सोमवार, 31 अगस्त 2026

मोदी माडल में ‘सत्ता’ से ज्यादा ‘सेवा’ का दावा

भाजपा के लिए सत्ता शक्ति नहीं, सेवा का है माध्यम प्रदेश में जनसेवा के संदेश के साथ 2027 की तैयारी संगठन का दावाकृसमाज और राष्ट्र सेवा का है साधन देहरादून। भाजपा नेताओं की ओर से बार-बार दोहराया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के लिए सत्ता कभी शक्ति प्रदर्शन का माध्यम नहीं रही, बल्कि जनसेवा का अवसर है। यह दावा ऐसे समय में सामने आ रहा है जब उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज हो चुकी हैं और भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के लक्ष्य के साथ संगठन को सक्रिय कर रही है। भाजपा की राजनीति में सेवा को केंद्रीय विचार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। पार्टी नेताओं का कहना है कि सत्ता का अर्थ केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं और सुविधाओं का लाभ पहुंचाना है। यही वजह है कि भाजपा अपने राजनीतिक अभियान में विकास के साथ गरीब कल्याण, जनकल्याण और राष्ट्र निर्माण को प्रमुखता दे रही है। भाजपा नेताओं के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने राजनीति में सत्ता की परिभाषा को बदलने का प्रयास किया है। उनके लिए सरकार का मतलब केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि लोगों की समस्याओं का समाधान और जरूरतमंद तक सरकारी सहायता पहुंचाना है। भाजपा इस सोच को जनधन, आवास, शौचालय, उज्ज्वला, आयुष्मान भारत, जल जीवन मिशन और डिजिटल सेवाओं जैसी योजनाओं से जोड़कर पेश करती है। पार्टी का तर्क है कि शासन की सफलता का पैमाना यह होना चाहिए कि उसका लाभ समाज के उस व्यक्ति तक पहुंचे जो लंबे समय तक व्यवस्था से दूर रहा। हालांकि उत्तराखंड में भाजपा के सामने इस दावे को जमीन पर साबित करने की बड़ी चुनौती है। पहाड़ी जिलों में आज भी पलायन, रोजगार, स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा, सड़क, आपदा और स्थानीय अर्थव्यवस्था जैसे सवाल राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों का प्रचार अपनी जगह है, लेकिन पहाड़ का मतदाता यह भी जानना चाहता है कि उसके गांव में रोजगार कब पहुंचेगा, अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक कब उपलब्ध होंगे, सड़कें कब सुरक्षित होंगी और आपदा के समय सरकारी तंत्र कितनी तेजी से उसके साथ खड़ा होगा। यानी भाजपा के लिए सेवा का दावा अब केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि 2027 में जनता की कसौटी भी बनने वाला है। भाजपा संगठन लगातार बूथ स्तर तक अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है। पार्टी की रणनीति में कार्यकर्ताओं को सरकार की योजनाओं और उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के साथ-साथ स्थानीय समस्याओं को संगठन के माध्यम से सरकार तक पहुंचाने पर भी जोर दिया जा रहा है। भाजपा नेताओं का मानना है कि पार्टी की असली ताकत उसका कैडर और कार्यकर्ता है। इसलिए सत्ता में रहते हुए भी संगठन को जनता से निरंतर संपर्क बनाए रखने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। भाजपा के सेवा वाले नैरेटिव ने विपक्ष के सामने भी चुनौती खड़ी की है। कांग्रेस लगातार सरकार की नीतियों और उपलब्धियों पर सवाल उठाती रही है। ऐसे में आगामी चुनाव में मुकाबला केवल भाजपा की उपलब्धियों बनाम विपक्ष के आरोपों का नहीं होगा, बल्कि दोनों पक्षों को यह साबित करना होगा कि वह उत्तराखंड की जनता के जीवन में वास्तविक बदलाव कैसे ला सकते हैं। भाजपा जहां मोदी सरकार की उपलब्धियों और धामी सरकार के कामकाज को जनसेवा के माडल के रूप में पेश करेगी, वहीं विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, भर्ती और आपदा जैसे मुद्दों के जरिए सरकार को घेरने की कोशिश करेगा। राजनीति में सत्ता को सेवा का माध्यम बताना भारतीय लोकतंत्र में नया विचार नहीं है। लगभग हर राजनीतिक दल जनता की सेवा को अपना लक्ष्य बताता है। असली सवाल यह है कि सत्ता में आने के बाद उस विचार का कितना हिस्सा जमीन पर दिखाई देता है। उत्तराखंड में 2027 का चुनाव इसी दावे की परीक्षा बन सकता है। भाजपा यदि लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का लक्ष्य लेकर चल रही है तो उसे जनता के सामने यह भी साबित करना होगा कि उसके लिए सत्ता वास्तव में सेवा का माध्यम है। क्योंकि चुनावी भाषण में सत्ता सेवा हो सकती है, लेकिन लोकतंत्र में उसकी अंतिम परीक्षा जनता के अनुभव से होती है।

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