बुधवार, 2 सितंबर 2026

खिसकती जमीन और सत्ता की छटपटाहट

गंगाजल व हवन के बहाने राजनीतिक हिसाब-किताब मुद्दों की सियासत पर भारी पड़ा शुद्धिकरण का दांव देवभूमि में नीयत व विचारधारा का सीधा मुकाबला भाजपा बोली-सत्ता की भूख, कांग्रेस का पलटवार देहरादून। हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे से जुड़े शुद्धिकरण प्रकरण ने उत्तराखंड की सियासत को गरमा दिया है। मंच पर गंगाजल छिड़कने और शुद्धिकरण हवन को लेकर भाजपा और कांग्रेस आमने-सामने हैं। मामला अब महज एक राजनीतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके बहाने दोनों दल एक-दूसरे की विचारधारा, राजनीति और नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा जहां इसे कांग्रेस की सत्ता की बेचौनी और तुष्टिकरण की राजनीति से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस इसे भाजपा की सांप्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति का उदाहरण बता रही है। भाजपा नेताओं का आरोप है कि कांग्रेस इस मुद्दे को लगातार राजनीतिक रंग देकर जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से हटाना चाहती है। भाजपा का कहना है कि कांग्रेस को जनता के बीच अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का अहसास हो चुका है, इसलिए वह ऐसे मुद्दों के सहारे राजनीतिक माहौल बनाने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेताओं ने इसे कांग्रेस की सत्ता की भूख से जोड़ते हुए कहा कि जनता अब इस तरह की राजनीति को स्वीकार करने वाली नहीं है। भाजपा का कहना है कि उत्तराखंड की जनता ने हमेशा धार्मिक आस्था का सम्मान किया है और किसी भी धार्मिक प्रतीक को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश उचित नहीं है। पार्टी नेताओं के मुताबिक कांग्रेस को यह समझना चाहिए कि धार्मिक भावनाओं से जुड़े विषयों पर राजनीति करने के बजाय उसे अपने शासन और नीतियों का हिसाब जनता के सामने रखना चाहिए। भाजपा के निशाने पर कांग्रेस के साथ-साथ राहुल गांधी और पार्टी नेतृत्व भी है। भाजपा का तर्क है कि कांग्रेस एक तरफ संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय की बात करती है, दूसरी तरफ धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवादों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाती है। कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए पलटवार किया है। पार्टी नेताओं का कहना है कि भाजपा खुद इस मामले को लगातार राजनीतिक मुद्दा बना रही है और अब कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है। कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा को महंगाई, बेरोजगारी, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और उत्तराखंड के विकास जैसे मुद्दों पर जवाब देना चाहिए, लेकिन वह धार्मिक भावनाओं से जुड़े विवादों के जरिए राजनीतिक ध्रुवीकरण का माहौल तैयार करना चाहती है। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल को धार्मिक भावनाओं के नाम पर दूसरे दल को कठघरे में खड़ा करने का अधिकार नहीं है। पार्टी का कहना है कि भाजपा को इस पूरे घटनाक्रम की जिम्मेदारी तय करने के बजाय इसे राजनीतिक प्रचार का हथियार बनाने से बचना चाहिए। शुद्धिकरण प्रकरण की राजनीतिक गूंज उत्तराखंड से बाहर भी सुनाई दे रही है। कांग्रेस और भाजपा के राष्ट्रीय नेताओं की बयानबाजी के बाद यह विवाद अब राज्य की राजनीति में एक बड़े प्रतीकात्मक मुद्दे का रूप लेता दिखाई दे रहा है। एक तरफ भाजपा इसे कांग्रेस की कथित सत्ता की हताशा बता रही है, दूसरी ओर कांग्रेस इसे भाजपा की धर्म आधारित राजनीति के रूप में पेश कर रही है। दोनों दलों के लिए यह विवाद आगामी राजनीतिक संघर्ष की जमीन तैयार करने का अवसर भी बन गया है। इस विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया हैकृक्या धर्म और आस्था से जुड़े प्रतीकों को राजनीतिक संघर्ष का हथियार बनाया जाना चाहिए? गंगाजल और शुद्धिकरण जैसे धार्मिक प्रतीकों को लेकर शुरू हुआ विवाद अब आरोप-प्रत्यारोप के ऐसे दौर में पहुंच गया है, जहां दोनों दल एक-दूसरे की नीयत पर सवाल उठा रहे हैं। भाजपा इसे कांग्रेस की सत्ता पाने की बेचौनी बता रही है तो कांग्रेस भाजपा पर धार्मिक धु्रवीकरण का आरोप लगा रही है। दरअसल, उत्तराखंड की राजनीति में धर्म और आस्था हमेशा संवेदनशील विषय रहे हैं। ऐसे में दोनों दलों के लिए चुनौती यह है कि राजनीतिक लाभ के लिए उठाए गए कदम कहीं सामाजिक विभाजन को और गहरा न कर दें। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज होने के साथ ही इस विवाद का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है। भाजपा सत्ता में वापसी की रणनीति बना रही है, जबकि कांग्रेस सत्ता विरोधी माहौल को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में ‘शुद्धिकरण’ विवाद दोनों दलों के लिए एक-दूसरे पर हमला बोलने का नया हथियार बन गया है। आने वाले दिनों में यह विवाद कितना लंबा खिंचता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। लेकिन इतना तय है कि हल्द्वानी का शुद्धिकरण अब केवल एक धार्मिक प्रतीक का विवाद नहीं रहाकृयह उत्तराखंड की सियासत में सत्ता, धर्म और विचारधारा की लड़ाई का नया मोर्चा बन चुका है।

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