शनिवार, 29 अगस्त 2026
हरक की ‘विरासत’ पर भाजपा की ‘सियासत’
उत्तराखंड की बदलती राजनीति के बीच अनुकृति के बयान के सियासी मायने
भाजपा की प्रवक्ता बनीं अनुकृति ने हरक सिंह रावत के योगदान को याद किया
सवाल यह कि पुराने रिश्तों की विरासत से नई राजनीतिक पारी कितनी मजबूत होगी
ससुर का सम्मान या पार्टी के भीतर खुद की जगह बनाने की कवायद
देहरादून। राजनीति में रिश्ते कभी सिर्फ रिश्ते नहीं होते। खासकर तब, जब रिश्ता उत्तराखंड की उस राजनीति से जुड़ा हो जिसने पिछले दो दशक में कई बार सत्ता का रुख बदला हो। भाजपा प्रवक्ता अनुकृति गुसाईं रावत ने जब अपने ससुर और पूर्व मंत्री डा. हरक सिंह रावत का नाम लेकर कहा कि उत्तराखंड में भाजपा को मजबूती देने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है, तो यह महज पारिवारिक सम्मान का बयान नहीं माना जा रहा। इस बयान में उत्तराखंड की बदलती सियासत की एक तस्वीर भी दिखाई देती है।
हरक सिंह रावत का राजनीतिक सफर उत्तराखंड की राजनीति के उन अध्यायों में शामिल है, जहां दल बदलना, सत्ता समीकरण और व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते। भाजपा से कांग्रेस और कांग्रेस से भाजपा तक की उनकी यात्राओं ने प्रदेश की राजनीति में कई बार हलचल पैदा की। अब उसी राजनीतिक विरासत का एक हिस्सा भाजपा के भीतर अनुकृति गुसाईं रावत के रूप में दिखाई दे रहा है।
अनुकृति का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर संगठनात्मक स्तर पर लगातार अपनी जमीन मजबूत करने में जुटी है। ऐसे समय में पार्टी की नई प्रवक्ता का अपने ससुर के भाजपा में योगदान को सार्वजनिक रूप से रेखांकित करना क्या केवल अतीत को याद करना है या भविष्य की राजनीति का संकेत भी?
उत्तराखंड की राजनीति में हरक सिंह रावत का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं। अलग-अलग राजनीतिक दलों में उनकी सक्रियता और सरकारों में उनकी भूमिका ने उन्हें प्रदेश की राजनीति का प्रभावशाली चेहरा बनाया। यही कारण है कि जब परिवार की अगली पीढ़ी भाजपा में सक्रिय भूमिका निभाती है और पुराने राजनीतिक योगदान को याद करती है, तो उसके राजनीतिक अर्थ भी निकाले जाते हैं। अनुकृति का बयान इसी संदर्भ में देखा जा रहा है।
हालांकि राजनीति में किसी नेता की विरासत केवल परिवार के नाम से आगे नहीं बढ़ती। उसे संगठन स्वीकार करता है, कार्यकर्ता स्वीकार करते हैं और सबसे बड़ी बातकृमतदाता स्वीकार करते हैं। भाजपा में प्रवक्ता की भूमिका मिलने के बाद अनुकृति के सामने भी यही चुनौती है कि वह पारिवारिक पहचान से आगे निकलकर अपनी अलग राजनीतिक पहचान कितनी तेजी से बनाती हैं। भाजपा की राजनीति में संगठन सबसे ऊपर होने का दावा लगातार किया जाता रहा है। ऐसे में किसी पुराने और प्रभावशाली नेता की राजनीतिक विरासत से जुड़े चेहरे को संगठन में जिम्मेदारी मिलना अपने आप में दिलचस्प है।
क्या भाजपा उत्तराखंड में पुराने राजनीतिक प्रभाव वाले परिवारों को भी अपनी रणनीति में जगह दे रही है? क्या पार्टी 2027 के लिए हर वर्ग और हर राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है? या फिर यह सिर्फ संगठन में एक सामान्य जिम्मेदारी है, जिसे परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जा रहा है? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में भाजपा की गतिविधियों से मिलेंगे।
उत्तराखंड की राजनीति में परिवारवाद पर खूब बहस होती रही है। कांग्रेस हो या भाजपा, दोनों दलों में ऐसे नेताओं की कमी नहीं रही जिनके राजनीतिक परिवारों ने अगली पीढ़ी को राजनीति का रास्ता दिखाया। लेकिन पहाड़ की राजनीति में मतदाता केवल नाम देखकर हमेशा फैसला नहीं करता। यहां सड़क चाहिए, रोजगार चाहिए, स्वास्थ्य सुविधा चाहिए, पलायन का जवाब चाहिए। गांव खाली हो रहे हैं तो सवाल परिवार की राजनीतिक विरासत से आगे जाकर पूछा जाता है। अनुकृति गुसाईं के सामने भी यही कसौटी होगी। ससुर का राजनीतिक योगदान अपनी जगह है। लेकिन नई पीढ़ी की राजनीति को पुराने खाते की जमा पूंजी पर हमेशा नहीं चलाया जा सकता। उसे अपना खाता खोलना पड़ता है।
विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां जैसे-जैसे तेज होंगी, उत्तराखंड भाजपा में कई नए चेहरे दिखाई देंगे। कुछ संगठन से आएंगे, कुछ आंदोलन की राजनीति से, कुछ सामाजिक क्षेत्र से और कुछ राजनीतिक परिवारों की विरासत लेकर। अनुकृति गुसाईं का राजनीतिक सफर भी इसी बड़ी तस्वीर का हिस्सा है। उनका बयान एक तरह से अतीत को स्वीकार करता हैकृकि परिवार का राजनीतिक इतिहास भाजपा से जुड़ा रहा है और हरक सिंह रावत का पार्टी को मजबूत करने में योगदान रहा है। लेकिन भविष्य का सवाल अलग है।
क्या अनुकृति अपने ससुर की राजनीतिक पहचान की उत्तराधिकारी बनेंगी या अपनी अलग राजनीतिक पहचान गढ़ेंगी? उत्तराखंड की राजनीति में यह सवाल छोटा नहीं है। क्योंकि पहाड़ में राजनीतिक विरासत दरवाजा खोल सकती है, लेकिन अंदर जगह बनाना अभी भी अपने काम से ही पड़ता है और 2027 का चुनाव यही तय करेगा कि राजनीतिक परिवार की पहचान कितनी दूर तक जाती है और नई राजनीति की अपनी पहचान कहां से शुरू होती है।
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