रविवार, 4 अक्टूबर 2026

मतदाता सूची नया राजनीतिक ‘रणक्षेत्र’

कांग्रेस का वोट बचाओ और सियासत बढ़ाओ की नई राणनीति एसआईआर के बाद कांग्रेस का लोकतंत्र बचाओ अभियान तेज मतदाता सूची पर सवालों के सहारे जमीन तैयार करने की कोशिश देहरादून। उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर सियासत लगातार तेज हो रही है। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने लोकतंत्र बचाओदृवोट बचाओ अभियान चलाने का ऐलान किया है। कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची से हटाए गए नामों की समीक्षा होनी चाहिए, पात्र मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़े जाने चाहिए और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवालों पर जवाबदेही तय होनी चाहिए। अभियान में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी शामिल है। कांग्रेस के लिए यह अभियान महज विरोध कार्यक्रम नहीं है। 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के बीच मतदाता सूची अब राजनीतिक विमर्श का नया केंद्र बन गई है। कांग्रेस इसे मताधिकार और लोकतंत्र का सवाल बता रही है, जबकि भाजपा और सत्तापक्ष की ओर से विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। कांग्रेस ने अपने अभियान को बूथ स्तर तक ले जाने की तैयारी की है। जिला स्तर पर मार्च के अलावा सहयोगी दलों के साथ संयुक्त बैठकें और स्थानीय स्तर पर जनसंपर्क कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। देहरादून में गांधी पार्क से मार्च निकालने की घोषणा की गई है। मतदाता सूची को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच सबसे अहम सवाल अब यही है कि जिन नामों को गलत तरीके से हटाए जाने का दावा किया जा रहा है, उनके ठोस आंकड़े और बूथवार विवरण सार्वजनिक कब होंगे। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतदाता सूची की शुद्धता बेहद महत्वपूर्ण है, इसलिए किसी भी वास्तविक शिकायत का पारदर्शी तरीके से निस्तारण जरूरी है। दूसरी ओर, निर्वाचन प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाने वाले राजनीतिक दलों के लिए भी जरूरी है कि वे दावों को प्रमाण और विशिष्ट मामलों के साथ सामने रखें। केवल राजनीतिक मंचों से लगाए गए आरोपों से मतदाताओं की आशंकाएं दूर नहीं होंगी। कांग्रेस का लोकतंत्र बचाओदृवोट बचाओ अभियान ऐसे समय शुरू हुआ है, जब प्रदेश की राजनीति पहले ही 2027 के चुनावी मोड में प्रवेश कर चुकी है। अभियान के जरिए कांग्रेस मतदाता सूची, एसआईआर और निर्वाचन प्रक्रिया के मुद्दे को सीधे जनता के बीच ले जाने की कोशिश कर रही है। साथ ही विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने का प्रयास भी दिखाई दे रहा है। अब इस अभियान की असली परीक्षा सड़क पर जुटने वाली भीड़ से अधिक बूथ पर सामने आने वाले तथ्यों की होगी। कांग्रेस यदि यह साबित कर पाती है कि वास्तविक मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं, तो उसका मुद्दा राजनीतिक रूप से अधिक वजन हासिल कर सकता है। वहीं यदि आरोपों के साथ पर्याप्त तथ्य सामने नहीं आते हैं, तो भाजपा को कांग्रेस के अभियान को राजनीतिक मुद्दा बताने का आधार मिलेगा। यानी 2027 की जंग में अब सिर्फ नेता और मुद्दे नहीं, मतदाता सूची भी राजनीतिक मुकाबले का अहम मैदान बन गई है। कांग्रेस ने वोट बचाओ का नारा दे दिया है। अब निगाह इस बात पर है कि वह इस नारे को कितने ठोस आंकड़ों और जमीनी शिकायतों में बदल पाती है।

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