रविवार, 23 अगस्त 2026
महंगाई का ‘मिठास’ पर डाका
चीनी के दामों ने बिगाड़ा रसोई का बजट, विपक्ष हमलावर
कांग्रेस समेत विपक्षी दलों ने बढ़ती कीमतों पर जताया आक्रोश
विपक्ष ने रसोई के बजट पर असर को बनाया राजनीतिक हथियार
देहरादून। रसोई के बजट पर बढ़ते दबाव ने उत्तराखंड की सियासत को भी गरमा दिया है। चीनी समेत रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ी कई वस्तुओं के दाम बढ़ने को लेकर कांग्रेस सहित विपक्षी दलों ने सरकार पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्ष का आरोप है कि महंगाई लगातार आम परिवारों की जेब पर बोझ बढ़ा रही है, जबकि सरकार राहत देने के बजाय आंकड़ों और दावों के सहारे अपनी पीठ थपथपा रही है। चीनी जैसी रोजमर्रा की जरूरत की वस्तु के दाम बढ़ना भले ही देखने में छोटा मुद्दा लगे, लेकिन इसका सीधा असर घर के मासिक बजट पर पड़ता है। चाय से लेकर मिठाई और घरेलू खाद्य पदार्थों तक में चीनी का इस्तेमाल होता है। ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी का असर केवल बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवारों के खर्च का संतुलन भी बिगाड़ता है।
कांग्रेस ने बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार को घेरते हुए कहा कि आम आदमी पहले ही महंगाई, रोजगार और आय से जुड़े दबावों से जूझ रहा है। ऐसे में खाद्य और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी उसकी मुश्किलें और बढ़ा रही है। विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार को केवल महंगाई दर के आंकड़े बताने के बजाय बाजार में आम उपभोक्ता की स्थिति देखनी चाहिए। उनका तर्क है कि कागज पर महंगाई नियंत्रित होने का दावा अपनी जगह है, लेकिन बाजार में परिवार का मासिक खर्च बढ़ रहा है तो इसका असर राजनीतिक रूप से भी दिखाई देगा।
महंगाई भारतीय राजनीति में हमेशा से बड़ा चुनावी मुद्दा रही है। खासकर विधानसभा चुनावों के दौरान रसोई का बजट सीधे राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाता है। उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए विपक्ष को सरकार को घेरने के लिए यह मुद्दा उपयोगी हथियार मिल सकता है। महंगाई का सवाल केवल चीनी तक सीमित नहीं है। खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, दूध और अन्य दैनिक जरूरतों की कीमतों में उतार-चढ़ाव आम उपभोक्ता की चिंता बढ़ाता है। विपक्ष इसी व्यापक तस्वीर को सामने रखकर सरकार की आर्थिक नीतियों पर सवाल उठा रहा है।
सत्तारूढ़ भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह बढ़ती कीमतों को लेकर जनता की नाराजगी को किस तरह शांत करती है। सरकार के पास कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों और बाजार व्यवस्था से जुड़े अपने तर्क हो सकते हैं, लेकिन राजनीतिक चुनौती केवल आंकड़ों से हल नहीं होगी। क्योंकि चुनावी राजनीति में जनता यह नहीं देखती कि महंगाई का कारण वैश्विक बाजार है या घरेलू आपूर्ति व्यवस्था। वह सबसे पहले अपनी जेब देखती है। महीने के अंत में घर का बजट बिगड़ रहा है तो सरकार से सवाल होना स्वाभाविक है।
हालांकि महंगाई के मुद्दे ने कांग्रेस समेत विपक्षी दलों को सरकार पर हमला करने का अवसर जरूर दिया है, लेकिन इसे चुनावी मुद्दे में बदलना विपक्ष के लिए भी चुनौतीपूर्ण होगा। केवल बढ़ी कीमतों की सूची गिनाने से जनता का भरोसा हासिल नहीं किया जा सकता। विपक्ष को यह भी बताना होगा कि सत्ता में आने पर वह महंगाई को नियंत्रित करने के लिए क्या ठोस कदम उठाएगा। उत्तराखंड की सियासत में अब महंगाई का सवाल धीरे-धीरे जमीन पकड़ सकता है। चीनी के बढ़ते दाम से शुरू हुई बहस यदि दाल, तेल, सब्जी, दूध और अन्य जरूरी वस्तुओं तक पहुंचती है तो यह सरकार के लिए असहज राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।
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