रविवार, 23 अगस्त 2026
चीनी की कीमतों पर एथेनाल का ‘तड़का’
उत्तराखंड में आमने-सामने आ गए कांग्रेस-भाजपा
कांग्रेस ने एथेनाल नीति को बताया महंगाई की वजह
भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को करार दिया प्रोपेगेंडा
देहरादून। चीनी के बढ़ते दाम को लेकर उत्तराखंड की सियासत में एक बार फिर एथेनाल का मुद्दा गर्म हो गया है। कांग्रेस ने चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी को केंद्र की एथेनाल नीति से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा है। वहीं भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों को खारिज करते हुए इसे राजनीतिक प्रोपेगेंडा करार दिया है। दोनों दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप ने चीनी की कीमतों के सवाल को सीधे केंद्र की कृषि और ऊर्जा नीति से जोड़ दिया है। कांग्रेस का तर्क है कि गन्ने से चीनी उत्पादन के बजाय एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की नीति का असर चीनी की उपलब्धता और बाजार कीमतों पर पड़ सकता है। पार्टी का कहना है कि जब गन्ने और उसके उत्पादों का एक हिस्सा एथेनॉल के लिए इस्तेमाल होता है तो चीनी उत्पादन की मात्रा प्रभावित होने की आशंका रहती है। ऐसे में यदि बाजार में आपूर्ति का संतुलन बिगड़ता है तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
भाजपा ने कांग्रेस के इस तर्क को राजनीतिक रंग देने की कोशिश बताया है। पार्टी का कहना है कि चीनी की कीमतों में उतार-चढ़ाव को केवल एथेनाल नीति से जोड़ देना आर्थिक तथ्यों को नजरअंदाज करना है। भाजपा के अनुसार चीनी बाजार पर उत्पादन, मांग, स्टाक, निर्यात-आयात और वैश्विक बाजार समेत कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। दरअसल एथेनाल नीति पिछले कुछ वर्षों से केंद्र की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। पेट्रोल में एथेनाल मिश्रण बढ़ाने की नीति का उद्देश्य आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करना, किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराना और कृषि उत्पादों से वैकल्पिक ईंधन तैयार करना है। यही नीति अब चीनी की कीमतों को लेकर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। कांग्रेस इसे सरकार की प्राथमिकताओं से जोड़कर सवाल उठा रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि एथेनॉल को चीनी की महंगाई का सीधा कारण बताना तथ्यात्मक रूप से अधूरा निष्कर्ष है।
महंगाई का मुद्दा जनता से सीधे जुड़ा होने के कारण दोनों दल इसे अपने-अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रहे हैं। कांग्रेस के लिए चीनी की बढ़ती कीमत सरकार की आर्थिक नीतियों पर हमला करने का अवसर है। वहीं भाजपा इसे विपक्ष की ओर से सरकार को बदनाम करने की कोशिश के तौर पर पेश कर रही है। राजनीतिक रूप से यह बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महंगाई का असर सीधे परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ता है। चीनी भले ही रोजमर्रा की खरीदारी में बड़ी वस्तु न हो, लेकिन इसके दाम बढ़ने का असर चाय, मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पादों की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।
एथेनाल और चीनी की कीमतों के बीच संबंध को लेकर राजनीतिक दावों से अलग वास्तविक तस्वीर उत्पादन और बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करती है। गन्ने का कितना हिस्सा चीनी के लिए और कितना एथेनाल के लिए जाता है, चीनी का उत्पादन कितना हुआ, घरेलू मांग कितनी है और बाजार में उपलब्ध स्टाक कितना हैकृइन सभी पहलुओं को देखे बिना केवल एक कारण तय करना आसान नहीं है। यही वह जगह है जहां राजनीतिक बहस और आर्थिक विश्लेषण अलग-अलग रास्ते पकड़ लेते हैं। कांग्रेस इसे सरकार की नीति का परिणाम बता रही है, जबकि भाजपा इसे विपक्ष का प्रोपेगेंडा बता रही है। लेकिन आम उपभोक्ता के लिए बहस का केंद्र इससे कहीं सरल हैकृबाजार में चीनी कितने की मिल रही है और आगे इसकी कीमत कहां जाएगी?
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले महंगाई जैसे मुद्दे राजनीतिक दलों के लिए अहम होते जा रहे हैं। कांग्रेस यदि चीनी की कीमतों को एथेनाल नीति से जोड़कर व्यापक महंगाई के मुद्दे में बदलती है तो भाजपा को सरकार की नीतियों का बचाव करना होगा। वहीं भाजपा के लिए चुनौती केवल कांग्रेस के आरोपों को प्रोपेगेंडा बताने की नहीं, बल्कि उपभोक्ता को यह भरोसा दिलाने की भी होगी कि सरकार महंगाई पर नजर रख रही है। फिलहाल चीनी की मिठास पर सियासत कड़वी होती जा रही है। कांग्रेस के लिए एथेनाल सरकार की नीति पर सवाल उठाने का हथियार है तो भाजपा के लिए वही मुद्दा विपक्ष के प्रोपेगेंडा का उदाहरण। असली फैसला राजनीतिक मंचों पर नहीं, बाजार की कीमतों और उपभोक्ता की जेब करेगी।
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