सोमवार, 31 अगस्त 2026
उत्तराखंड की राजनीति का ‘गोल्डन रूल’
उत्तराखंड की सियासत में नहीं चलता जाति-धर्म का गणित
पहाड़ की जनता ने विकास, ईमानदारी,जनहित को तरजीह दी
पहचान की राजनीति से ज्यादा मुद्दों की राजनीति रही है हावी
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत उसकी सामाजिक बुनावट रही है। पहाड़ से मैदान तक समाज अनेक जातियों, समुदायों और वर्गों में बंटा होने के बावजूद चुनावी राजनीति में उत्तराखंड की जनता ने लंबे समय तक जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर स्थायी खांचे स्वीकार नहीं किए। यहां मतदाता की अपनी राजनीतिक समझ रही है और वह समय-समय पर सरकारों और नेताओं को उनके कामकाज के आधार पर परखता रहा है।
उत्तराखंड का गठन ही लंबे जनआंदोलन की उस भावना से हुआ था, जिसमें क्षेत्रीय अस्मिता, रोजगार, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य और पहाड़ के विकास को केंद्रीय मुद्दा बनाया गया। आंदोलन के दौर में जाति और धर्म से ऊपर उठकर लोग एक साझा मांग के साथ सड़कों पर उतरे। यही सामाजिक चेतना आज भी प्रदेश की राजनीति की बुनियाद में दिखाई देती है।
उत्तराखंड की राजनीति को केवल पहाड़ और मैदान के बीच विभाजन के नजरिए से भी पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे मैदानी जिलों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताएं हैं तो सीमांत और पर्वतीय जिलों के अपने सवाल। इसके बावजूद चुनावों में मतदाता कई बार स्थानीय मुद्दों और उम्मीदवार की छवि को पार्टी के पारंपरिक समीकरणों पर भारी कर देता है। यही कारण है कि उत्तराखंड में किसी एक जाति या समुदाय को स्थायी वोट बैंक मान लेना राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं रहा है।
उत्तराखंड धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण प्रदेश है। चारधाम, प्रमुख शक्तिपीठ और अनेक स्थानीय देव परंपराएं यहां की सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। लेकिन धार्मिक आस्था और चुनावी राजनीति को एक ही तराजू में रखना हमेशा सही नहीं रहा। प्रदेश का मतदाता धार्मिक हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह अपने रोजमर्रा के सवालों को भूल जाता है। सड़क टूटने पर सड़क चाहिए, अस्पताल में डाक्टर चाहिए, स्कूल में शिक्षक चाहिए और युवाओं को रोजगार चाहिए। पहाड़ में पलायन रोकना है तो स्थानीय स्तर पर आर्थिक अवसर चाहिए। आस्था अपनी जगह है और शासन का सवाल अपनी जगह।
उत्तराखंड में जातीय पहचानें मौजूद हैं और राजनीतिक दल चुनावों में सामाजिक समीकरणों का आकलन भी करते हैं। मगर यहां जाति को चुनाव जीतने की गारंटी मान लेना जोखिम भरा रहा है। एक ही जाति या समुदाय के मतदाता अलग-अलग राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। इसका कारण उत्तराखंड की सामाजिक संरचना और राजनीतिक चेतना दोनों में देखा जा सकता है। छोटे राज्य में स्थानीय रिश्ते, उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, क्षेत्रीय जुड़ाव और उसके कामकाज का असर कई बार व्यापक जातीय समीकरणों पर भारी पड़ता है।
आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह जनता को किस मुद्दे पर अपने साथ जोड़ते हैं। क्या चुनाव बेरोजगारी, पलायन, महंगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और आपदा प्रबंधन पर होगा या फिर जाति, धर्म और पहचान के भावनात्मक मुद्दे चुनावी विमर्श पर हावी होंगे? उत्तराखंड का मतदाता राजनीतिक दलों को यह संदेश देता रहा है कि उसे केवल भावनाओं से नहीं, परिणामों से मतलब है। सत्ता में बैठी सरकार से वह सवाल करता है और विपक्ष से भी विकल्प की स्पष्टता मांगता है।
उत्तराखंड की सामाजिक एकता को सबसे बड़ी चुनौती तब मिलती है जब राजनीतिक लाभ के लिए समाज को छोटे-छोटे खांचों में बांटने का प्रयास होता है। जाति, धर्म या वर्ग के आधार पर राजनीतिक धु्रवीकरण अल्पकाल में चुनावी लाभ दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करता है। उत्तराखंड की जनता ने राज्य आंदोलन से लेकर आज तक कई राजनीतिक बदलाव देखे हैं। सरकारें बदलीं, चेहरे बदले और चुनावी मुद्दे बदले, लेकिन जनता की मूल आकांक्षाएं बहुत हद तक वही हैंकृसम्मान के साथ रोजगार, बेहतर शिक्षा-स्वास्थ्य, सुरक्षित सड़कें, मजबूत गांव और पलायन से मुक्ति।
इसलिए 2027 की चुनावी लड़ाई में भी राजनीतिक दलों के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि किस जाति या समुदाय को कैसे साधा जाए। बड़ा सवाल यह होगा कि क्या उत्तराखंड की जनता को विकास और जनहित का भरोसेमंद एजेंडा दिया जा सकता है? उत्तराखंड की असली पहचान किसी जाति, धर्म या वर्ग की राजनीति नहीं, बल्कि साझा पहाड़ी चेतना है। यहां मतदाता को बांटने की कोशिश भले हो सकती है, लेकिन उसे स्थायी खांचे में कैद करना आसान नहीं। सियासत चाहे जितने समीकरण बनाए, आखिर में फैसला उत्तराखंड की जनता अपने मुद्दों और अपनी समझ से ही करेगी।
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