प्रभारी की आपत्ति के बावजूद यात्रा का जारी रहना और उसमें कांग्रेस की पहचान का इस्तेमाल संगठनात्मक स्तर पर असहज स्थिति पैदा करता है। हरीश रावत ने भले ही संगठनात्मक पदों से दूरी बनाने की बात कही हो, लेकिन उनका सार्वजनिक राजनीतिक अभियान कांग्रेस से अलग दिखाई नहीं देता। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक पहलू है। एक तरफ पार्टी संगठन अपने स्तर पर चुनावी रणनीति और सामूहिक कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, दूसरी तरफ रावत अपने तरीके से जनता के बीच पहुंच बना रहे हैं। दोनों के बीच टकराव का केंद्र यही है कि व्यक्ति की राजनीतिक सक्रियता की सीमा कहां खत्म होती है और संगठन का अधिकार क्षेत्र कहां से शुरू होता है। आने वाले दिनों में कांग्रेस नेतृत्व और रावत के बीच संवाद से इस स्थिति की दिशा साफ हो सकती है। फिलहाल यात्रा ने एक ऐसी राजनीतिक तस्वीर जरूर सामने ला दी है जिसमें नेता व्यक्तिगत अभियान की बात कर रहा है, लेकिन मंच पर पार्टी के झंडे और पोस्टर मौजूद हैं।

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