शनिवार, 3 अक्टूबर 2026
भाजपा का लक्ष्य, कांग्रेस की चुनौती और अन्य दलों का गणित
70 सीटों वाले उत्तराखंड में अब मुकाबला महज सरकार बनाने के बहुमत का नहीं रहा
भाजपा ने 60 प्लस का लक्ष्य रखा, कांग्रेस भी अधिकतम सीटों की लड़ाई की तैयारी में
क्षेत्रीय और अन्य दल वोटों के बिखराव से बदल सकते हैं कई सीटों के समीकरण
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 का चुनावी गणित अब एब्सोल्यूट मेजोरिटी यानी सरकार बनाने के लिए जरूरी 36 सीटों से आगे निकल चुका है। भाजपा ने सार्वजनिक रूप से 60 से अधिक सीटों का लक्ष्य रखा है। भाजपा की बैठक में भाजपा के प्रदेश प्रभारी राम माधव ने कार्यकर्ताओं से साधारण बहुमत के बजाय पार्टी की हाईएस्ट मेजोरिटी 60 प्लस के लक्ष्य के साथ काम करने को कहा।
यही वह बिंदु है जहां 2027 का चुनाव केवल सत्ता और विपक्ष के बीच मुकाबला नहीं रह जाता। 70 सदस्यीय विधानसभा में 60 का आंकड़ा हासिल करना मतलब विपक्ष के लिए बेहद सीमित राजनीतिक स्पेस छोड़ना। लिहाजा भाजपा के इस लक्ष्य का राजनीतिक जवाब कांग्रेस की रणनीति में भी दिखाई दे रहा हैकृपार्टी केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि अधिकतम सीटों पर मजबूत दावेदारी बनाने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस ने टिकट चयन में जीतने की क्षमता को प्राथमिकता देने की रणनीति सार्वजनिक की है।
भाजपा के लिए 2027 इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह लगातार तीसरी बार सरकार बनाने की कोशिश में है। पार्टी ने संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करने, सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड जनता तक ले जाने और चुनावी तैयारी को राजनीतिक लामबंदी में बदलने पर जोर दिया है। 60 पार का लक्ष्य केवल संख्या नहीं है। यह संगठन के भीतर कार्यकर्ताओं को एक बड़ा चुनावी लक्ष्य देने की रणनीति भी है। भाजपा का संदेश साफ है कि मुकाबला कुछ सीटों पर बढ़त लेने का नहीं, बल्कि प्रदेश के लगभग हर हिस्से में व्यापक जीत की कोशिश का है। लेकिन यही लक्ष्य भाजपा के सामने चुनौती भी खड़ी करता है। 60 सीटें जीतने के लिए 70 में से केवल 10 सीटें विपक्ष के लिए बचती हैं। इसका अर्थ है कि भाजपा को पहाड़, मैदान, कुमाऊं और गढ़वालकृहर क्षेत्र में बहुत व्यापक जीत दर्ज करनी होगी।
कांग्रेस के लिए तस्वीर दूसरी है। विधानसभा में उसके पास वर्तमान में 20 सीटें हैं, जबकि भाजपा के पास 47 सीटें हैं। पार्टी की रणनीति में वरिष्ठ नेताओं को चुनावी जिम्मेदारियां देने के साथ-साथ संभावित उम्मीदवारों की जीतने की क्षमता को महत्व देने की बात सामने आई है। इसका संकेत है कि कांग्रेस इस बार टिकट वितरण को केवल वरिष्ठता या पारंपरिक दावेदारी के आधार पर नहीं छोड़ना चाहती। कांग्रेस के सामने गणित कठिन है, लेकिन राजनीति केवल संख्या से नहीं चलती। 2022 में भी कई सीटों पर मुकाबले करीबी रहे थे। उपलब्ध चुनावी विश्लेषण के अनुसार 23 सीटों पर जीत का अंतर पांच हजार मतों से कम था। यही करीबी सीटें 2027 में दोनों प्रमुख दलों की रणनीति का केंद्र बन सकती हैं।
यहीं से उत्तराखंड के छोटे दलों और क्षेत्रीय राजनीतिक ताकतों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उत्तराखंड क्रांति दल समेत अन्य दल यदि अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में प्रभावी उम्मीदवार उतारते हैं तो उनका वास्तविक प्रभाव सीट जीतने से ज्यादा वोटों के बंटवारे में दिखाई दे सकता है। किसी सीट पर भाजपा और कांग्रेस के बीच अंतर कुछ हजार मतों का हो और तीसरे उम्मीदवार को उससे अधिक मत मिल जाएं, तो पूरा चुनावी गणित बदल सकता है। इसलिए बड़े दलों के लिए छोटे दलों की चुनौती को केवल सीटों की संख्या से मापना पर्याप्त नहीं होगा।
2027 में दलबदल भी इसी गणित का हिस्सा है। अगस्त 2026 की एक राजनीतिक रिपोर्ट में करीब 20 सीटों के समीकरणों पर दलबदल के असर का उल्लेख किया गया था। हालांकि किसी नेता के पार्टी बदलने से पूरा वोट बैंक स्थानांतरित हो जाए, इसकी कोई गारंटी नहीं है। भाजपा के सामने अब चुनौती अपने 60 पार के लक्ष्य को सीट-दर-सीट वास्तविक चुनावी गणित में बदलने की है। कांग्रेस के सामने चुनौती भाजपा के इस लक्ष्य को रोकते हुए अपने सीट आधार को तेजी से बढ़ाने की है। वहीं छोटे दलों के सामने अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने का अवसर है।
इस पूरी तस्वीर में सबसे महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्र वह होंगे जहां पिछली बार मुकाबला करीबी रहा था। वहां कुछ हजार मतों का उतार-चढ़ाव भी बड़े दलों की सीट संख्या को प्रभावित कर सकता है। इसलिए 2027 की लड़ाई में बड़ा लक्ष्य और स्थानीय चुनावी गणित, दोनों साथ-साथ चलेंगे। भाजपा ने 60 पार का लक्ष्य सामने रख दिया है। कांग्रेस के लिए चुनौती अब केवल भाजपा को सत्ता से हटाने की नहीं, बल्कि अधिकतम सीटें अपने खाते में लाने की है और छोटे दलों के लिए यही मौका है कि वह उन सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराएं जहां मुख्य मुकाबला करीबी हो सकता है।
उत्तराखंड की 70 सीटों का चुनाव इसलिए 36 के बहुमत की लड़ाई भर नहीं रह गया है। अब असली राजनीतिक सवाल यह है कि कौन-सा दल अपने लक्ष्य के कितने करीब पहुंचता है और तीसरे राजनीतिक स्पेस में खड़े दल कितनी सीटों के गणित को प्रभावित करते हैं। यही 2027 के चुनाव का सबसे दिलचस्प अंकगणित बनने जा रहा है।
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