सोमवार, 28 सितंबर 2026

तीसरी जीत की ‘राह’ में हर बाधा पर भाजपा की नजर

प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर कोर कमेटियां बनी 15 प्रमुख विभागों में संयोजक व सह-संयोजक नियुक्त किए उत्तराखंड में बूथ से लेकर केंद्रीय स्तर तक सक्रिय हुई भाजपा देहरादून। उत्तराखंड में लगातार तीसरी विधानसभा जीत का लक्ष्य भाजपा के लिए अब महज राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि संगठन के स्तर पर चल रहा विस्तृत चुनावी अभियान बन चुका है। वर्ष 2027 के रण में उतरने से पहले पार्टी ने अपनी तैयारियों को बूथ से लेकर केंद्रीय नेतृत्व तक कई स्तरों पर कसना शुरू कर दिया है। लक्ष्य साफ हैकृसत्ता विरोधी संभावित रुझानों, कमजोर सीटों, संगठनात्मक असंतोष और बदलते सामाजिक समीकरणों को चुनाव से पहले ही साध लिया जाए। भाजपा ने प्रदेश की सभी 70 विधानसभा सीटों पर कोर कमेटियों का गठन पहले ही कर दिया है। इन कमेटियों के जरिए स्थानीय राजनीतिक परिस्थितियों, संगठन की स्थिति और बूथ स्तर की तैयारियों की समीक्षा की जा रही है। इसके साथ ही पार्टी ने संगठन के 15 प्रमुख विभागों में संयोजक और सह-संयोजक नियुक्त कर चुनाव प्रबंधन को अलग-अलग स्तरों पर सक्रिय किया है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी जीती हुई सीटों को सुरक्षित रखने के साथ पिछली बार हाथ से निकली सीटों पर वापसी की है। सितंबर में हुई संगठनात्मक बैठकों में पार्टी ने 47 जीती सीटों को सुरक्षित रखने और 23 सीटों पर वापसी की रणनीति पर चर्चा की। इसके साथ ही डैमेज कंट्रोल और विपक्ष द्वारा बनाए जा रहे संभावित राजनीतिक माहौल पर भी नजर रखने का संदेश दिया गया। यानी भाजपा की रणनीति केवल अपने मजबूत क्षेत्रों पर निर्भर रहने की नहीं है। पार्टी कमजोर कड़ियों को पहले से चिन्हित कर वहां संगठन, जनसंपर्क और राजनीतिक संदेश को मजबूत करना चाहती है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उत्तराखंड दौरों को भी इसी व्यापक चुनावी तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है। कुमाऊं दौरे के दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों और संगठन पदाधिकारियों से संवाद किया। सरकारी योजनाओं के जमीनी असर, विकास कार्यों और जनता की अपेक्षाओं पर फीडबैक लेने की बात सामने आई। अब चुनाव से करीब एक वर्ष पहले प्रदेश प्रभारी के स्तर पर भी बड़ा बदलाव किया गया है। राम माधव को उत्तराखंड का नया प्रभारी तथा अरविंद मेनन और बांसुरी स्वराज को सह प्रभारी बनाया गया है। पार्टी के अनुसार नई टीम के सामने संगठन और सरकार के बीच समन्वय, कार्यकर्ताओं की सक्रियता, चुनावी मुद्दों और सामाजिक समीकरणों को साधने की चुनौती होगी। भाजपा की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बूथ प्रबंधन है। पार्टी चुनाव को केवल बड़े नेताओं की सभाओं और नारों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहती। बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता, कार्यकर्ताओं की उपलब्धता और मतदाताओं तक सरकार के कामकाज का संदेश पहुंचाने पर जोर है। अगस्त-सितंबर के लिए पार्टी ने विस्तृत संगठनात्मक कार्यक्रम भी तैयार किया था। इसके साथ ही पहाड़ और मैदान के अलग-अलग राजनीतिक सवालों को एक ही चुनावी रणनीति में पिरोना भाजपा के लिए महत्वपूर्ण होगा। बेरोजगारी, पलायन, भू-कानून, मूल निवास, विकास, सड़क और स्वास्थ्य जैसे स्थानीय मुद्दों के साथ राष्ट्रीय मुद्दों का संतुलन भी चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकता है। भाजपा के सामने एक दूसरी चुनौती सरकार के कामकाज को चुनावी मुद्दे में बदलने की है। पार्टी ने 2027 के लिए विकास, सुशासन और सामाजिक समरसता को अपने प्रमुख एजेंडे में रखने की बात कही है। लेकिन चुनावी राजनीति में घोषणाएं तभी प्रभावी होती हैं जब उनका स्थानीय स्तर पर अनुभव दिखाई दे। सड़क, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा और पलायन जैसे मुद्दों पर जनता की अपेक्षाएं अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकती हैं। इसलिए सरकार की उपलब्धियों का प्रचार और जनता की शिकायतों का समाधानकृदोनों साथ चलाना भाजपा के लिए जरूरी होगा। लगातार सत्ता में रहने के बाद किसी भी दल के सामने संगठनात्मक असंतोष और स्थानीय स्तर पर नाराजगी को नियंत्रित रखने की चुनौती आती है। टिकट की दावेदारी, स्थानीय नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा, कार्यकर्ताओं की अपेक्षाएं और सरकार से जुड़ी शिकायतें चुनाव के समय राजनीतिक समीकरण बदल सकती हैं। इसीलिए भाजपा की मौजूदा कवायद में केवल चुनावी प्रचार नहीं, बल्कि डैमेज कंट्रोल भी महत्वपूर्ण हिस्सा दिखाई दे रहा है। पार्टी जितनी जल्दी असंतोष के कारणों को पहचानकर उन्हें दूर करने में सफल होगी, उतना ही चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारना आसान होगा। भाजपा की तैयारियों के समानांतर कांग्रेस समेत विपक्षी दल भी सरकार के खिलाफ मुद्दे तलाश रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती केवल अपनी उपलब्धियां गिनाने की नहीं, बल्कि विपक्ष के आरोपों का जवाब देने की भी होगी। आने वाले महीनों में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाएं, कानून-व्यवस्था, भू-कानून, मूल निवास, पलायन और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दे राजनीतिक बहस के केंद्र में रह सकते हैं। यही वजह है कि भाजपा ने चुनावी तैयारी को अंतिम समय की गतिविधि बनाने के बजाय अभी से संगठन के विभिन्न स्तरों पर सक्रिय कर दिया है। तीसरी जीत की राह में भाजपा के सामने असली चुनौती विपक्ष से अधिक अपने संगठन और सरकार के बीच तालमेल, स्थानीय असंतोष और जनता की बदलती अपेक्षाओं को साधने की होगी। पार्टी ने तैयारी का ढांचा खड़ा कर दिया है और अब उसकी अगली परीक्षा इस बात की होगी कि यह संगठनात्मक मशीनरी जमीन पर जनता के सवालों का कितना प्रभावी जवाब दे पाती है।

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