रविवार, 4 अक्टूबर 2026
सत्यापन पर अब सियासी खेल
मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर कांग्रेस और गठबंधन के आरोप
भाजपा ने कहाकृप्रक्रिया पर सवाल उठाने से पहले सामने रखें तथ्य
लोकतंत्र व मताधिकार की रक्षा के नाम पर आंदोलन का ऐलान
देहरादून। उत्तराखंड में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के बाद अंतिम मतदाता सूची जारी होते ही चुनावी राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस और गठबंधन ने मतदाता सूची में बदलाव को लेकर सवाल खड़े करते हुए लोकतंत्र और मताधिकार की रक्षा के नाम पर आंदोलन का ऐलान किया है। वहीं भाजपा ने विपक्ष के आरोपों पर सवाल उठाते हुए कहा है कि मतदाता सूची का सत्यापन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और यदि किसी नाम को लेकर आपत्ति है तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत उसका समाधान कराया जा सकता है।
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल की अध्यक्षता में हुई बैठक में एसआईआर में कथित अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन को बूथ स्तर तक ले जाने का निर्णय लिया गया। गठबंधन ने निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए और मतदाता बचाओ-लोकतंत्र बचाओ अभियान चलाने की बात कही है। दूसरी ओर, कांग्रेस नेता सूर्यकांत धस्माना ने अंतिम सूची को लेकर 13 लाख से अधिक हटाए गए मतदाताओं का विधानसभा-वार विवरण सार्वजनिक करने की मांग की है। कांग्रेस का आरोप है कि बड़ी संख्या में नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं। यहीं से सियासत का असली सवाल खड़ा होता है। मतदाता सूची का सत्यापन यदि लोकतांत्रिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए है तो उस पर आपत्ति का रास्ता भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में ही तलाशना होगा। केवल राजनीतिक आरोपों और आंदोलनों के सहारे पूरी पुनरीक्षण प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा करने से विवाद का समाधान नहीं होगा।
भाजपा का तर्क है कि विपक्ष को पहले यह स्पष्ट करना चाहिए कि किन मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए, कितने मामलों में आपत्ति दर्ज हुई और किन मामलों में निर्धारित प्रक्रिया के बावजूद समाधान नहीं हुआ। भाजपा नेता लगातार कांग्रेस से एसआईआर में कथित गड़बड़ी के ठोस प्रमाण सार्वजनिक करने की मांग करते रहे हैं। एसआईआर के दौरान करीब 95 हजार मतदाताओं को आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराने या सत्यापन प्रक्रिया में उपस्थित नहीं होने के कारण अपात्र चिह्नित किए जाने की बात मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से कही गई थी। अंतिम सूची में 71,58,949 मतदाता दर्ज हैं।
इस पूरे विवाद में कांग्रेस के सामने भी एक राजनीतिक चुनौती है। यदि उसका दावा है कि वास्तविक मतदाताओं के नाम बड़ी संख्या में हटाए गए हैं, तो उसे बूथ स्तर पर तथ्य सामने लाने होंगे। किस विधानसभा में कितने नाम हटे, उनमें कितने वास्तविक मतदाता हैं और कितने मामलों में आपत्ति के बावजूद नाम वापस नहीं जुड़ेकृइन सवालों के जवाब राजनीतिक आरोपों से अधिक प्रभावी होंगे।
वहीं निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर उठ रहे सवालों को पूरी तरह खारिज करना भी उचित नहीं होगा। मतदाता सूची लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियाद है। इसलिए निर्वाचन आयोग के लिए भी जरूरी है कि नाम जुड़ने, हटने और आपत्तियों के निस्तारण से जुड़ी जानकारी यथासंभव स्पष्ट और सार्वजनिक रखी जाए। 2027 की चुनावी जंग से पहले मतदाता सूची का विवाद अब महज प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है। कांग्रेस इसे लोकतंत्र और मताधिकार का सवाल बना रही है, जबकि भाजपा इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति के रूप में देख रही है। अंतिम फैसला राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर सामने आने वाले तथ्यों से होगा।
उत्तराखंड की चुनावी राजनीति में अब असली लड़ाई यही हैकृकि मतदाता सूची में बदलाव को कौन तथ्य के साथ साबित करता है और कौन आरोपों से आगे बढ़कर जनता के सामने प्रमाण रखता है।
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