मंगलवार, 22 सितंबर 2026

भाजपा के भीतर खिंची ‘लकीरें’

चकराता के लोगों को सदस्यता दिलाने पहुंचे नेता लौटे बैरंग एक दिन पहले किया प्रदर्शन, अगले दिन ज्वाइनिंग पर रोक चुनावी साल में संगठन बनाम स्थानीय समीकरण की परीक्षा मैं तो सस्ता आदमी हूं कहकर सवाल टाल गए मंत्री खजान दास देहरादून। चुनावी साल में भाजपा एक तरफ संगठन की मजबूती और 2027 में भारी बहुमत से सत्ता में वापसी के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ चकराता प्रकरण ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को सार्वजनिक मंच पर ला दिया है। करीब 60 लोगों की भाजपा में प्रस्तावित ज्वाइनिंग रुकना महज एक सदस्यता कार्यक्रम का टलना नहीं, बल्कि संगठन और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के बीच बढ़ती दूरी का संकेत बनकर सामने आया है। चकराता क्षेत्र से करीब 26 परिवारों के लगभग 60 लोगों को भाजपा में शामिल कराने के लिए प्रदेश कार्यालय लाया गया था। पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष मधु चौहान और दर्जाधारी राज्य मंत्री गीता राम गौड़ के नेतृत्व में पहुंचे इन लोगों को उम्मीद थी कि पार्टी कार्यालय में बाकायदा सदस्यता ग्रहण कराई जाएगी। लेकिन कार्यक्रम शुरू होने से पहले ही पूरा घटनाक्रम बदल गया और ज्वाइनिंग टल गई। रिपोर्टों के मुताबिक, कैबिनेट मंत्री खजान दास को जब चकराता से आए लोगों की सदस्यता की जानकारी मिली तो वह प्रदेश कार्यालय पहुंचे और ज्वाइनिंग का विरोध किया। इसके बाद सदस्यता कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ सका और लोगों को वापस लौटना पड़ा। मामला यहीं नहीं रुका। जब मंत्री से ज्वाइनिंग रोके जाने को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने पहले सवाल को टालने की कोशिश की और भाजपा के 2027 में फिर सरकार बनाने का दावा किया। लेकिन ज्वाइनिंग के सवाल पर उनका मैं तो सस्ता आदमी हूं वाला जवाब राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बन गया। इस पूरे घटनाक्रम की टाइमिंग ने सवाल और गहरे कर दिए हैं। ज्वाइनिंग से ठीक एक दिन पहले चकराता क्षेत्र से जुड़े भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने खजान दास के सरकारी आवास के बाहर प्रदर्शन किया था। प्रदर्शनकारियों ने समाज कल्याण विभाग की योजनाओं में क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं और उनके प्रस्तावों की कथित अनदेखी के आरोप लगाए थे। कुछ प्रदर्शनकारियों ने योजनाओं में कथित कमीशनखोरी के आरोप भी लगाए, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि सामने नहीं आई है। खजान दास ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि यदि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों में एक प्रतिशत भी सच्चाई साबित होती है तो वह मंत्री पद से इस्तीफा देने तक को तैयार हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह पूरे प्रदेश के मंत्री हैं और योजनाओं की स्वीकृति संबंधित क्षेत्रों से मिले प्रस्तावों के आधार पर हुई है। मामले में भाजपा संगठन ने इसे अलग तरीके से रखा है। प्रदेश महामंत्री कुंदन परिहार के मुताबिक प्रदेश कार्यालय में ज्वाइनिंग की पूर्व सूचना संगठन को नहीं दी गई थी और प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट उस समय कार्यालय में मौजूद नहीं थे। इसलिए कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ाया गया। संगठन का यह स्पष्टीकरण अपने स्थान पर है, लेकिन राजनीतिक सवाल इससे खत्म नहीं होते। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि करीब 60 लोगों को सदस्यता दिलाने की तैयारी प्रदेश कार्यालय तक पहुंची और ऐन वक्त पर कार्यक्रम रोकना पड़ा? यदि कार्यक्रम की सूचना संगठन को नहीं थी तो लोगों को प्रदेश कार्यालय तक किस स्तर से लाया गया? और यदि यह केवल प्रक्रिया का मामला था तो मंत्री के हस्तक्षेप की नौबत क्यों आई? उत्तराखंड भाजपा पहले ही 2027 की तैयारी में संगठन को मजबूत करने और बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने पर जोर दे रही है। ऐसे समय में किसी विधानसभा क्षेत्र के नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी खुलकर सामने आना पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा करता है। चकराता में घटनाक्रम अब दो अलग-अलग तस्वीरें सामने रख रहा हैकृएक तरफ भाजपा का केंद्रीय और प्रदेश नेतृत्व संगठन की एकजुटता का संदेश दे रहा है, दूसरी तरफ स्थानीय स्तर पर विरोध, प्रदर्शन और सदस्यता कार्यक्रम के रुकने जैसी घटनाएं राजनीतिक संदेश को उलझा रही हैं। यह घटनाक्रम भाजपा के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चुनाव केवल बड़े नेताओं के भाषणों और प्रदेश कार्यालय के कार्यक्रमों से नहीं जीते जाते। बूथ तक संगठन की स्वीकार्यता और स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। भाजपा लगातार अपने संगठन को अनुशासित और मजबूत राजनीतिक ढांचे के रूप में प्रस्तुत करती रही है। ऐसे में जब पार्टी में शामिल होने के लिए पहुंचे लोगों को सदस्यता लिए बिना लौटना पड़े और उसी घटनाक्रम में पार्टी के एक मंत्री का विरोध सामने आए, तो स्वाभाविक रूप से संगठनात्मक समन्वय पर सवाल उठते हैं। यह भी ध्यान रखना होगा कि ज्वाइनिंग रुकने को सीधे किसी बड़े संगठनात्मक संकट का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। भाजपा संगठन ने इसे सूचना और प्रक्रिया का मामला बताया है और बातचीत से समाधान की बात सामने आई है। लेकिन राजनीतिक संदेश को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। चुनावी दहलीज पर खड़ी भाजपा के लिए असली चुनौती विरोधियों के आरोपों से ज्यादा अपने ही घर में उठती आवाजों को समय रहते संभालने की है। चकराता की 60 सदस्यताओं पर लगा ब्रेक इसलिए चर्चा में है, क्योंकि सवाल केवल 60 लोगों का नहीं है। सवाल यह है कि चुनावी मैदान में उतरने से पहले भाजपा अपने स्थानीय समीकरणों, नाराज कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच तालमेल को किस तरह साधती है। एक दिन प्रदर्शन, अगले दिन ज्वाइनिंग पर रोक और फिर संगठन की सफाईकृचकराता का घटनाक्रम फिलहाल भाजपा के लिए असहज राजनीतिक तस्वीर जरूर पेश कर रहा है।

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