रविवार, 20 सितंबर 2026

विधायक निधि के 573 करोड़ ‘अनयूज्ड’

पर्वतीय क्षेत्रों में विकास की रफ्तार सुस्त, विधायक निधि खर्च में पहाड़ पीछे, मैदान आगे आरटीआई में सामने आई तस्वीर,1664 करोड़ की निधि उपलब्ध, खर्च हुए करीब 1091 करोड़ पहाड़ का रिपोर्ट कार्ड, 34 विधानसभा क्षेत्रों में 62 फीसदी ही बजट का हुआ है इस्तेमाल देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले विधायक निधि के इस्तेमाल का आंकड़ा विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच एक अहम सवाल खड़ा कर रहा है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2022-23 से जून 2026 तक प्रदेश के विधायकों के लिए करीब 1,664 करोड़ रुपये की विधायक निधि उपलब्ध रही, लेकिन इसमें से करीब 1,091.29 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके। यानी लगभग 573 करोड़ रुपये की राशि खर्च नहीं हो सकी। आरटीआई से सामने आए आंकड़ों में सबसे बड़ा अंतर भौगोलिक आधार पर दिखाई देता है। उत्तरकाशी, चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी, पौड़ी, अल्मोड़ा, बागेश्वर, चंपावत और पिथौरागढ़ के 34 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 807.5 करोड़ रुपये उपलब्ध रहे, जिनमें से लगभग 501.07 करोड़ रुपये खर्च हुए। यानी खर्च की दर करीब 62 प्रतिशत रही। प्रति विधायक औसत खर्च करीब 14.74 करोड़ रुपये रहा। इसके उलट हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर के 20 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 475 करोड़ रुपये की निधि उपलब्ध रही और लगभग 337.86 करोड़ रुपये खर्च हुए। यहां खर्च की दर करीब 71.1 प्रतिशत रही और प्रति विधायक औसत खर्च लगभग 16.88 करोड़ रुपये रहा। यानी पहाड़ और मैदान के बीच औसत खर्च में करीब 2.14 करोड़ रुपये प्रति विधायक का अंतर सामने आया। देहरादून और नैनीताल के मिश्रित भौगोलिक स्वरूप वाले 16 विधानसभा क्षेत्रों में करीब 66.4 प्रतिशत निधि खर्च हुई। इससे तस्वीर यह बनती है कि विधायक निधि खर्च की रफ्तार में मैदान सबसे आगे और पर्वतीय क्षेत्र सबसे पीछे रहे। हालांकि यह आंकड़ा खर्च की स्थिति बताता है कि इससे कम खर्च के कारण अपने आप साबित नहीं होते। भौगोलिक पहुंच, प्रशासनिक प्रक्रियाएं और परियोजनाओं की प्रकृति जैसे कई कारण हो सकते हैं। राजनीतिक दलों के हिसाब से आंकड़ों को देखें तो तस्वीर और दिलचस्प है। विधायकवार दर्ज खर्च प्रतिशत के साधारण औसत में कांग्रेस विधायकों का आंकड़ा करीब 68.4 प्रतिशत, जबकि भाजपा विधायकों का करीब 64.4 प्रतिशत बताया गया है। यानी इस गणना में कांग्रेस विधायक करीब चार प्रतिशत अंक आगे हैं। हालांकि इसे दोनों दलों की कुल विधायक निधि की अंतिम या भारित व्यय दर नहीं माना जाना चाहिए। दोनों दलों के विधायकों की संख्या अलग है और विधानसभा क्षेत्रवार उपलब्ध निधि तथा खर्च भी अलग-अलग है। दिलचस्प बात यह है कि सबसे अधिक खर्च प्रतिशत वाले विधायकों में दोनों प्रमुख दलों के प्रतिनिधि शामिल हैं। उपलब्ध आरटीआई आंकड़ों के अनुसार भाजपा के रुड़की विधायक प्रदीप बत्रा और कांग्रेस के पिरान कलियर विधायक फुरकान अहमद करीब 77 प्रतिशत खर्च के स्तर पर हैं। कांग्रेस के रवि बहादुर और काजी निजामुद्दीन करीब 76 प्रतिशत पर दर्ज हैं। यानी विधायक निधि खर्च को केवल सत्ता पक्ष और विपक्ष की लड़ाई के चश्मे से देखना तस्वीर को अधूरा कर देगा। असली अंतर विधानसभा क्षेत्र और भौगोलिक परिस्थितियों के स्तर पर अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। दूसरी तरफ कई विधानसभा क्षेत्रों में खर्च की रफ्तार काफी कम है। उपलब्ध आंकड़ों में टिहरी विधानसभा क्षेत्र में करीब 30 प्रतिशत, यमकेश्वर में 44 प्रतिशत, चकराता में 51 प्रतिशत, कपकोट में 52 प्रतिशत और चंपावत में करीब 53 प्रतिशत खर्च दर्ज है। यहां सवाल केवल विधायक निधि खर्च होने का नहीं, बल्कि उस धनराशि से क्षेत्र की कौन-सी प्राथमिकताएं पूरी हुईं और किन कारणों से राशि खर्च नहीं हो पाई, इसका भी है। विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही समय बचा है। ऐसे में विधायक निधि का यह आंकड़ा विधायकों के विकास कार्यों के दावों की पड़ताल का एक आधार जरूर बन सकता है। लेकिन अधिक खर्च का अर्थ अपने आप बेहतर विकास और कम खर्च का अर्थ अपने आप खराब प्रदर्शन नहीं है। यह जानना भी जरूरी है कि खर्च किस काम पर हुआ, काम की गुणवत्ता कैसी रही और उसका वास्तविक लाभ जनता तक कितना पहुंचा। सबसे बड़ा सवाल पहाड़ के लिए है। राज्य गठन के बाद से पर्वतीय क्षेत्रों के विकास और पलायन पर लगातार चर्चा होती रही है। ऐसे में यदि उपलब्ध विधायक निधि का बड़ा हिस्सा समय रहते खर्च नहीं हो पाता, तो सरकार और विधायकोंकृदोनों के सामने जवाबदेही का सवाल खड़ा होता है। विधायक निधि बढ़ाना आसान हो सकता है, लेकिन उसे समय पर, पारदर्शी तरीके से और जरूरत के मुताबिक जमीन पर उतारना असली परीक्षा है। आरटीआई के आंकड़े फिलहाल इतना जरूर बता रहे हैं कि उत्तराखंड में विकास की रकम उपलब्ध होने के बावजूद उसके इस्तेमाल की रफ्तार पहाड़ और मैदान में एक जैसी नहीं है।

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