गुरुवार, 5 नवंबर 2026
सियासत में लौटते चेहरों की भीड़
बिलों के बाहर नेता
उत्तराखंड में 2027 की चुनावी आहट के साथ राजनीतिक गतिविधियां तेज
भाजपा-कांग्रेस ने बढ़ाई दौड़भाग, हाशिये पर चले गए नेता हो गए सक्रिय
प्रदेश में पांच साल की खामोशी के बाद अचानक बढ़ गया है जनसंपर्क
देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट अभी पूरी तरह चुनावी बिगुल में नहीं बदली है, लेकिन सियासी मैदान में हलचल ऐसी है जैसे चुनाव कल ही होने वाले हों। राजनीतिक दलों के प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के नेताओं के दौरे बढ़ने लगे हैं। कहीं पदयात्राएं निकल रही हैं, कहीं संगठनात्मक बैठकें हो रही हैं तो कहीं कार्यकर्ताओं को चुनावी तैयारी में जुटने के निर्देश दिए जा रहे हैं। भाजपा और कांग्रेस के बीच आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला भी तेज हो गया है। इस राजनीतिक सक्रियता के बीच सबसे दिलचस्प दृश्य उन दलों और नेताओं का है, जो पिछले पांच वर्षों तक लगभग राजनीतिक परिदृश्य से गायब रहे। अब चुनाव नजदीक आते ही वे भी अपने-अपने राजनीतिक बिलों से बाहर निकलने लगे हैं। किसी को जनता की याद सताने लगी है तो किसी को अचानक प्रदेश के विकास, बेरोजगारी, पलायन और क्षेत्रीय अस्मिता की चिंता होने लगी है।
उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी सक्रियता का यह दौर कई मायनों में दिलचस्प है। एक तरफ सत्तारूढ़ भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रही है तो दूसरी तरफ कांग्रेस सत्ता में लौटने के लिए जमीन तैयार कर रही है। दोनों प्रमुख दलों ने अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। भाजपा संगठन की मजबूती, केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं तथा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चेहरे को चुनावी हथियार बनाने की तैयारी में है। वहीं कांग्रेस सरकार के खिलाफ जनाक्रोश को चुनावी समर्थन में बदलने की कोशिश कर रही है। कांग्रेस की न्याय यात्रा और भाजपा की लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ पदयात्रा इसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा हैं।
कांग्रेस ने जहां प्रदेश के सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंच बनाने की रणनीति बनाई है, वहीं भाजपा भी संगठनात्मक स्तर पर अपनी चुनावी मशीनरी को सक्रिय कर रही है। दोनों दलों के राष्ट्रीय नेताओं की आवाजाही बढ़ने लगी है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी की प्रदेश के नेताओं के साथ बैठक के बाद पार्टी ने चुनावी तैयारियों को और तेज करने के संकेत दिए हैं। वहीं भाजपा भी अपने राष्ट्रीय संगठन के नेताओं के जरिए प्रदेश संगठन की चुनावी तैयारियों को धार दे रही है। साफ है कि अब उत्तराखंड की राजनीति केवल देहरादून के राजनीतिक गलियारों तक सीमित नहीं रहने वाली। आने वाले दिनों में पहाड़ से मैदान तक राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का सिलसिला और तेज होगा।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे रोचक पहलू उन नेताओं का है, जिन्हें पिछले पांच साल तक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय देखना मुश्किल था। चुनाव के बाद कुछ नेता ऐसे गायब हुए कि उनके विधानसभा क्षेत्रों में उनकी मौजूदगी तक चर्चा का विषय नहीं रही। न जनता के बीच नियमित संवाद, न स्थानीय समस्याओं पर कोई प्रभावी आवाज और न ही संगठनात्मक गतिविधियों में उल्लेखनीय भागीदारी। लेकिन अब चुनाव का समय करीब आते ही इन नेताओं की राजनीतिक सक्रियता अचानक बढ़ गई है। कोई गांवों का दौरा कर रहा है, कोई सामाजिक कार्यक्रमों में दिखाई देने लगा है तो कोई सोशल मीडिया के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है।
इन नेताओं की सक्रियता का अपना राजनीतिक गणित है। पांच साल तक राजनीतिक जमीन से दूर रहने के बाद उन्हें भी एहसास हो गया है कि यदि इस बार चुनावी दौड़ में शामिल नहीं हुए तो अगली पांच साल की राजनीतिक पारी हाथ से निकल सकती है। टिकट की दावेदारी करने वाले नेताओं की संख्या भी बढ़ने लगी है। जिन चेहरों को संगठन ने लंबे समय तक कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी, वह भी अब अपने समर्थकों के साथ शक्ति प्रदर्शन में जुटने लगे हैं। कुछ नेताओं को पार्टी से टिकट की उम्मीद है तो कुछ निर्दलीय अथवा नए राजनीतिक विकल्प के रूप में अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं।
इस बार का चुनाव उन नेताओं के लिए भी आसान नहीं होगा, जो केवल चुनावी मौसम में जनता के बीच पहुंचने की परंपरा को राजनीति मान बैठे हैं। उत्तराखंड का मतदाता अब पहले की तुलना में अधिक सवाल पूछ रहा है। बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे गांव-गांव में चर्चा का विषय हैं। पहाड़ के कई क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और युवाओं के सामने रोजगार का संकट आज भी बड़ा सवाल है। ऐसे में केवल बड़े नेताओं के साथ मंच साझा करने या कुछ सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई देने से राजनीतिक स्वीकार्यता हासिल करना आसान नहीं होगा।
आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति में कई नए समीकरण बनते और बिगड़ते दिखाई देंगे। दल बदल की संभावनाएं, टिकट के दावेदारों की बढ़ती संख्या, पुराने नेताओं की घर वापसी, नए चेहरों की दस्तक और बागियों की सक्रियता चुनावी परिदृश्य को और दिलचस्प बनाएगी। जिन नेताओं को अब तक राजनीतिक हाशिये पर रखा गया था, वे भी अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए जोर लगाएंगे। कुछ दल गठबंधन की संभावनाएं तलाशेंगे तो कुछ अकेले चुनाव लड़कर अपनी ताकत आजमाने की तैयारी करेंगे।
उत्तराखंड में चुनावी सरगर्मियां बढ़ने के साथ ही सियासी चेहरों का बाहर निकलना स्वाभाविक है, लेकिन इस बार मतदाता के सामने भी फैसला करने का अवसर है। उसे यह तय करना है कि कौन नेता वास्तव में उसके बीच रहा और कौन केवल चुनावी मौसम का मेहमान है। क्योंकि इस बार मुकाबला केवल राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि पांच साल के कामकाज और चुनाव से ठीक पहले शुरू हुई सक्रियता के बीच भी होगा। सियासत में लौटते चेहरों की भीड़ भले ही बढ़ रही हो, लेकिन असली परीक्षा चुनावी मंच पर नहीं, जनता की अदालत में होगी। पांच साल तक जनता से दूरी बनाने वाले नेताओं को इस बार केवल अपना चेहरा नहीं, अपना हिसाब भी लेकर जाना पड़ेगा।
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