मंगलवार, 22 सितंबर 2026
कांग्रेस में ‘उत्साह’ भाजपा में ‘बेचैनी’
हरदा बनाम भाजपा, या कांग्रेस के भीतर भी एक संदेश
उत्तराखंड में चुनावी दहलीज पर पुराने चेहरे की वापसी
हरदा के स्वागत में शक्ति प्रदर्शन या कांग्रेस का है संदेश
2027 से पहले फिर आमने-सामने पुराने सियासी चेहरे
देहरादून। उत्तराखंड की सियासत में कुछ चेहरे ऐसे हैं जिनकी मौजूदगी भर से राजनीतिक तापमान बदल जाता है। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरीश रावत की लंबे समय बाद उत्तराखंड वापसी ने एक बार फिर यही साबित किया है। दिल्ली से प्रदेश लौटे रावत का रास्ते भर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने स्वागत किया और देहरादून में रोड शो के जरिए अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई। रावत की वापसी ऐसे समय हुई है, जब 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हो चुकी हैं और कांग्रेस के भीतर नेतृत्व, चेहरे और राजनीतिक रणनीति को लेकर चर्चाएं लगातार चल रही हैं। ऐसे में उनके स्वागत को भाजपा जहां शक्ति प्रदर्शन और कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस के नेता इसे वरिष्ठ नेता के प्रति कार्यकर्ताओं के सम्मान और समर्थन के तौर पर पेश कर रहे हैं। यानी हरदा लौटे तो सिर्फ स्वागत नहीं हुआ,सियासी संदेश भी पढ़े जाने लगे।
भाजपा नेताओं ने रावत के रोड शो को सीधे कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जोड़ दिया है। भाजपा विधायक मुन्ना सिंह चौहान ने सवाल उठाया कि यदि कांग्रेस में रावत को पूरा सम्मान और महत्व मिल रहा है तो शक्ति प्रदर्शन की जरूरत क्यों पड़ी? भाजपा ने यह सवाल भी उठाया कि इस प्रदर्शन का संदेश आखिर किसे दिया जा रहा हैकृकांग्रेस आलाकमान को, प्रदेश नेतृत्व को या पार्टी के भीतर अपने समर्थकों को? भाजपा विधायक विनोद चमोली ने इससे भी तीखा हमला करते हुए रावत के रोड शो को राजनीतिक ड्रामा बताया और उनके हालिया इस्तीफे से जुड़े घटनाक्रम को मुद्दा बनाया। भाजपा का आरोप है कि रावत कांग्रेस के भीतर अपने राजनीतिक प्रभाव को फिर से स्थापित करने के लिए शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी मनवीर सिंह चौहान ने भी रोड शो को कांग्रेस की गुटीय रस्साकशी से जोड़ते हुए निशाना साधा।
कांग्रेस के नजरिए से देखें तो तस्वीर दूसरी है। पार्टी के कार्यकर्ताओं का सड़क पर उतरकर किसी वरिष्ठ नेता का स्वागत करना यह बताता है कि रावत की राजनीतिक पकड़ और समर्थक आधार को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खुद रावत ने हरिद्वार पहुंचने पर कहा कि वह पार्टी के सिपाही हैं और पार्टी का निर्णय सर्वाेपरि है। यही बयान भाजपा के हमलों के बीच कांग्रेस के लिए राजनीतिक जवाब भी बनता है। रावत ने पार्टी से दूरी बनाने के बजाय खुद को संगठन के साथ खड़ा बताया है। इसलिए भाजपा जिस रोड शो को शक्ति प्रदर्शन बता रही है, कांग्रेस उसी दृश्य को वरिष्ठ नेता के प्रति कार्यकर्ताओं के भरोसे के रूप में देख रही है।
रावत की वापसी का समय भी महत्वपूर्ण है। उनके पूर्व ओएसडी से जुड़े परिसर में प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई के बाद उत्तराखंड की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तेज हुए हैं। रावत ने इस कार्रवाई को लेकर भाजपा सरकार पर निशाना साधा और चुनाव से पहले केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई पर सवाल उठाए। दूसरी तरफ भाजपा नेता इस प्रकरण को उनके राजनीतिक बचाव और कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति से जोड़ रहे हैं। यहां एक बात स्पष्ट हैकृईडी की कार्रवाई और उससे जुड़े आरोपों को राजनीतिक बयानबाजी से अलग रखकर देखा जाना चाहिए। जांच में सामने आने वाले तथ्यों और किसी राजनीतिक दल के आरोपों में अंतर है।
हरीश रावत की वापसी ने कांग्रेस के भीतर एक पुराना सवाल फिर जीवित कर दिया हैकृक्या उत्तराखंड कांग्रेस चुनावी राजनीति में उनके अनुभव और जनसंपर्क का कितना इस्तेमाल करेगी? दूसरी ओर भाजपा के लिए रावत अब भी एक ऐसा राजनीतिक चेहरा हैं, जिस पर हमला करके कांग्रेस की पुरानी राजनीति, नेतृत्व और कथित गुटबाजी को निशाना बनाया जा सकता है। यही वजह है कि रावत के स्वागत का कार्यक्रम भी भाजपा के लिए राजनीतिक मुद्दा बन गया। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस अभी अपने भीतर की नेतृत्व संबंधी चर्चाओं से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाई है। ऐसे में रावत की सक्रिय वापसी इन चर्चाओं को और गति दे सकती है।
रावत का रोड शो भाजपा के खिलाफ संदेश है या कांग्रेस के भीतर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता का प्रदर्शनकृइसका अंतिम अर्थ राजनीतिक परिस्थितियां तय करेंगी। लेकिन इतना जरूर है कि सड़क पर उमड़ी भीड़ ने दोनों दलों को प्रतिक्रिया देने के लिए मजबूर किया है। भाजपा इसे कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई बता रही है, जबकि कांग्रेस इसे रावत के प्रति कार्यकर्ताओं के समर्थन के रूप में देख रही है। दोनों के दावों के बीच असली राजनीतिक सवाल यही है कि क्या यह स्वागत केवल भावनात्मक था या 2027 की चुनावी रणनीति का शुरुआती संकेत भी?
उत्तराखंड की राजनीति में चुनाव के पहले पुराने चेहरे अक्सर नए समीकरण पैदा करते हैं। हरीश रावत की वापसी भी उसी क्रम का हिस्सा बनती दिख रही है। उनके समर्थकों का उत्साह कांग्रेस के लिए राजनीतिक ऊर्जा का संकेत है, जबकि भाजपा का लगातार हमला बताता है कि वह रावत की सक्रियता को चुनावी विमर्श से बाहर नहीं रहने देना चाहती। अब निगाहें इस बात पर होंगी कि रावत की वापसी के बाद कांग्रेस में उनकी भूमिका क्या रहती है, प्रदेश नेतृत्व के साथ उनका तालमेल किस दिशा में जाता है और पार्टी 2027 की लड़ाई में उनके अनुभव को किस तरह इस्तेमाल करती है। फिलहाल तस्वीर साफ हैकृहरदा की वापसी से कांग्रेस में उत्साह है, भाजपा में बेचौनी नहीं तो कम से कम राजनीतिक सक्रियता जरूर बढ़ी है और उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में एक पुराना अध्याय फिर से सुर्खियों में आ गया है।
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