शनिवार, 29 अगस्त 2026

‘वादों’ के मंच पर जनता का ‘हिसाब’

चुनावी आहट के बीच सियासी सरगर्मियों का दौर शुरू इस बार नारों से ज्यादा कसौटी पर होंगे जमीनी मुद्दे जनता पूछेगी सवाल, नेताओं को देना होगा हिसाब 2027 की चुनावी आहट के साथ बदल रहा माहौल वादों से ज्यादा काम का लेखा-जोखा मांगेंगे मतदाता देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ सियासत का तापमान बढ़ने लगा है। राजनीतिक दल संगठन को मजबूत करने, यात्राएं निकालने और बड़े नेताओं के दौरे कराने में जुट गए हैं। मंच सजने लगे हैं, नारों की तैयारी होने लगी है और दावेदार भी अपनी-अपनी जमीन तलाशने लगे हैं। लेकिन इस बार चुनावी मैदान में सिर्फ नेता नहीं होंगे। जनता भी सवालों की अपनी सूची लेकर खड़ी होगी। पांच साल पहले किए गए वादों से लेकर आज की जमीनी हकीकत तक, मतदाता नेताओं से हिसाब मांग सकता है। सवाल यह नहीं होगा कि मंच से किसने कितना बड़ा दावा किया। सवाल यह होगा कि गांव में सड़क पहुंची या नहीं, अस्पताल में डाक्टर आया या नहीं, स्कूल में शिक्षक है या नहीं और जिस युवा से रोजगार का वादा किया गया था, उसके लिए वास्तव में क्या बदला? उत्तराखंड की राजनीति में पलायन सबसे पुराना और सबसे कठिन सवाल है। वर्षों से सरकारें पलायन रोकने, गांवों को आबाद करने और स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने की बातें करती रही हैं। योजनाएं भी बनीं, घोषणाएं भी हुईं। लेकिन चुनावी चौपाल में शायद सवाल फिर वही होगाकृगांव क्यों खाली हो रहे हैं? जिस परिवार का बेटा रोजगार के लिए देहरादून, दिल्ली या चंडीगढ़ चला गया, वह घोषणाओं से ज्यादा अपने गांव की स्थिति देखेगा। बंद पड़े घर, खाली स्कूल और खेती से दूर होती नई पीढ़ी किसी भी चुनावी भाषण से ज्यादा बड़ा सवाल खड़ा करती है। उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में युवा मतदाता निर्णायक भूमिका में है। प्रतियोगी परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं, बेरोजगारी और सरकारी नौकरियों को लेकर युवाओं के सवाल इस बार भी चुनावी विमर्श के केंद्र में रह सकते हैं। युवा पूछ सकता हैकृभर्ती कब निकली, परीक्षा कब हुई, परिणाम कब आया और नियुक्ति कब मिली? यह सवाल किसी एक दल तक सीमित नहीं रहेगा। सत्ता पक्ष से जवाब मांगा जाएगा तो विपक्ष से भी पूछा जाएगा कि उसके पास समाधान क्या है। पहाड़ों में स्वास्थ्य सुविधाएं हमेशा चुनावी मुद्दा रही हैं। कई स्थानों पर अस्पतालों की इमारतें हैं, लेकिन विशेषज्ञ चिकित्सक और जरूरी सुविधाएं पर्याप्त नहीं। गंभीर मरीज को आज भी बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है। चुनाव के समय सवाल सीधा होगाकृक्या पहाड़ के व्यक्ति को इलाज के लिए पहाड़ छोड़ना ही पड़ेगा? इसी तरह शिक्षा की स्थिति, शिक्षकों की उपलब्धता और सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता भी जनता के सवालों में शामिल होगी। उत्तराखंड में विकास का सबसे दिखाई देने वाला चेहरा सड़क है। लेकिन बारिश के मौसम में सड़क टूटती है, पहाड़ दरकता है और कई बार यातायात ठप हो जाता है। चारधाम और पर्यटन परियोजनाओं से लेकर गांव की संपर्क सड़क तक, गुणवत्ता और टिकाऊपन पर सवाल उठते रहे हैं। इस बार जनता सिर्फ यह नहीं पूछेगी कि सड़क बनी या नहीं। सवाल होगाकृसड़क कितने साल चली और किस कीमत पर बनी? उत्तराखंड में आपदा अब चुनावी मुद्दे से अलग नहीं रह सकती। हर बरसात में भूस्खलन, सड़क बंद होने, नदी-नालों के उफान और बस्तियों पर खतरे की खबरें सामने आती हैं। ऐसे में जनता यह भी पूछेगी कि आपदा आने के बाद राहत कितनी मिली, लेकिन उससे बड़ा सवाल होगाकृआपदा आने से पहले तैयारी कितनी थी? प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील प्रदेश में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन का सवाल भी राजनीतिक दलों के सामने होगा। उत्तराखंड के सामाजिक और आर्थिक ढांचे में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। पानी, स्वास्थ्य, महंगाई, परिवार की आय, रोजगार और पलायन का सीधा असर उन पर पड़ता है। इसलिए महिला मतदाता से केवल भावनात्मक अपील पर्याप्त नहीं होगी। उसे यह जानना होगा कि उसके जीवन में पिछले पांच वर्षों में क्या बदला। चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दल बड़े-बड़े मंच तैयार करेंगे। घोषणाएं होंगी, यात्राएं निकलेंगी और आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलेगा। लेकिन इस बार चुनावी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद मंच नहीं, जनता की चौपाल होगी। क्योंकि मतदाता अब केवल यह सुनना नहीं चाहता कि प्रदेश कितना आगे बढ़ा। वह यह भी देखना चाहता है कि उसके गांव, उसके मोहल्ले और उसके परिवार की जिंदगी कितनी बदली। 2027 की चुनावी जंग में भाजपा और कांग्रेस दोनों के सामने अपनी-अपनी उपलब्धियां और दावे होंगे। छोटे दल भी अपने सवाल लेकर मैदान में उतरेंगे। लेकिन अंतिम फैसला उस मतदाता के हाथ में होगा जो पांच साल के अनुभव को अपने मतदान के दिन याद रखेगा। इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि कौन जीतेगा। बड़ा सवाल यह होगा कि जनता के सवालों का जवाब कौन बेहतर तरीके से दे पाएगा। क्योंकि चुनावी मौसम में नेता दरवाजे पर आएंगे। इस बार दरवाजा जनता खोलेगीकृऔर सवाल भी वही पूछेगी।

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