शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

उत्तराखंड में वोटर लिस्ट का ‘धर्मयुद्ध’

एसआईआर प्रक्रिया पर सियासत गर्म, संस्थाओं की शुचिता बनाम राजनीतिक नफा-नुकसान प्रक्रिया पर सवाल उठाना हक, लेकिन क्या कागजों और तथ्यों के साथ मैदान में है विपक्ष हर पात्र को मिले मताधिकार, पर राजनीतिक बयानबाजी से न बिगड़े संस्थागत व्यवस्था कटघरे में खड़ा करने के बजाय संस्थागत प्रक्रिया और नियम-प्रमाण से निपटे विवाद देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासत लगातार गरमा रही है। कांग्रेस जहां प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और पारदर्शिता की कमी का सवाल उठाते हुए निर्वाचन आयोग के सामने अपनी आपत्तियां दर्ज करा रही है, वहीं भाजपा कांग्रेस पर एसआईआर की संवैधानिक प्रक्रिया में बाधा डालने का आरोप लगा रही है। मुद्दा अब केवल मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक सीमित नहीं रह गया है। यह सवाल भी उठने लगा है कि चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक दल संवैधानिक संस्थाओं की प्रक्रिया को किस नजरिये से देखते हैं। लोकतंत्र में मतदाता सूची की शुचिता जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी यह भी है कि उस प्रक्रिया को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखने के बजाय नियम और प्रमाण के आधार पर परखा जाए। कांग्रेस को यदि एसआईआर में किसी स्तर पर गड़बड़ी दिखाई दे रही है तो उसे तथ्यों और दस्तावेजों के साथ निर्वाचन आयोग के सामने रखना चाहिए। किसी मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया है तो उसका विवरण सामने आना चाहिए। किसी पात्र व्यक्ति को सूची से बाहर किया गया है तो उसकी शिकायत का समाधान कराने के लिए संस्थागत रास्ता अपनाया जाना चाहिए। यही जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी सच है कि केवल आशंकाओं के आधार पर पूरी प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर देना लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा कर सकता है। उत्तराखंड में एसआईआर की प्रक्रिया प्रशासनिक स्तर पर चल रही है और जिला प्रशासन की वेबसाइटों पर भी इससे संबंधित सूचनाएं, बैठकें और प्रशिक्षण संबंधी विवरण सार्वजनिक किए जा रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस को यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी लड़ाई फर्जी मतदाताओं के खिलाफ है या वैध मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए। दोनों के बीच फर्क करना बेहद जरूरी है। अगर किसी व्यक्ति का नाम दो जगह है, व्यक्ति का निधन हो चुका है, वह स्थायी रूप से कहीं और चला गया है या मतदाता सूची में उसका नाम नियमों के विपरीत दर्ज है, तो उसका सत्यापन होना चाहिए। लेकिन इसी प्रक्रिया में किसी वास्तविक मतदाता का नाम केवल राजनीतिक पहचान, धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर प्रभावित होता है तो उसका विरोध भी उतनी ही मजबूती से होना चाहिए। यही लोकतंत्र का संतुलन है। कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह एसआईआर के मुद्दे को तुष्टिकरण बनाम ध्रुवीकरण की राजनीति में फंसने से बचाए। चुनावी राजनीति में हर दल अपने वोट बैंक की चिंता करता है, लेकिन मतदाता सूची किसी दल का वोट बैंक नहीं होती। वह लोकतंत्र की बुनियादी सूची है। कांग्रेस यदि वास्तव में मतदाता अधिकारों को लेकर गंभीर है तो उसे बूथ स्तर तक अपने प्रतिनिधियों को सक्रिय करना चाहिए। एक-एक आपत्ति की जांच करानी चाहिए और जहां गलती मिले, वहां निर्वाचन आयोग से सुधार की मांग करनी चाहिए। इससे उसका पक्ष भी मजबूत होगा और जनता के बीच यह संदेश भी जाएगा कि पार्टी चुनावी लाभ से ज्यादा चुनावी प्रक्रिया की शुचिता को महत्व देती है। भाजपा के लिए भी यह सवाल कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि वह एसआईआर को लेकर कांग्रेस पर राजनीति करने का आरोप लगा रही है तो उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो। किसी भी पात्र मतदाता का नाम न कटे और किसी भी अपात्र नाम को राजनीतिक संरक्षण न मिले। केवल कांग्रेस के विरोध को राजनीतिक मुद्दा बनाने से ज्यादा जरूरी है कि भाजपा भी निर्वाचन प्रक्रिया की निष्पक्षता के पक्ष में खड़ी दिखाई दे। दरअसल, चुनाव लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव तभी बन सकता है जब मतदाता सूची पर जनता का भरोसा कायम रहे। एसआईआर किसी राजनीतिक दल की जीत या हार का औजार नहीं हो सकता। यह निर्वाचन व्यवस्था की एक प्रक्रिया है। इसलिए कांग्रेस को विरोध करना है तो करे, सवाल पूछने हैं तो पूछे, शिकायत करनी है तो करेकृलेकिन हर सवाल तथ्य और प्रमाण के साथ होना चाहिए। इसी तरह सत्ता पक्ष को भी विपक्ष की हर आपत्ति को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज करने के बजाय गंभीरता से जांच की मांग करनी चाहिए। उत्तराखंड चुनावी मोड में प्रवेश कर चुका है। ऐसे समय में राजनीतिक दलों के सामने असली परीक्षा भाषणों की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उनके व्यवहार की है। कांग्रेस के लिए यह मौका है कि वह तुष्टिकरण की राजनीति के आरोपों से बाहर निकलकर एक जिम्मेदार और तथ्याधारित विपक्ष की भूमिका निभाए। उसे यह साबित करना होगा कि उसकी चिंता किसी खास समुदाय के वोटों को बचाने की नहीं, बल्कि हर पात्र नागरिक के मताधिकार को सुरक्षित रखने की है। क्योंकि लोकतंत्र में एक गलत नाम भी समस्या है और एक सही नाम का गलत तरीके से कटना भी उतनी ही बड़ी समस्या। इसलिए एसआईआर पर सियासत की जगह संविधान, कानून और तथ्य को केंद्र में रखने की जरूरत है। चुनाव आएंगे और जाएंगे, सरकारें बदलेंगी, विपक्ष सत्ता में आएगाकृलेकिन मतदाता सूची की विश्वसनीयता कमजोर हुई तो नुकसान किसी एक पार्टी का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होगा।

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