शनिवार, 29 अगस्त 2026

उत्तराखंड में कांग्रेस का ‘मिशन कमबैक’

दिग्गजों के दौरों से कार्यकर्ताओं में जान फूंकने की रणनीति भाजपा के सियासी किले में सेंध लगाने की चल रही तैयारी जमीनी पकड़ मजबूत करने व सरकार को घेरने की कवायद आने वाले महीनों में राष्ट्रीय नेताओं के कार्यक्रमों की तैयारी संगठन से लेकर बूथ तक सक्रियता बढ़ाने की रणनीति तय देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 भले ही अभी कुछ दूर हों, लेकिन सियासी दलों ने चुनावी मैदान को गर्म करना शुरू कर दिया है। भाजपा के बाद अब कांग्रेस भी अपनी चुनावी तैयारियों को धार देने में जुट गई है। पार्टी आने वाले महीनों में प्रदेश में राष्ट्रीय स्तर के कई बड़े नेताओं के दौरे कराने की तैयारी में है। इन दौरों के जरिये कांग्रेस जहां कार्यकर्ताओं में उत्साह भरने की कोशिश करेगी, वहीं सरकार के खिलाफ माहौल बनाने और चुनावी मुद्दों को जनता के बीच ले जाने की रणनीति पर भी काम होगा। कांग्रेस के लिए 2027 की लड़ाई सिर्फ सत्ता में वापसी की कोशिश नहीं, बल्कि प्रदेश में अपने राजनीतिक आधार को दोबारा मजबूत करने की चुनौती भी है। ऐसे में पार्टी की नजर अब विधानसभा क्षेत्रों से लेकर बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने पर है। राष्ट्रीय नेताओं के प्रस्तावित दौरे इसी व्यापक चुनावी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं। कांग्रेस की रणनीति में राष्ट्रीय नेतृत्व की मौजूदगी को खास महत्व दिया जा रहा है। पार्टी के बड़े नेता उत्तराखंड पहुंचकर कार्यकर्ताओं के साथ संवाद करेंगे और विभिन्न कार्यक्रमों में भाग लेंगे। इन दौरों के दौरान बेरोजगारी, महंगाई, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की तैयारी है। कांग्रेस की कोशिश है कि चुनावी माहौल बनने से पहले ही इन मुद्दों को जनता के बीच लगातार जिंदा रखा जाए। पार्टी का मानना है कि चुनाव के समय अचानक सक्रिय होने के बजाय अभी से संगठन को मैदान में उतारने से कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच सीधा संपर्क मजबूत किया जा सकता है। कांग्रेस की चुनावी रणनीति का सबसे अहम हिस्सा विधानसभा क्षेत्रों में संगठन को सक्रिय करना है। पार्टी स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारियां सौंपकर बूथ स्तर तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रही है। दरअसल, उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों पर मुकाबला एक जैसा नहीं है। पहाड़ और मैदान की राजनीतिक प्राथमिकताएं अलग हैं। कुमाऊं और गढ़वाल की सियासी परिस्थितियां भी अलग-अलग हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसी रणनीति तैयार करने की है, जो पूरे प्रदेश पर समान रूप से लागू होने के बजाय स्थानीय मुद्दों के मुताबिक आगे बढ़े। कांग्रेस के सामने केवल भाजपा सरकार को घेरने की चुनौती नहीं है। मतदाता के सामने अपना विकल्प और स्पष्ट रोडमैप रखना भी पार्टी के लिए जरूरी होगा। पिछले चुनावों में कांग्रेस के प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी नेतृत्व जानता है कि केवल सत्ता विरोधी माहौल के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता। यही वजह है कि संगठनात्मक सक्रियता के साथ कांग्रेस अपने मुद्दों और संभावित चुनावी एजेंडे को भी आकार देने में जुटी है। युवा मतदाताओं पर विशेष फोकस रहने की संभावना है। रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और पलायन जैसे सवालों को कांग्रेस चुनावी विमर्श का हिस्सा बनाना चाहती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं के उत्तराखंड दौरे पार्टी के लिए दोहरे राजनीतिक लाभ का माध्यम बन सकते हैं। एक ओर इससे प्रदेश संगठन को ऊर्जा मिलेगी, दूसरी ओर राष्ट्रीय नेतृत्व के मंच से प्रदेश सरकार के खिलाफ हमले को व्यापक राजनीतिक स्वर दिया जा सकेगा। हालांकि कांग्रेस के लिए यह भी चुनौती होगी कि राष्ट्रीय नेताओं की सभाओं और कार्यक्रमों को केवल भीड़ जुटाने तक सीमित न रखा जाए। इन कार्यक्रमों का सीधा लाभ बूथ संगठन और स्थानीय चुनावी अभियान को मिले, इसके लिए पार्टी को स्पष्ट फॉलोअप रणनीति बनानी होगी। भाजपा ने संगठनात्मक स्तर पर 2027 को लेकर अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। ऐसे में कांग्रेस अब उस अंतर को पाटने की कोशिश कर रही है। राष्ट्रीय नेताओं के दौरे इसी प्रतिस्पर्धा का हिस्सा हैं। लेकिन असली मुकाबला मंचों पर नहीं, मैदान में होगा। कौन सा दल गांव तक पहुंचता है? किसके कार्यकर्ता चुनाव से महीनों पहले मतदाता के दरवाजे पर दिखाई देते हैं? कौन स्थानीय नाराजगी को राजनीतिक मुद्दे में बदल पाता है? और कौन युवा मतदाता को अपने साथ जोड़ पाता है? 2027 की चुनावी पिच पर इन सवालों के जवाब ही जीत-हार की दिशा तय करेंगे। कांग्रेस ने दिग्गजों के दौरे की तैयारी शुरू कर दी है। अब देखना यह होगा कि इन दौरों से पैदा होने वाली सियासी गर्मी कितनी जल्दी संगठन की जमीन तक पहुंचती है।

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