गुरुवार, 20 अगस्त 2026
वोट की चोट के नारों से सत्ता में ‘खलबली’
सालों की मेहनत, कोचिंग का कर्ज और लगातार रद्द होती परीक्षाओं से सब्र का बांध टूटा
नारों में बदला बेरोजगारों का आक्रोश, 2027 के सियासी समीकरण बिगाड़ने का अल्टीमेटम
शहर-शहर मोदी के खिलाफ जनता का गुस्सा, युवाओं की नाराजगी बनी बड़ी चुनौती
देहरादून/नई दिल्ली। सियासत में नाराजगी कोई नई चीज नहीं है। लेकिन जब नाराजगी सवाल पूछने लगे, जब सवाल नारे बन जाएं और नारे चुनावी बातचीत का हिस्सा बनने लगें, तब सत्ता को ठहरकर सुनना पड़ता है। आज देश के कई हिस्सों में युवाओं के बीच कुछ ऐसा ही माहौल दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पेपर लीक जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में हैं। कहीं युवा कह रहे हैंकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। कहीं सरकार के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं और कहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों पर सवाल उठाते हुए युवाओं का गुस्सा खुलकर सामने आ रहा है।
इस गुस्से को समझने के लिए सिर्फ राजनीतिक भाषण सुनना काफी नहीं होगा। उस युवा को सुनना होगा जो वर्षों से परीक्षा की तैयारी कर रहा है। वह परिवार सुनना होगा जिसने कोचिंग और रहने पर पैसा खर्च किया। वह अभ्यर्थी सुनना होगा जिसकी परीक्षा रद्द हो गई या जिसकी मेहनत पर प्रश्नपत्र लीक होने की खबर ने पानी फेर दिया। यही वह जगह है जहां पेपर लीक की राजनीति, बेरोजगारी की चिंता और चुनावी नाराजगी एक-दूसरे से जुड़ती दिखाई देती है।
प्रधानमंत्री मोदी की ओर से राजनीतिक विरोधियों पर किए गए तीखे तंजों के बीच विपक्ष और सोशल मीडिया ने भी अपनी शब्दावली गढ़ ली है। काकरोच जनता पार्टी जैसा व्यंग्य इसी राजनीतिक भाषा की नई अभिव्यक्ति है। नाम चाहे जो हो, असली सवाल नाम का नहीं है। सवाल यह है कि जनता किसे वोट देगी और क्यों देगी?
लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ सरकार की उपलब्धियों का उत्सव नहीं होते। वह जनता की शिकायतों की सुनवाई भी होते हैं और जब युवा अपने अनुभवों को राजनीतिक सवाल में बदलने लगते हैं तो चुनावी समीकरणों में उसका असर पड़ना स्वाभाविक है। आज का युवा केवल यह नहीं पूछ रहा कि देश कितना आगे बढ़ा। वह यह भी पूछ रहा है कि मेरी नौकरी कहां है? मेरी परीक्षा सुरक्षित क्यों नहीं है? मेरी मेहनत की गारंटी कौन देगा? इन सवालों का जवाब किसी नारे से नहीं दिया जा सकता।
पेपर लीक की घटनाओं ने प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर बड़ा सवाल खड़ा किया है। परीक्षा की तैयारी करने वाला युवा सिर्फ किताब नहीं पढ़ता। वह अपनी उम्र के कई साल उस परीक्षा के नाम कर देता है। जब परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठता है तो नुकसान सिर्फ एक परीक्षा का नहीं होता। नुकसान उस भरोसे का होता है जिसके आधार पर लाखों युवा अपने भविष्य की योजना बनाते हैं। यही वजह है कि पेपर लीक का मुद्दा अब विपक्ष के भाषणों से आगे निकलकर युवाओं की निजी जिंदगी का सवाल बन चुका है। सरकारें जांच की घोषणा कर सकती हैं। एजेंसियां जांच कर सकती हैं। गिरफ्तारियां हो सकती हैं। लेकिन जिस युवा ने दो-तीन साल तैयारी में लगाए, उसके समय का क्या? यही सवाल चुनावी राजनीति में सबसे ज्यादा असहज करने वाला हो सकता है।
