सोमवार, 28 सितंबर 2026

भाजपा-कांग्रेस में बढ़ी ‘सियासी’ चौकसी

उत्तराखंड में भविष्य नहीं, वर्तमान की सक्रिय राजनीति बना चुनाव एक-दूसरे के हर दांव को काउंटर करने में जुटे हैं भाजपा व कांग्रेस हालिया कोर कमेटी की बैठक में कांग्रेस के राजनीतिक नैरेटिव पर गंभीर देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की आहट अब राजनीतिक दलों के लिए भविष्य की तैयारी नहीं, बल्कि वर्तमान की सक्रिय राजनीति बन चुकी है। वर्ष 2027 के चुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों एक-दूसरे की हर राजनीतिक गतिविधि, संगठनात्मक कदम और जनसरोकार से जुड़े अभियान पर नजर रख रहे हैं। कौन सा मुद्दा उठाया जा रहा है, किस क्षेत्र में कौन नेता सक्रिय है, किस वर्ग से संवाद बढ़ाया जा रहा है और किस बयान का जवाब कैसे दिया जाएकृराजनीतिक दलों की निगाह अब इन सभी पहलुओं पर है। भाजपा की हालिया कोर कमेटी की बैठक में कांग्रेस के राजनीतिक नैरेटिव और उसके संभावित प्रभाव पर गंभीर चर्चा इसका संकेत है। पार्टी संगठन ने विपक्ष के हर दांव पर नजर रखने और उसके राजनीतिक संदेश का जवाब देने की रणनीति पर जोर दिया है। दूसरी ओर कांग्रेस भी चुनावी जमीन तैयार करने में पीछे नहीं रहना चाहती। पार्टी ने राष्ट्रीय नेताओं को उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय करने की तैयारी की है। मैदानी क्षेत्रों में रोजगार, महंगाई और विकास तथा पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन, महिलाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर राजनीतिक अभियान आगे बढ़ाने की योजना सामने आई है। आगामी चुनाव में सबसे दिलचस्प मुकाबला मुद्दों की राजनीति को लेकर हो सकता है। कांग्रेस सरकार के कामकाज पर सवाल उठाकर बेरोजगारी, भर्ती, महंगाई, पलायन, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों को धार देने की कोशिश कर रही है। भाजपा की रणनीति इन आरोपों का तत्काल राजनीतिक जवाब देने और सरकार की उपलब्धियों को सामने रखने की है। हाल के दिनों में बिजली समझौते जैसे मुद्दों पर कांग्रेस के आरोपों का मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की ओर से जवाब दिया जाना भी इसी राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है। चुनाव नजदीक आने के साथ आरोप और प्रत्यारोप का यह सिलसिला और तेज होने की संभावना है। अब दोनों दलों के लिए संगठनात्मक कार्यक्रम भी राजनीतिक संदेश बन गए हैं। भाजपा ने बूथ सशक्तीकरण से लेकर हर घर तक संपर्क का अभियान शुरू किया है। पार्टी का घोषित लक्ष्य संगठन को चुनाव के अंतिम छोर यानी बूथ तक सक्रिय करना है। भाजपा की ओर से 2022 में हारी 23 सीटों पर विशेष ध्यान और वरिष्ठ नेताओं के रात्रि प्रवास की तैयारी को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी का प्रयास है कि जिन क्षेत्रों में पिछली बार नुकसान हुआ, वहां संगठनात्मक कमजोरियों और स्थानीय असंतोष को समय रहते समझा जाए। कांग्रेस के लिए चुनौती इसके उलट है। उसे सरकार विरोधी माहौल को केवल नारों और आरोपों से आगे ले जाकर बूथ स्तर के संगठन और स्थानीय नेतृत्व में बदलना होगा। बड़े नेताओं की सभाओं को वोट में बदलने के लिए विधानसभा क्षेत्रों में मजबूत संगठन उसकी महत्वपूर्ण जरूरत होगी। 2027 की तैयारी में नेताओं के दौरे भी रणनीतिक संकेत दे रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के उत्तराखंड दौरे और संगठनात्मक बैठकों के बाद पार्टी ने जमीनी तैयारियों को और गति दी है। कांग्रेस भी राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अन्य राष्ट्रीय नेताओं के संभावित कार्यक्रमों के माध्यम से चुनावी माहौल बनाने की तैयारी कर रही है। यानी दोनों दल अब केवल प्रदेश स्तर के नेताओं के भरोसे चुनावी जमीन तैयार नहीं कर रहे, बल्कि राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता को भी स्थानीय राजनीतिक संदेश से जोड़ रहे हैं। इस चुनाव में राजनीतिक चौकसी केवल सार्वजनिक कार्यक्रमों तक सीमित नहीं है। दलबदल, टिकट के दावेदार, असंतुष्ट नेता, स्थानीय गुटबाजी और पुराने राजनीतिक संबंध भी दोनों दलों के लिए महत्वपूर्ण हैं। हाल के महीनों में दोनों ओर नेताओं के पाला बदलने से कई विधानसभा क्षेत्रों के समीकरणों में बदलाव की चर्चा हुई है। यही वजह है कि भाजपा कांग्रेस के भीतर की गतिविधियों पर नजर रख रही है और कांग्रेस भाजपा के संगठन तथा सरकार से जुड़े घटनाक्रम को बारीकी से देख रही है। किस नेता की नाराजगी कहां है, कौन सा क्षेत्र असंतोष का केंद्र बन रहा है और किस मुद्दे को जनता के बीच ज्यादा प्रतिक्रिया मिल रही हैकृइन सवालों के जवाब दोनों दल अपनी चुनावी रणनीति में तलाश रहे हैं। हल्द्वानी के रामलीला मैदान से जुड़ा शुद्धिकरण विवाद भी इस बात का उदाहरण है कि कोई स्थानीय घटना किस तरह व्यापक राजनीतिक मुद्दे में बदल सकती है। कांग्रेस ने इसे सामाजिक न्याय और दलित सम्मान से जोड़कर उठाया, जबकि भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों और उसकी राजनीतिक व्याख्या पर सवाल उठाए। विवाद ने दोनों दलों को अपने-अपने राजनीतिक नैरेटिव को धार देने का अवसर दिया। आगे भी ऐसे स्थानीय मुद्दे चुनावी राजनीति में तेजी से बड़े विमर्श का रूप ले सकते हैं।2027 की चुनावी लड़ाई अभी दूर है, लेकिन उसकी राजनीतिक पटकथा लिखी जा रही है। भाजपा सत्ता में होने के कारण अपने कामकाज और संगठन की ताकत को चुनावी आधार बनाने की कोशिश करेगी। कांग्रेस सरकार के खिलाफ माहौल और जनता के स्थानीय असंतोष को राजनीतिक विकल्प में बदलने की कोशिश करेगी। इस पूरी प्रक्रिया में एक बात स्पष्ट हैकृअब भाजपा कांग्रेस के हर कदम को पढ़ रही है और कांग्रेस भाजपा की हर चाल का जवाब तलाश रही है। आने वाले महीनों में यह निगरानी और चौकसी और बढ़ेगी। क्योंकि चुनाव के मैदान में केवल यह महत्वपूर्ण नहीं होगा कि कौन क्या कह रहा है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि किस मुद्दे पर कौन पहले पहुंचता है, किसकी बात जमीन तक पहुंचती है और कौन अपने संगठन को मतदाता तक प्रभावी ढंग से ले जा पाता है।

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