सोमवार, 24 अगस्त 2026
उम्मीदों का ‘ह्यूमन चेन’ प्रोटेस्ट
सरकार की नजर नहीं पड़ी, तो दो जिलों के लोगों ने एक-दूसरे का हाथ थाम खींची उम्मीद की रेखा
अस्पताल, स्कूल और उम्मीद का रास्ता बंद हुआ, तो इंसानी कड़ियों से सज गई सड़क
बिना माइक और मंच के बनी मानव श्रृंखला, उधड़ती सड़कों पर व्यवस्था से तीखा सवाल
देहरादून। पहाड़ में सड़क सिर्फ सड़क नहीं होती। वह अस्पताल तक पहुंचने का रास्ता है, बच्चे के स्कूल जाने का रास्ता है, किसान की उपज बाजार तक पहुंचाने का रास्ता है और गांव को बाकी दुनिया से जोड़ने वाली उम्मीद भी है। इसलिए जब सड़क टूटती है तो सिर्फ डामर नहीं टूटता, लोगों का भरोसा भी दरकने लगता है। उत्तराखंड के बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिलों में सड़क की बदहाली के खिलाफ लोगों ने कुछ ऐसा ही संदेश दिया। सड़क की हालत सुधारने की मांग को लेकर दो जिलों के लोगों ने मानव श्रृंखला बनाई। लोग सड़क किनारे खड़े हुए और एक-दूसरे का हाथ थामकर ऐसी कड़ी बना दी, जिसे शायद किसी सरकारी मशीनरी से ज्यादा आसानी से देखा जा सकता था। यह कोई वीआईपी कार्यक्रम नहीं था। न लाल कालीन था, न मंच पर भाषणों की लंबी सूची। सड़क थी, उसके किनारे खड़े लोग थे और बीच में वह सवाल था जो पहाड़ वर्षों से पूछ रहा हैकृआखिर सड़क कब ठीक होगी?
बागेश्वर और पिथौरागढ़ प्रशासनिक नक्शे पर अलग-अलग जिले हैं, लेकिन सड़क की समस्या ने दोनों को एक ही मुद्दे पर खड़ा कर दिया। लोगों की शिकायत है कि बदहाल सड़क के कारण रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। आवागमन मुश्किल है और बारिश के मौसम में परेशानी और बढ़ जाती है। पहाड़ में सड़क खराब होने का मतलब केवल गाड़ी का झटका नहीं है। इसका मतलब है कि मरीज को अस्पताल पहुंचाने में ज्यादा समय, किसान को बाजार तक पहुंचाने में ज्यादा परेशानी और बच्चे को स्कूल तक जाने में ज्यादा जोखिम। मैदान में सड़क पर गड्ढा खबर बन सकता है। पहाड़ में वही गड्ढा किसी परिवार की पूरी दिनचर्या बदल देता है।
मानव श्रृंखला का दृश्य अपने आप में एक सवाल था। जिन लोगों को सड़क चाहिए थी, उन्होंने सड़क के किनारे खड़े होकर अपने हाथों को जोड़ दिया। सड़क जोड़ने का काम सरकार का है, लेकिन यहां जनता खुद जुड़ गई। शायद यह प्रतीकात्मक तस्वीर व्यवस्था के लिए सबसे बड़ा संदेश है। सड़क नहीं बनी तो लोग खुद श्रृंखला बन गए। रास्ता सरकार को बनाना था, लेकिन लोगों ने पहले अपनी एकता का रास्ता बना लिया। इसमें व्यंग्य भी है और दर्द भी। जिन लोगों को सरकार से सड़क चाहिए, वह सरकार के सामने अपनी मौजूदगी साबित करने के लिए इंसानों की सड़क बना रहे हैं। सड़क निर्माण और मरम्मत की योजनाएं कागजों पर बनती हैं। बजट आता है, टेंडर होते हैं, काम शुरू होता है और फिर जनता इंतजार करती है। लेकिन पहाड़ में लोग पूछ रहे हैं कि योजना की उम्र कितनी है और सड़क की उम्र कितनी?
हर बरसात के बाद सड़क की हालत खराब होती है तो सवाल फिर वही लौट आता है। मरम्मत क्यों नहीं हुई? स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ? जिम्मेदारी किसकी है? सरकारी विभागों के पास इन सवालों के तकनीकी जवाब हो सकते हैं। लेकिन सड़क पर खड़े लोगों के पास एक सरल जवाब हैकृहमें चलने लायक सड़क चाहिए। उत्तराखंड में विकास की तस्वीर अक्सर बड़ी परियोजनाओं से बनाई जाती है। सुरंगें, पुल, हाईवे, चारधाम परियोजनाएं और बड़े-बड़े निर्माण विकास के प्रतीक बनते हैं। लेकिन पहाड़ का आम आदमी विकास को बहुत छोटे पैमाने पर भी मापता है। उसके लिए विकास का मतलब हैकृबीमार को समय पर अस्पताल पहुंचा सकना, बच्चे का सुरक्षित स्कूल पहुंचना, गांव की उपज बाजार तक ले जा पाना और बारिश में सड़क का संपर्क न टूटना। अगर इन बुनियादी जरूरतों के लिए लोगों को दो जिलों में मानव श्रृंखला बनानी पड़े, तो यह सिर्फ सड़क विभाग की समस्या नहीं रह जाती। यह विकास की प्राथमिकताओं पर सवाल बन जाता है।
बागेश्वर और पिथौरागढ़ के लोगों की यह मानव श्रृंखला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें केवल सड़क की मांग नहीं है। इसमें पहाड़ के उस धैर्य की भी झलक है जो बार-बार टूटती सड़क, बंद रास्ते और सरकारी आश्वासनों के बावजूद अभी तक खड़ा है। लोगों ने हाथ पकड़ लिए हैं। अब देखना यह है कि सरकार सड़क पकड़ती है या फिर अगली बरसात तक यह सवाल भी किसी फाइल में रख दिया जाता है। क्योंकि पहाड़ के लोग कोई असंभव मांग नहीं कर रहे। वह सिर्फ इतना कह रहे हैं सड़क ऐसी हो, जिस पर जिंदगी चल सके।
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