शनिवार, 12 सितंबर 2026
उत्तराखंड की सियासत के गढ़ में एनएसयूआई ने गाड़ा झंडा
छात्र राजनीति के मैदान से 2027 की सियासी पिच तैयार करने में जुटी कांग्रेस
बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं, छात्र हितों के मुद्दों को हथियार बनाएगी एनएसयूआई
भाजपा के मजबूत राजनीतिक आधार में युवा वोट बैंक को चुनौती देने की तैयारी
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में जहां 2027 के विधानसभा चुनाव की बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है, वहीं कांग्रेस ने सत्ता की लड़ाई से पहले छात्र राजनीति के मैदान में अपनी जमीन मजबूत करने की कवायद तेज कर दी है। कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई ने प्रदेश के छात्र राजनीति के गढ़ों में संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाते हुए युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने का दावा किया है। संगठन का लक्ष्य केवल छात्रसंघ चुनाव तक सीमित नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए युवा नेतृत्व की नई फौज तैयार करना भी माना जा रहा है।
उत्तराखंड की राजनीति में छात्र राजनीति की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से निकले छात्र नेता आगे चलकर मुख्यधारा की राजनीति में पहुंचे हैं। यही वजह है कि एनएसयूआई की सक्रियता को कांग्रेस के लिए महज संगठनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि भविष्य की सियासी निवेश रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। एनएसयूआई का फोकस छात्रसंघ चुनावों में प्रभाव बढ़ाने के साथ युवाओं के उन मुद्दों को राजनीतिक आवाज देने पर है, जो प्रदेश की राजनीति में लगातार बड़ा सवाल बन रहे हैं। सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता, शिक्षा की गुणवत्ता और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दे कांग्रेस की छात्र इकाई के एजेंडे में प्रमुखता से रखे जा रहे हैं।
कांग्रेस के लिए यह रणनीति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड में युवा मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने वाली बड़ी ताकत है। जिस संगठन की छात्र परिसरों में पकड़ मजबूत होगी, उसके पास भविष्य की राजनीति के लिए कार्यकर्ताओं और नेताओं का मजबूत आधार तैयार करने का अवसर भी होगा। उत्तराखंड में लंबे समय से भाजपा का संगठनात्मक नेटवर्क मजबूत माना जाता है। ऐसे में एनएसयूआई की सक्रियता का एक बड़ा राजनीतिक अर्थ यह भी है कि कांग्रेस भाजपा के मजबूत माने जाने वाले सामाजिक और युवा आधार में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस के सामने चुनौती केवल भाजपा को चुनाव में हराने की नहीं है। उसे बूथ स्तर तक मजबूत संगठन खड़ा करना है और इसके लिए छात्र राजनीति से निकलने वाले कार्यकर्ता महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यही कारण है कि एनएसयूआई की गतिविधियों को कांग्रेस के 2027 मिशन की शुरुआती प्रयोगशाला के रूप में भी देखा जा सकता है। उत्तराखंड में सरकारी नौकरी युवाओं की राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा है। भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मामलों ने युवाओं में व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए हैं। एनएसयूआई इसी असंतोष को राजनीतिक मुद्दे में बदलने की तैयारी में है। संगठन यदि छात्र परिसरों से निकलकर भर्ती परीक्षाओं और रोजगार के सवाल को व्यापक युवा आंदोलन का रूप देने में सफल होता है तो इसका असर सीधे 2027 की राजनीति पर पड़ सकता है। कांग्रेस के लिए यह भाजपा सरकार को घेरने का मौका भी है और अपने संगठन को पुनर्जीवित करने का माध्यम भी।
एनएसयूआई की सबसे बड़ी राजनीतिक उपयोगिता कांग्रेस के लिए यह हो सकती है कि इससे पार्टी को नई पीढ़ी का नेतृत्व मिल सके। उत्तराखंड कांग्रेस में लंबे समय से पुराने और स्थापित चेहरों का प्रभाव रहा है। ऐसे में छात्र राजनीति से आने वाले नए नेताओं को आगे बढ़ाना पार्टी के लिए संगठनात्मक बदलाव का रास्ता खोल सकता है। लेकिन इसके लिए एनएसयूआई को केवल चुनावी पोस्टर और नारों से आगे बढ़ना होगा। परिसरों में छात्र समस्याओं पर लगातार संघर्ष, संवाद और संगठनात्मक उपस्थिति ही उसे स्थायी राजनीतिक ताकत दे सकती है।
एनएसयूआई ने अगर छात्र राजनीति के मैदान में अपना झंडा गाड़ा है तो अब असली परीक्षा उसे टिकाए रखने की है। छात्रसंघ चुनाव में जीत हासिल करना एक उपलब्धि हो सकती है, लेकिन उसे विधानसभा चुनाव तक राजनीतिक ऊर्जा में बदलना अलग चुनौती है। 2027 की सियासत में बेरोजगारी, भर्ती, पलायन, शिक्षा और युवाओं की भागीदारी जैसे मुद्दे निर्णायक हो सकते हैं। ऐसे में एनएसयूआई कांग्रेस के लिए युवा असंतोष को राजनीतिक संगठन में बदलने का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है। उत्तराखंड की राजनीति में सत्ता का रास्ता भले ही विधानसभा से होकर गुजरता हो, लेकिन उस रास्ते की पहली राजनीतिक सीढ़ी विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के परिसर भी बन सकते हैं और कांग्रेस ने शायद इसी सियासी गणित को पढ़ते हुए छात्र राजनीति के मैदान में अपना झंडा पहले ही गाड़ने की तैयारी शुरू कर दी है।
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