मंगलवार, 25 अगस्त 2026
एसआईआर पर ‘राष्ट्रवाद- का तड़का
उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
प्रशासनिक प्रक्रिया से शुरू विवाद, उत्तराखंड में सियासी जंग में बदला
भाजपा ने किया राष्ट्रवाद वाला वार, कांग्रेस ने उठाए पारदर्शिता पर सवाल
चुनाव आयोग की प्रक्रिया के बीच बढ़ गई है सबूे में राजनीतिक बयानबाजी
देहरादून। उत्तराखंड में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। एक तरफ भाजपा कांग्रेस और विपक्ष पर एसआईआर को लेकर भ्रम फैलाने और राष्ट्रहित के खिलाफ राजनीति करने का आरोप लगा रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस प्रक्रिया की पारदर्शिता, मतदाताओं के नामों और दावों-आपत्तियों के निस्तारण को लेकर सवाल उठा रही है। यानी मामला मतदाता सूची का है, लेकिन राजनीति में पहुंचते-पहुंचते बात राष्ट्रवाद तक पहुंच गई है। उत्तराखंड में एसआईआर की प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर चल रही है। जिला प्रशासन की वेबसाइटों पर एसआईआर से संबंधित घोषणाएं, बीएलओ विवरण, बैठकें और अन्य सामग्री भी उपलब्ध कराई जा रही है। लेकिन चुनावी साल की आहट के बीच मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण अब महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है। राजनीतिक दल इसे आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से जोड़कर देख रहे हैं।
भाजपा का तर्क है कि मतदाता सूची में केवल पात्र भारतीय नागरिकों के नाम होना चाहिए। पार्टी विपक्ष पर आरोप लगा रही है कि वह एसआईआर को लेकर राजनीतिक भ्रम पैदा कर रहा है और ऐसी राजनीति कर रहा है, जिससे देशहित प्रभावित हो सकता है। भाजपा के लिए यह मुद्दा केवल मतदाता सूची की सफाई का नहीं, बल्कि अवैध या अपात्र लोगों के नाम हटाने से भी जुड़ा हुआ है। पार्टी का कहना है कि यदि मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसे ठीक करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करता है। भाजपा विपक्ष से सवाल कर रही है कि यदि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है तो उसका विरोध क्यों? यहीं से भाजपा का राजनीतिक हमला राष्ट्रवाद की तरफ मुड़ जाता है।
पार्टी विपक्ष पर आरोप लगाती है कि वह वोट बैंक की राजनीति के कारण ऐसे मुद्दे उठा रहा है जो मतदाता सूची की शुचिता से जुड़े हैं। भाजपा का संदेश साफ हैकृमतदाता सूची में केवल पात्र नागरिक रहें, यह किसी दल का नहीं बल्कि लोकतंत्र का सवाल है। कांग्रेस इस तर्क को पूरी तरह स्वीकार करने को तैयार नहीं है। पार्टी का कहना है कि मतदाता सूची को शुद्ध करने की जरूरत से उसे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिसमें किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से न हटे। कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता यही है कि पुनरीक्षण के दौरान यदि किसी मतदाता का नाम सूची से बाहर हो जाता है तो उसके पास दावा और आपत्ति दर्ज कराने का पर्याप्त अवसर होना चाहिए।
प्रदेश कांग्रेस ने एसआईआर से जुड़े दावों और आपत्तियों में मतदाताओं की मदद के लिए जिलावार नेताओं की जिम्मेदारी भी तय की है। कांग्रेस के अनुसार पार्टी अध्यक्ष गणेश गोदियाल के निर्देश पर अलग-अलग जिलों में सहायता और कानूनी मदद के लिए टीमें बनाई गई हैं। यह अपने आप में बताता है कि कांग्रेस अब एसआईआर को केवल राजनीतिक बयानबाजी का मुद्दा नहीं छोड़ना चाहती, बल्कि बूथ और मतदाता स्तर तक इस प्रक्रिया पर नजर रखने की तैयारी में है। इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण संस्था चुनाव आयोग है। क्योंकि मतदाता सूची का अंतिम फैसला राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, निर्धारित चुनावी प्रक्रिया से होना है।