भाजपा की ताकत उसका संगठन है। उसका बूथ नेटवर्क है। उसका चुनावी प्रबंधन है। उसके पास प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा राजनीतिक चेहरा है। लेकिन दूसरी तरफ एक ऐसा वर्ग भी है जिसे किसी राजनीतिक दल का स्थायी वोटर मान लेना खतरनाक होगाकृयुवा। यह युवा जाति, क्षेत्र और परंपरागत राजनीतिक पहचान से आगे जाकर रोजगार, परीक्षा, शिक्षा और अवसर की भाषा में सवाल पूछ रहा है। सोशल मीडिया ने इस गुस्से को और तेज कर दिया है। एक शहर में हुआ प्रदर्शन दूसरे शहर तक पहुंच जाता है। एक अभ्यर्थी का वीडियो हजारों युवाओं तक पहुंच जाता है। एक पेपर लीक की खबर देखते ही दूसरे राज्यों के युवा अपने अनुभव साझा करने लगते हैं। यानी पहले जिस नाराजगी को सत्ता स्थानीय घटना मानकर टाल सकती थी, वह अब कुछ ही घंटों में राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बन सकती है।
शहरों की सड़कों पर दिखाई दे रहा गुस्सा अगर गांवों और कस्बों तक पहुंच गया, और युवाओं की नाराजगी मतदान के फैसले में बदल गई, तो 2027 की राजनीति में यह सिर्फ विपक्ष की कहानी नहीं होगीकृयह सत्ता के लिए सबसे बड़ा सवाल बन सकती है और सवाल वही रहेगाकृकि जिस युवा ने नौकरी के लिए अपनी जवानी लगाई, अगर वह सरकार से कहे कि अब वोट सोच-समझकर देंगे, तो क्या सत्ता उसकी आवाज सुनेगी?
वोट नहीं देंगे से किसे देंगे तक का सवाल
हालांकि चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी है। सरकार से नाराज होना और विपक्ष को वोट देनाकृदो अलग बातें हैं। अगर कोई युवा कहता है कि वह मौजूदा सरकार को वोट नहीं देगा, तो अगला सवाल होगाकृवह किसे वोट देगा?यही विपक्ष की असली परीक्षा है। सत्ता के खिलाफ गुस्सा पैदा करना आसान है। उस गुस्से को राजनीतिक विकल्प में बदलना कठिन है। युवाओं की नाराजगी को वोट में बदलने के लिए विपक्ष को सिर्फ मोदी विरोध से आगे जाना होगा। उसे रोजगार, परीक्षा सुधार, भर्ती कैलेंडर, पेपर लीक पर जवाबदेही और युवाओं के भविष्य का स्पष्ट रोडमैप देना होगा।वरना चुनाव के बाद यही गुस्सा फिर सोशल मीडिया पर लौट सकता है।
चुनावी साल में सबसे बड़ा सवाल
सियासत में अक्सर बड़े मुद्दों के बीच छोटे-छोटे सवाल दब जाते हैं। लेकिन कभी-कभी वही छोटे सवाल चुनाव का बड़ा मुद्दा बन जाते हैं। एक बेरोजगार युवक का सवाल। एक रद्द हुई परीक्षा का सवाल। एक पेपर लीक से टूटे भरोसे का सवाल। एक परिवार की आर्थिक चिंता का सवाल और फिर वह वाक्यकृगलती से भी वोट नहीं देंगे। यह वाक्य अपने आप में चुनाव का परिणाम नहीं बताता। लेकिन यह जरूर बताता है कि सत्ता के सामने सवाल खड़े हो चुके हैं। अब देखना यह है कि इन सवालों का जवाब भाषणों से दिया जाता है या नीतियों से। क्योंकि लोकतंत्र में जनता को हमेशा चुप नहीं कराया जा सकता। कभी-कभी जनता चुप रहती है, कभी सड़क पर आती है और कभी ईवीएम के सामने खड़ी होकर जवाब देती है।
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