उत्तराखंड में प्रशासन की ओर से राजनीतिक दलों के साथ बैठकें भी की गई हैं। पौड़ी जिला प्रशासन के रिकार्ड में एसआईआर के दौरान राजनीतिक दलों के साथ बैठक और बीएलओ, बीएलए तथा अन्य संबंधित लोगों के प्रशिक्षण का उल्लेख है। यानी राजनीतिक दलों की भागीदारी प्रक्रिया का हिस्सा है। यही वजह है कि विवाद का समाधान भी राजनीतिक बयान से ज्यादा पारदर्शी प्रक्रिया में है। एसआईआर को लेकर सबसे संवेदनशील सवाल यही है कि सूची से अपात्र नाम हटाने की कोशिश में कहीं पात्र मतदाता का नाम न छूट जाए। किसी अपात्र व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में रहना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए समस्या है। लेकिन किसी पात्र नागरिक का नाम सूची से हट जाना भी उतनी ही गंभीर समस्या है। इसलिए दोनों बातों को एक साथ देखना होगा।
सिर्फ यह कहना कि नाम कटेंगे तो गड़बड़ी दूर होगी पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि जिनके नाम सूची में नहीं रहेंगे, उन्हें सूचना कैसे मिलेगी, दावा कैसे दाखिल होगा, आपत्ति कैसे सुनी जाएगी और अंतिम निर्णय किस आधार पर होगा। यही पारदर्शिता ैप्त् की विश्वसनीयता तय करेगी। भाजपा के लिए चुनौती यह है कि एसआईआर को राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रविरोध की बहस में बदलने के बजाय मतदाता सूची की शुचिता के ठोस आंकड़े सामने रखे जाएं। कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि वह हर कार्रवाई को राजनीतिक साजिश बताने के बजाय जहां वास्तविक गड़बड़ी है, वहां दस्तावेज और तथ्य सामने रखे। क्योंकि मतदाता सूची किसी पार्टी की नहीं होती। उसमें दर्ज नाम किसी भाजपा कार्यकर्ता का हो या कांग्रेस समर्थक का, मतदाता का अधिकार समान है।
उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में एसआईआर का मुद्दा आने वाले महीनों में और राजनीतिक रंग ले सकता है। भाजपा इसे मतदाता सूची की शुचिता और पात्र नागरिकों के अधिकार का मुद्दा बनाएगी, जबकि कांग्रेस इसे निष्पक्षता, पारदर्शिता और पात्र मतदाताओं के नाम सुरक्षित रखने के सवाल से जोड़ेगी। इस लड़ाई में सबसे जरूरी बात यह है कि मतदाता राजनीति का शिकार न बने। एसआईआर का मतलब अगर मतदाता सूची को बेहतर बनाना है तो यह काम बिना डर, बिना दबाव और बिना राजनीतिक भेदभाव के होना चाहिए। भाजपा को अपने आरोपों के साथ तथ्य रखने होंगे। कांग्रेस को अपनी आपत्तियों के साथ प्रमाण देने होंगे और चुनावी मशीनरी को हर पात्र मतदाता की आवाज सुननी होगी। क्योंकि चुनाव में सरकारें बदल सकती हैं, विधायक बदल सकते हैं, राजनीतिक नारे बदल सकते हैं। लेकिन एक बार मतदाता सूची में किसी पात्र नागरिक का नाम छूट गया तो उसके लोकतांत्रिक अधिकार पर सीधा असर पड़ सकता है। इसलिए एसआईआर की असली लड़ाई भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं है। असली सवाल यह हैकृमतदाता सूची कितनी साफ होगी और उसमें दर्ज हर पात्र नागरिक का वोट कितना सुरक्षित रहेगा।
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